एआई विकास के खिलाफ पूरी दुनिया के इंसानों का हल्ला बोल!

एआई को लेकर लोगों की चिंताएं इसलिए भी बढ़ती जा रही हैं क्योंकि युद्ध में उसकी भूमिका खतरनाक है और निरंतर बढ़ती जा रही है। गूगल व अमेज़न ने साल 2021 में इजराइल सरकार को टेक सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए 1.2 बिलियन डॉलर के कॉन्ट्रैक्ट पर हस्ताक्षर किये। जब गाज़ा के विरुद्ध नरसंहार में तीव्रता आयी, तो 2024 में गूगल के कर्मचारियों ने धरना दिया नो टेक फॉर अपारथाइड (रंगभेद को टेक नहीं) आंदोलन के तहत, क्योंकि गूगल की सेवाएं जासूसी, राज्य हिंसा व नरसंहार के लिए इस्तेमाल हो रही थीं।

एआई बनाम मानव की चिंता से केवल भारत या कोई एक देश ग्रस्त नहीं है बल्कि दुनियाभर में लोग परेशान व बेचैन हैं। धर्म, जाति, रंग, नस्ल, क्षेत्र, भाषा आदि के आधार पर विभाजित समाज को आज जो एक बात एकजुट किये हुए है, वह है एआई उद्योग का विरोध, जो नौकरी से लेकर बिजली, पानी, पर्यावरण जैसे जीवन के हर पहलू को प्रभावित कर रहा है। फिर वह चाहे अच्छे के लिए हो या बुरे के लिए। हर जगह बस यही चिंता है कि एआई ने बहुत तेज़ गति पकड़ ली है।

यह सही है कि आज अधिकांश लोग एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन एआई के विकास को लेकर निराशा भी है और एआई-निराशा सबसे अधिक अमेरिका में देखने को मिल रही है। दैनिक जीवन में एआई के निरंतर बढ़ते उपयोग से अमेरिका में जितने लोग उत्साहित हैं, उससे पांच गुना चिंतित व निराश हैं। जब एआई की वजह से किसी की नौकरी छूट जाती है, तो उसकी आंखों में निराशा के आंसूं होते हैं, ख़ुशी के नहीं। कितने ही अनुवादक अपने घरों में हाथ पर हाथ रखे बैठे हुए हैं; क्योंकि उनका काम आजकल एआई से लिया जा रहा है।

एआई को लेकर जनता की चिंताएँ और तकनीकी वर्चस्व की दौड़

पिउ सर्वे के अनुसार, जनता की सोच यह है कि एआई हमारी रचनात्मक सोच को बदतर करेगी, अर्थपूर्ण संबंध बनने नहीं देगी और कठिन निर्णय लेगी। अन्य सर्वे कहते हैं कि लोगों का मानना है कि एआई गलत सूचनाएं फैलायेगी, हमारे उद्देश्य व अर्थ के बोध को खोखला करेगी और हमारी सामाजिक व भावनात्मक इंटेलिजेंस को नुकसान पहुंचायेगी।

उद्योग समर्थकों का कहना है कि हर देश चीन के साथ तकनीकी वर्चस्व की दौड़ में शामिल है, जोकि अस्तित्व बचाये रखने के लिए आवश्यक हो गया है, लेकिन अधिकतर लोग एआई को अपने घरेलू मुद्दों के लेंस से देख रहे हैं कि बिजली के बिल आसमान स्पर्श कर रहे हैं, नौकरी पर खतरे मंडरा रहे हैं, किशोरों को चैटबोट की लत लग रही है।

टीम मानव बनाम टीम मशीन : एआई विकास पर वैश्विक संघर्ष

गौरतलब है कि पिछले साल अक्तूबर में 1,34,000 लोगों ने एक वक्तव्य पर हस्ताक्षर किये कि सुपरइंटेलिजेंस के विकास पर विराम लगाया जाये। लोग अब टीम मशीन की जगह टीम मानव के पक्ष में हैं। यह एहसास करना आसान है कि टीम मशीन जीत रही है। बड़ी टेक कम्पनियां निरंतरता के साथ शक्तिशाली एआई मॉडल्स तैयार कर रही हैं और निवेश में अरबों डॉलर अर्जित कर रही हैं। एआई को भू-राजनीतिक वर्चस्व की कुंजी समझा जा रहा है। इसलिए ट्रंप से लेकर मोदी तक इसके लिए तालियां बजा रहे हैं।

यकीनन टेक लीडर्स कह रहे हैं कि वह टीम मानव में शामिल हैं- समाज की उत्पादकता, ख़ुशी और हद तो यह है कि स्वास्थ्य भी अल्ट्रा स्मार्ट, दयालु, डिजिटल सहायकों से बहतर हो जायेगा। लेकिन ज़्यादातर लोग उन पर विश्वास नहीं करते हैं, विशेषकर इसलिए क्योंकि कुछ कम्पनियां राजस्व व यूजर्स को निचोड़ने के लिए ऐसे हथकंडे अपनाती हैं जैसे पोर्न, डीपफेक जनरेशन और इन-चैटबोट विज्ञापन। इसलिए एआई आलोचक मामले को अपने हाथ में ले रहे हैं, इस उम्मीद में कि हाइप की तेज़ रफ्तार ट्रेन को धीमे किया जाये।

डेटा सेंटर और एआई: विरोध का नया केंद्र

वह धरना-प्रदर्शन आयोजित कर रहे हैं, जनता को जागरूक करने के लिए भाषण दे रहे हैं, समझौता सुरक्षित रखने के लिए दस्तावेज़ तैयार कर रहे हैं, अदालतों में याचिकाएं दायर कर रहे हैं और चुनाव लड़ रहे हैं। चूंकि भौतिक रूप में डाटा सेंटर ही एआई सिस्टम्स को पॉवर करते हुए दिखायी दे रहे हैं, इसलिए विरोध-प्रदर्शन के फोकस में वही हैं। प्रतिक्रिया स्वरूप एआई कम्पनियों ने कुछ दिशा-निर्देश लागू किये हैं, जिनमें शामिल हैं आयु की पुष्टि, बिजली खर्च और सेक्सुअल तस्वीरें, लेकिन शक बरकरार है।

बहरहाल, ऐसा प्रतीत होता है कि दुनियाभर के चुनावों में एआई बनाम मानव बहुत बड़ा मुद्दा बनने जा रहा है और जो राजनीतिज्ञ बिग टेक कम्पनियों से चंदा लेकर उनकी गाते व जनता को अनदेखा कर देते हैं उन्हें बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है। लेकिन सवाल यह है कि टेक्नोलॉजी जो हमारे जीवन के हर पहलू में प्रवेश कर रही है या कर चुकी है, उसे रोका या धीमा किया जा सकता है? शायद नहीं, लेकिन कोशिश जारी है।

-शाहिद ए चौधरी

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