एक थे महाराजा किशन प्रसाद
हैदराबाद, मुझे लगभग यकीन है कि आप महाराजा किशन प्रसाद को नहीं जानते होंगे। हिन्दी जगत में बहुत बिरले होंगे जो उनसे वाकिफ होंगे। मैंने भी उन्हें बहुत देर से बीते बरस तब जाना, जब मैं शहरे-हैदराबाद पर एक किताब पढ़ रहा था। लेकिन उन्हें जानकर मुझे लगा कि लोगों को उन्हें जानना चाहिये। वजह यह कि वह लासानी शख्सियत थे। वह सामंती रंग-ढंग में पली-बढ़ी शख्सियत थे। उम्दा प्रशासक थे। विविध कला रूपों में उनकी गहरी रूचि थी। वह शायर थे। एडीटर थे।
धर्मनिरपेक्षता और सांस्कृतिक समरसता का उदाहरण
गंगा-जमुनी तहजीब की मौजें उनके व्यक्तित्व में हिलोर लेती थीं। वह नेक दिल थे और आडंबर से कोसों दूर। वह सूफी परंपरा में यकीन रखते थे और अपने जीवन में ऐसा कुछ कर गुजरे कि उनकी जिंदगी अनूठी नज़ीर हो गयी। महाराजा सर किशन प्रसाद बहादुर यामीन-उस-सल्तनत का जन्म हैदराबाद में सन 1864 में साल के पहले दिन हुआ था। उनके जन्म की वास्तविक तारीख को लेकर विवाद है। बहरहाल वह कुलीन घराने के थे और दो बार हैदराबाद के प्रधानमंत्री रहे।

वह निजाम के बालपने के साथी थे और आजीवन उनके विश्वास-पात्र और वफादार रहे। उनका पहला कार्यकाल सन 1901 से 11 जुलाई सन 1911 के दरम्यान रहा, जब मूसी नदी में प्रलंयकारी बाढ़ आई। असल में प्रसाद की निजाम की खिदमत का सिलसिला सन 1892 से शुरू हुआ, जब वह रियासत के पेशकार बनाये गये।
यह भी पढें … भारतीय इंजीनियरिंग का कमाल है, चिनाब नदी पर बना रेल पुल
प्रशासनिक जीवन की शुरुआत और दीवान की भूमिका
अपनी काबिलियत से उन्होंने निजाम महबूब अली खान का ध्यान खींचा और उन्होंने उन्हें नौ साल बाद रियासत का दीवान बना दिया। दीवान बनते ही उन्होंने रियासत के राजस्व को बढ़ाने का बीड़ा उठाया और इसमें कामयाब भी हुये। उनके दीवानी काल में आय चौगुनी बढ़ी। अपने इसी काल में हैदराबाद को अभूतपूर्व प्राकृतिक विपदा का सामना करना पड़ा।
28 सितंबर, 1908 को मूसी नदी के तटबंध तोड़ दिये। इस बाढ़ ने करीब 15000 लोगों की जानें लील लीं। हजारों लोग बेघर हुये। साढ़े बारह लाख पौण्ड से अधिक की संपत्ति का नुकसान हुआ। स्थानीय बोली में गयानी सीतांबर नामक इस आपदा ने तीन पुलों-अफजल, मुसल्लम जंग और चादरघाट को बहा दिया। केवल पुराना पुल की मार्फत शहर के दोनों हिस्सों में आवाजाही बनी रही। 36 घंटों में 17 इंच बारिश दर्ज की गयी।

कोलसावाड़ी और घांसीबाजार में तो त्राहि-त्राहि का आलम था। विभीषिका ऐसी थी कि करीबन चौथाई आबादी बेघर थी। उस्मानिया अस्पताल के आहाते में वह इमली का दरख्त आज भी मौजूद है, जिस पर चढ़कर डेढ़ सौ से ज्यादा लोगों ने जान बचाई थी। दीवान किशन प्रसाद के लिये यह परीक्षा की घड़ी थी। उन्होंने मुस्तैदी से इस स्थिति का सामना किया। निजाम आसफजाह षष्टम सर महबूब अली खान ने पांच लाख रूपये का जो राहत कोष बनाया, उसमें सबसे बडा योगदान किशन प्रसाद का ही था।
महल के दरवाजे सबके लिए खोल दिये गये। राहत के लिये हाथी-घोडों के लश्कर लगाये गये। दस दिन अवकाश रहा। शहर में दस रसोइयां खोली गयी। एक बड़ी घटना यह घटी कि दीवान और दरबारी ज्योतिषी झूमरलाल तिवारी की सलाह पर निजाम महबूब अली ने धोती-जनेऊ पहना और मूसी नदी को शांत करने के लिये फल-फूल, नारियल, रेशमी साड़ी, मोती और सोने के साथ हिन्दू विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। यह नदियों को मां मानने की परिपाटी के अनुरूप था। एक मुस्लिम शासक का हिन्दू-अनुष्ठान उनके आदार्य और प्रजा वत्सल चरित्र को दर्शाता है।
निजी जीवन और धार्मिक सहिष्णुता
महाराजा किशन प्रसाद का शजरा प्रभावशाली है। वह भटनागर कायस्थ थे। उनका ताल्लुक चंदूलाल शादां के घराने से था। उनके पुरखा राय मूलचंद आसफ ज़ाह प्रथम के साथ दिल्ली से हैदराबाद आये थे। उनके दादा नरिंदर प्रसाद महबूब अली खां के काल में दीवान और पेशकार रहे। जाहिर है कि किशन प्रसाद को संपत्ति विरासत में मिली थी, लेकिन दादा नरिंदर न जाने किस बात पर खफा हुये कि उन्होंने किशन को उसके छोटे भाई के पक्ष विरासत से वंचित कर दिया, मगर किशन प्रसाद की खुशनसीबी कि उन्हें सालार जंग प्रथम का संरक्षण मिला, लिहाजा जंग परिवार के नौनिहालों के साथ पश्चिमी ढब के स्कूलों में उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई।

किशन प्रसाद ने लेखाशास्त्र, धर्म, ज्योतिष, औषधि, सूफीवाद और संस्कृत में अध्ययन किया। उन्होंने मार्शल आर्ट, दरबारी रीति-रिवाज और मुगल शिष्टाचार भी सीखा। उनके परिवार के पास शाही खजाने का वंशानुगत प्रभार होना मायने रखता था। सन 1901 में निजाम ने विकार-उल-उमरा को बर्खास्त कर किशन प्रसाद को रियासत का दीवान बना दिया। साथ ही उन्हें यामिन-उस-सल्तनत की उपाधि से नवाजा गया, जिसके मायने थे सल्तनत का दायां बाजू।
किशन प्रसाद का दर्जा भी राजा से बढ़कर महाराजा हो गया किशन प्रसाद ने बतौर दीवान ताबड़तोड़ कदम उठाये और मनसबदारों की आय घटाने के साथ ही कृषि, रेलवे और सीमा शुल्क में बढ़ोत्तरी की। नतीजतन राजस्व खूब बढ़ा। रियासत मालामाल हुई।बहरहाल, सन 1911 में महबूब अली के उपरांत उस्मान अली खान सिंहासनारूढ़ हुये तो किशन प्रसाद को अड़चनों का सामना करना पड़ा। फलत: उन्होंने दीवान के ओहदे से इस्तीफा दे दिया।
किशन प्रसाद को बतौर दीवान दूसरी पारी खेलने का मौका बीसवीं सदी की तीसरी दहाई में मिला। नवंबर, 1926 में वह पुन: दीवान बनाये गये और इस पद पर मार्च, 1937 तक रहे। कैसन वाकर से उनका इस काल में भी टकराव हुआ। वाकर जहां प्रशासनिक पदों पर अंग्रेजों की नियुक्ति का पक्षधर था, किशन प्रसाद मुल्कियों यानि स्थानीयों की नियुक्ति के हिमायती थे। वाकर और प्रसाद में टकराव चिंता का सबब था, लेकिन किशन प्रसाद मुल्की कानून पारित कराने में सफल रहे।
व्यक्तित्व: रसिक, बहुपत्नी और उदारमना
किशन प्रसाद का जीवन बड़ा दिलचस्प रहा। वह रसिक मिजाज शख्सियत थे। उनकी सात पत्नियां थीं; तीन हिन्दू और चार मुस्लिम। इनमें एक शिया मतावलंबी भी थी। मुस्लिम बीवियों से उन्हें छह और हिन्दू पत्नियों से नौ संताने हुई। सभी पत्नियों को अपने-अपने धर्म के पालन की स्वतंत्रता थी और संतानों का पालन-पोषण उनकी मांओं के धर्म के अनुरूप हुआ। उनका सेक्यूलर मिजाज देखिये कि मुस्लिम बच्चों के नाम मुस्लिम और हिन्दू बच्चों के नाम हिन्दू परंपरानुसार रखे गये।

किशन प्रसाद की अदब में गहरी रूचि थी। उनका पेंटिंग, संगीत और मूर्ति कला से भी गहरा लगाव था। उनके यहां फनकारों का तांता लगा रहता था। दूर फारस और अरब देशों से फनकार आते जाते थे। प्रसाद स्वयं शाद उपनाम से उर्दू और फारसी में पद्य लिखते थे। सूफी वाद उनकी रगों में था और गंगा-जमुनी तहजीब उनका मिजाज थे। उन्होंने महबू-अज-कलाम नामक उर्दू कविता का रिसाला भी निकाला। इसमें पहली गजल निजाम महबूब अली खां की थी और बाद की रचनाएं प्रसाद की।
एक हरफनमौला इंसान
किशन प्रसाद सही अर्थों में हरफनमौला शख्सियत थे। वह कद्रदां थे। वह फोटोग्राफी करते थे और सितार भी बजाते थे। वह दानी प्रवृत्ति के थे। उनके घर के दरवाजे अमीर-गरीब सबके लिये खुले रहते थे। सन 1903 में उन्हें केसीआईआई और सन 1910 में जीसीआई की पदवियां दी गयी। 4 फरवरी 1936 को उनकी नयी ड्योढ़ी की नींव रखी गयी। इस ड्योढ़ी के वास्तुकार थे मोहम्मद फयाजुद्दीन। 13 मई 1940 को उन्होंने फानी संसार को अलविदा कह दिया।
निजाम उस्मान ने कहा -उन्होंने मुगल साम्राज्य के अंतिम निशान को खत्म होते देखा है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने उनके बारे में कहा – उनके करिश्माई व्यक्तित्व और महान उदारता ने उन्हें जनता का प्रिय बना दिया। तत्कालीन हैदराबाद में सभी अच्छाइयों के सर्वोच्च व्यक्तित्व के रूप में उनकी प्रतिष्ठा ने यह सुनिश्चित किया कि महाराजा का अर्थ कोई और नहीं, बल्कि किशन प्रसाद है।
अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।



