फिर से दहल गया उत्तराखंड!
छोटे से गांव में इतने ज्यादा होटल, रिसोर्ट्स, सीमेंट कंक्रीट के ढांचे, महज पैसों के लालच के लिए गांव को तबाही के बम में तब्दील कर लेना नहीं तो और क्या है? जितना जरूरी हो हमारी राज्य सरकारों को उनके प्रशासनिक अमले को और स्थानीय लोगों को ये समझना होगा कि धरती के चप्पे-चप्पे को पर्यटन की ऐशगाह या धर्म के फैशनेबल उन्माद के हवाले नहीं किया जा सकता। हाल के सालों में देश के पहाड़ी राज्यों को जिस तरह बार-बार तबाही के मंजरों ने झकझोरा है, उससे जितना जल्दी हो सभी पीड़ित पक्षों को यह अक्ल आना जरूरी है कि कुदरत सिर्फ दोहन के लिए नहीं है।
आज भी जब 16-17 जून 2013 की रात का जिक्र आता है तो लोग नींद में भी सिहर जाते हैं। जब आकाश में बिजली चमक रही थी और नीचे मंदाकिनी नदी, राक्षसी की शक्ल लेकर उमड़ रही थी। केदारनाथ की यह भयावह आपदा 5 अगस्त 2025 को दोपहर 12 बजकर 40 मिनट पर उसके बाद 1 बजकर 27 मिनट और फिर 2 बजे यानी तीन बार 2013 की भयावह तबाही वाला मंजर उत्तरकाशी के तीन गांवों में दोहराया गया।
धराली में 34 सेकेंड की विनाशलीला
पहले धराली में रूह कंपा देने वाला मंजर 34 सेकेंड के भीतर सब कुछ तबाह कर गया। गंगोत्री के रास्ते में मुख्य ठहराव स्थल के रूप में जाना जाने वाला धराली गांव महज 34 सेकेंड की जलप्रलय में तबाह हो गया और मुख्य प्रशासनिक अधिकारी, चीफ सेक्रेटरी आनंद वर्धन की मानें तो लगभग 700 की आबादी वाले गांव में 4 लोगों की मौत हो गई और 100 लोग लापता हैं।
150 से ज्यादा घरों वाले इस गांव में 30 होटल रिसॉर्ट तथा 25 होम स्टे वाले गांव में महज आधे मिनट के भीतर, आधे से ज्यादा घरों, होटलों और रिसोर्ट्स का नामोनिशान नहीं बचा। ऐसे में जाहिर है प्रशासन द्वारा बतायी गई हताहत लोगों की संख्या अनुमान से भी कहीं ज्यादा हो सकती है। अभी लोग धराली के इस भयावह मंजर की हतप्रभता की जकड़ में ही थे कि ठीक दोपहर 12 बजे धराली गांव से 5 किलोमीटर दूर हर्शिल गांव में भी धराली की तरह ही एक भयावह बादल फट गया और तेलगाढ़ नाले में आयी ऊफनती हुई बाढ़ ने सेना के एक कैंप को अपनी चपेट में ले लिया।
इन पंक्तियों के लिखे जाने तक 11 जवान लापता थे और सेना का हैलीपेड बिल्कुल तबाह हो चुका था। हर्शिल की तबाही भी अभी हाहाकार कर रही थी कि ठीक 3 बजे एक और तबाही पास के सुक्खी गांव में हुई। यहां भी एक दर्जन से ज्यादा लोगों के गायब होने की बात कही जा रही है। हिमालय की दरार पर बसा धराली का यह भयावह मंजर 10 साल में तीसरी बार देखने को मिला। साल 2013 और 2014 में भी यहां बादल फटे थे, तब भी खीर नाले ने ऐसी तबाही मचायी थी।
आपदा बम पर बसा है धराली गांव
इससे पहले सन् 1864 में भी इसी तरह की तबाही ने धराली का नामोनिशान मिटा दिया था। 10 साल पहले भूगर्भ वैज्ञानिकों ने शासन-प्रशासन को धराली गांव को कहीं और बसाने की सलाह दी थी। कहते हैं प्रशासन ने भी गांव वालों से इसकी गुजारिश की थी, लेकिन यह गांव गंगोत्री के रास्ते में उस जगह बसा है, जहां गंगोत्री धाम तक पहुंचने से पहले का आखिरी बड़ा कैंप लगता है।
जाहिर है यहां तीर्थयात्रियों से बहुत ज्यादा आमदनी होती है, तो भला ऐसी कमाई वाली जगह को छोड़कर कौन जाना चाहता है। जबकि भूगर्भ वैज्ञानिकों ने शासन, प्रशासन और गांव वालों को तब भी बताया था कि आपदाओं के लिहाज से धराली गांव आपदा बम पर बैठा हुआ है। मगर सोर्स सिफारिश लगवाकर और शासन-प्रशासन में ओहदेदार अधिकारियों को खिला-पिलाकर यहां के लोग अपनी जगह पर ही बने रहे और 2013 के बाद तीसरी बार फिर से आपदा की चपेट में आने के कारण दो तिहाई से ज्यादा गांव का सारा ढांचा पतझड़ में गिरे मृत पत्तों की तरह उड़ गया।
धराली ट्रांस हिमालय की मेन सेंट्रल थर्स्ट में बसा हुआ है, वह भी 4000 मीटर के ऊपर। दरअसल यह थर्स्ट एक दरार है, जो मुख्य हिमालय को ट्रांस हिमालय से जोड़ती है। यह भूंकप का अति संवेदनशील क्षेत्र है, जिस पहाड़ से खीर गंगा नदी निकलती है। वह 6000 मीटर की ऊंचाई पर है। इसलिए जब सैलाब आता है तो वह बुलेट की माफिक तेज और भयावह होता है। अब तक के उदाहरण बताते हैं कि धराली में जब-जब तबाही आयी है, वह हृदयविदारक ही आयी है।
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बार-बार आपदाओं पर भी नहीं चेती सरकार
दरअसल पानी का प्रवाह इतने वेग से आता है कि मजबूत से मजबूत लोहे और सीमेंट का स्ट्रक्चर भी पानी के बुलबुले की तरह कुछ ही सेकेंड में ध्वस्त हो जाता है। पिछले पांच सालों में यानी 2020 से 2025 के बीच उत्तराखंड और हिमाचल में अत्यधिक वर्षा, बादल फटने और इस तरह की जलप्रलय की 7,700 से भी ज्यादा आपदाएं हुई हैं। हालांकि इनमें सरकारी आंकड़ों के मुताबिक मौतें बहुत ज्यादा नहीं हुई।
कुल 161 लोगों की मौत का और 230 से ज्यादा लोगों के गायब होने का ही सरकारी दस्तावेज पुष्टि करते हैं। लेकिन व्यवहारिक बुद्धि रखने वाला कोई भी इंसान समझ सकता है कि इन सरकारी आंकड़ों और हकीकत में कितना बड़ा फासला होगा। लेकिन असली चिंता की बात तो यह है कि जब महज 1875 दिनों के भीतर ही दर्ज आंकड़ों के मुताबिक 7000 से ज्यादा जलप्रलय की छोटी बड़ी सामान्य से लेकर बेहद डरावनी घटनाएं घटी हैं, इसके बाद भी हिमाचल और उत्तराखंड की सरकारों ने बार-बार इन घटने वाली तबाही की घटनाओं को रोकने के लिए आखिर क्या ठोस उपाय किए हैं?
उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश गर्व से ढिंढोरा पीटते हैं कि वे देश के सबसे पर्यटक अनुकूल राज्य हैं और दोनों ही राज्य दिन रात देश-विदेश के पर्यटकों को अपने यहां बुलाने के लिए नयी से नयी कोशिशें करते रहते हैं। आखिर इन राज्यों की सरकारों और प्रशासन को लगातार यह डराने वाला मंजर क्यों परेशान नहीं करता कि हर गुजरते साल के साथ मानसूनी आपदाओं में भयानक वृद्धि होती जा रही है?
प्राकृतिक संतुलन बनाएं, लालच से बचें
जब हजारों सालों से यहां स्थित धार्मिक तीर्थस्थलों पर लोग पहुंचते रहे हैं तो सरकारों को ये क्यों लगता है कि आज का इंसान बिना लग्जरी सुविधाओं के यहां तक नहीं पहुंच सकता। दरअसल यहां की सरकारें, प्रशासन और स्थानीय लोग पर्यटकों की खुशी और उनके आराम के लिए इन दुर्गम स्थानों पर सुविधाओं का यह रेला नहीं खड़ा कर रहे, यह रेला तो वे अपनी दिन दूनी, रात चौगुनी कमाई की ख्वाहिशों के लिए कर रहे हैं।
दरअसल यह सरकारों से लेकर स्थानीय लोगों तक का लालच है कि वह प्रकृति को अंगूठा दिखाते हुए पूरे साल इन क्षेत्रों को पर्यटकों से आबाद रखना चाहते हैं। आखिर किसी 150 वाले गांव में 30 से ज्यादा होटल व रिसोर्ट्स कहां का सामान्य आंकड़ा है? छोटे से गांव में इतने ज्यादा होटल, रिसोर्ट्स, सीमेंट कंक्रीट के ढांचे, महज पैसों के लालच के लिए गांव को तबाही के बम में तब्दील कर लेना नहीं तो और क्या है?

जितना जरूरी हो हमारी राज्य सरकारों को उनके प्रशासनिक अमले को और स्थानीय लोगों को ये समझना होगा कि धरती के चप्पे-चप्पे को पर्यटन की ऐशगाह या धर्म के फैशनेबल उन्माद के हवाले नहीं किया जा सकता। हाल के सालों में देश के पहाड़ी राज्यों को जिस तरह बार-बार तबाही के मंजरों ने झकझोरा है, उससे जितना जल्दी हो सभी पीड़ित पक्षों को यह अक्ल आना जरूरी है कि कुदरत सिर्फ दोहन के लिए नहीं है।
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