अमेरिका-ईरान में नहीं बनी बात चिंतित है दुनिया कि अब क्या होगा ?

अब वैश्विक दबाव वार्ता को जारी रखने का बन रहा है; क्योंकि हर किसी की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है, अमेरिका में भी युद्ध का जनविरोध व ट्रंप को हटाने के लिए अनुच्छेद 25 लागू करने की मुहिम तेज़ है, सऊदी अरब के रक्षा मंत्रालय ने घोषणा की है कि संयुक्त रणनीतिक रक्षा समझौते के तहत उसके पूर्वी सेक्टर में स्थित किंग अब्दुल अज़ीज़ एयर बेस की सुरक्षा करने के लिए पाकिस्तान का सैन्य बल वहां पहुंच गया है, जिससे लगता है कि सऊदी अरब अमेरिका पर अपनी रक्षा निर्भरता कम करते हुए ईरान से संबंध बेहतर करने का इच्छुक है और चीन ने ईरान को एयर डिफेंस सिस्टम दिया है। इस पृष्ठभूमि में ट्रंप कह रहे हैं कि वह वेनेज़ुएला की तरह ईरान का नेवल ब्लॉकेड करेंगे और अपनी शर्तें मनवायेंगे। ट्रंप क्या कहते हैं और क्या करते हैं, यह उन्हें स्वयं मालूम नहीं है। इसलिए फिलहाल के लिए सब कुछ अनिश्चित है।
जैसा अनुमान लगाया जा रहा था, वही हुआ। अमेरिका और ईरान के बीच कोई समझौता नहीं हुआ। इस्लामाबाद, पाकिस्तान में वार्ता बिना किसी डील के समाप्त हो गई और अमेरिका के उप-राष्ट्रपति यह कहते हुए वापस लौट गये कि उन्होंने अंतिम व सर्वश्रेष्ठ प्रस्ताव रखा था। दूसरी ओर ईरान को पहले ही वार्ता की सफलता पर शक था; क्योंकि दो बार पहले जब वार्ताएं एकदम सही दिशा में जाते हुए समझौते की कगार पर पहुंचने वाली थीं, तो अमेरिका ने धोखा दे दिया था।
जिनेवा में जब दूसरी वार्ता हुई, तो उसमें शामिल ब्रिटेन के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जोनाथन पॉवेल को आश्चर्य हुआ था कि तेहरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर वाशिंगटन की हर बात मानने को तैयार हो गया था व वियना में तकनीकी वार्ता के लिए तिथि पर भी सहमति बन गई थी, तो अमेरिका व इजराइल ने ईरान पर 28 फरवरी 2026 की सुबह बेमतलब व बेम़कसद का पुन युद्ध थोप दिया था, मिनाब में 168 स्कूल की बच्चियों की हत्या करके। लेकिन तब से होर्मुज़ में बहुत पानी बह चुका है।
अब भारी नुकसान व अपनी टॉप लीडरशिप को खोने के बावजूद तेहरान वाशिंगटन की अनुचित मांगों को ठुकराने की स्थिति में है और अमेरिका स्वघोषित त़ाकत की सीमाएं भी ज़ाहिर हो गईं हैं कि वह अपनी मनमानी व दादागिरी थोपने की स्थिति में नहीं रहा है, विशेषकर इसलिए कि इराक युद्ध की तरह अब विश्व एकध्रुवीय नहीं रहा है।
दक्षिण लेबनान में इजराइल-हिजबुल्लाह संघर्ष तेज़
रूस व चीन भी सुपरपॉवर के रूप में उभर चुके हैं और वह ईरान के समर्थन में खड़े हैं। ईरान ने कहा है कि वार्ता का छोड़ने का अमेरिका बहाना तलाश रहा था और अब गेंद अमेरिका के पाले में है। इस बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने कहा है कि वाशिंगटन ने युद्ध जीत लिया है, अब वार्ता का चाहे जो नतीजा निकले। ट्रंप ने यह भी दावा किया है कि उसके दो जहाज़ स्ट्रेट ऑ़फ होर्मुज़ से गुज़रे हैं, समुद्री माइंस को क्लियर करते हुए, जबकि ईरान ने इस दावे का खंडन करते हुए चेतावनी दी है कि कोई भी सैन्य जहाज़ होर्मुज़ को अगर पार करने का प्रयास करेगा तो उसे भयावह प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ेगा।
उधर दक्षिण लेबनान में इजराइल की एयर स्ट्राइक्स जारी हैं और हिजबुल्लाह भी जवाबी कार्रवाई कर रहा है। हालांकि अमेरिका व ईरान में उच्चस्तरीय व आमने-सामने की वार्ता लगभग 47 साल बाद हुई, लेकिन विवाद व अविश्वास के वातावरण में हुई इस 21 घंटे की गहन वार्ता का कोई नतीजा निकलना ही नहीं था; क्योंकि युद्ध से पहले और युद्ध के बाद गोलपोस्ट ही बदल गये और इजराइल (बल्कि बेंजामिन नेतन्याहू कहना अधिक दुरुस्त होगा) जो न पहले शांति चाहता था और न अब चाहता है किसी भी डील में सबसे बड़ा रोड़ा है।
होर्मुज़ और युद्धविराम मुद्दों पर बढ़ी असहमति
जिनेवा में वार्ता का फोकस मुख्यत ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर था, लेकिन इस्लामाबाद में अमेरिका के तरफ से जो 15 पॉइंट्स रखे गये व ईरान की तरफ से जो 10 पॉइंट्स रखे गये, उनमें अन्य विवाद भी शामिल हुए जो परमाणु कार्यक्रम और पहली बार शामिल हुए स्ट्रेट ऑ़फ होर्मुज़ व सभी मोर्चों पर विस्तृत युद्धबंदी तक सीमित नहीं हैं। असहमति का असल बिंदु यह था कि अमेरिका इस बात का वायदा करने के लिए तैयार नहीं था कि वह लेबनान के खिलाफ इजराइल आक्रमण पर विराम लगायेगा।
अमेरिका ने स्ट्रेट ऑ़फ होर्मुज़ की सुरक्षा पर जो शर्त रखी वह ईरान को स्वीकार नहीं थी। यही विवाद के बिंदु आख़िरकार मुख्य अड़चन बन गये। वार्ता इस पृष्ठभूमि में टूटी कि इजराइल ने बैरुत पर अंधाधुंध गोलाबारी की, जिसमें सैकड़ों निर्दोष लोग मारे गये और जिसकी व्यापक अंतरराष्ट्रीय निंदा हुए है व इसे युद्धविराम के उल्लंघन के रूप में देखा जा रहा है। दरअसल, डील के संदर्भ में मुख्य चुनौती इजराइल की तरफ से आनी थी और उसी की तरफ से आयी भी।
यह भी पढ़ें… बंगाल में आक्रामक हुआ चुनाव प्रचार, जारी हुआ भाजपा का संकल्प पत्र !
सत्ता परिवर्तन लक्ष्य पूरा न होने से बढ़ा तनाव
दो सप्ताह के युद्धविराम पर नेतन्याहू की गुस्साभरी प्रतिक्रिया सामने आयी थी। उन्होंने युद्ध के मुख्य उद्देश्य ईरान में सत्ता परिवर्तन बताया था, जोकि हुआ नहीं। चूंकि अमेरिका ने पुराने शासकों से ही वार्ता आरंभ कर दी तो यह स्पष्ट हो गया कि इजराइल का घोषित रणनीतिक उद्देश्य हासिल नहीं हुआ। इसलिए युद्धविराम के घोषित होते ही इजराइल ने बैरुत के नागरिकों पर बमबारी करनी शुरू कर दी ताकि ईरान को उकसाया जा सके और युद्धविराम विफल हो जाये। लेकिन ईरान ने युद्धविराम को जारी रखा, इस घोषणा के साथ कि लेबनान में अपने साथियों को वह अकेला नहीं छोड़ेगा।
इटली, स्पेन व ऑस्ट्रेलिया ने इजराइल द्वारा की गई बमबारी की निंदा की और युद्धविराम का सम्मान करने के लिए कहा। गल्फ को-ऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) भी युद्धविराम के पक्ष में है और चाहती है समस्या का शांतिपूर्ण हल निकालने के प्रयास जारी रहने चाहिए, बावजूद इसके कि ईरान व यूएई में विश्वास का अभाव जारी है। यहां दो अन्य बातों को समझना भी आवश्यक है। एक, इजराइल के सांसद नामा लज़िमी का आरोप है कि नेतन्याहू ने जान-बूझकर 7 अक्तूबर का हमास हमला होने दिया था ताकि वह युद्ध में जा सकें और अदालत में पेश होने से बच सकें, जहां उनके व उनकी पत्नी के खिलाफ भ्रष्टाचार व अन्य मामलों के अनेक म़ुकदमे चल रहे हैं।
इसी के चलते नेतन्याहू ने अतीत में अनेक समझौता-वार्ताओं को नुकसान पहुंचाया है। मसलन, 9 सितंबर 2025 को उन्होंने दोहा में हमास की वार्ता टीम पर हमला कराया, जिसमें पांच लोग मारे गये थे। इससे पहले नेतन्याहू ने न्यायपालिका को नियंत्रित करने के लिए एक विधेयक लाने का प्रयास किया था, जिसका इजराइल में ज़बरदस्त जनविरोध हुआ था और विधेयक को वापस लेना पड़ा।
नेतन्याहू पर भ्रष्टाचार मामलों और दबाव की राजनीति
फिर नेतन्याहू ने ट्रंप के माध्यम से इजराइल के राष्ट्रपति इसहाक हेरज़ोग पर भ्रष्टाचार के म़ुकदमे वापस लेने का दबाव बनाया, जो सफल नहीं हुआ। युद्ध के समाप्त होते ही न सिर्फ नेतन्याहू की कुर्सी जायेगी बल्कि अपनी पत्नी के साथ वह जेल में होंगे। सांसद लज़िमो का आरोप है कि खुद को बचाये रखने के लिए नेतन्याहू इजराइल को लगातार युद्ध में झोंके हुए हैं। दूसरा यह कि अमेरिका व ईरान के बीच जो तीन असफल वार्ताएं अब तक हुई हैं, उन सभी में ट्रंप के यहूदी दामाद जरेड कुशनर व ट्रंप के करीबी दोस्त रियल एस्टेट निवेशक स्टीव विटक़ोफ शामिल रहे हैं। यह दोनों ही नेतन्याहू के करीबी हैं और अमेरिकी विशेषज्ञों के अनुसार नेतन्याहू के लिए ही काम करते हैं, जबकि यह न तो अमेरिकी प्रशासन में कुछ हैं और न ही इन्हें कूटनीति का कोई अनुभव है।

हालांकि अब वैश्विक दबाव वार्ता को जारी रखने का बन रहा है; क्योंकि हर किसी की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है, अमेरिका में भी युद्ध का जनविरोध व ट्रंप को हटाने के लिए अनुच्छेद 25 लागू करने की मुहिम तेज़ है, सऊदी अरब के रक्षा मंत्रालय ने घोषणा की है कि संयुक्त रणनीतिक रक्षा समझौते के तहत उसके पूर्वी सेक्टर में स्थित किंग अब्दुल अज़ीज़ एयर बेस की सुरक्षा करने के लिए पाकिस्तान का सैन्य बल वहां पहुंच गया है, जिससे लगता है कि सऊदी अरब अमेरिका पर अपनी रक्षा निर्भरता कम करते हुए ईरान से संबंध बेहतर करने का इच्छुक है और चीन ने ईरान को एयर डिफेंस सिस्टम दिया है।
इस पृष्ठभूमि में ट्रंप कह रहे हैं कि वह वेनेज़ुएला की तरह ईरान का नेवल ब्लॉकेड करेंगे और अपनी शर्तें मनवायेंगे। ट्रंप क्या कहते हैं और क्या करते हैं, यह उन्हें स्वयं मालूम नहीं है। इसलिए फिलहाल के लिए सब कुछ अनिश्चित है।
अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।



