जब प्रेम कैफे नहीं, छतों और गलियों में बसता था

आज प्रेम की तस्वीर अकसर जगमगाते कैफे, रूफटॉप रेस्त्रां और मल्टीप्लेक्स की लॉबीज में दिखायी देती हैं। इंस्टागम स्टोरी, सेल्फी, कैंडल लाइट डिनर यही सब आधुनिक रोमांस के चेहरे हैं। वेलेंटाइन डे के आते ही सोशल मीडिया में ऐसी पोस्ट्स की भरमार हो जाती हैं, जिनका रिश्ता मुहब्बत की इन आधुनिक अड्डों से होता है। लेकिन जरा दो-तीन दशक पीछे मुड़कर देखिए, तो प्रेम का रंग बिल्कुल सादा, गहरा और कहीं ज्यादा आत्मीय दिखायी देता था। तब घर की छतें और मुहल्ले की पेचदार गलियां ही मुहब्बत को परवान चढ़ाने वाले अड्डे थे।

चाय की दुकानें: उस दौर के लव कैफे

वह प्रेम जो चाय की भाप में घुला होता था, कुल्हड़ की मिट्टी की खुशबू में बसा होता था और पास व दूर की छतों तथा सकरी गलियों में खामोशी से पनपता था। क्योंकि तब न तो मॉल थे, न फ़ूड कोर्ट। राधा-कृष्ण तक का प्रेम भी बरसाना की ऐसी ही संकरी गलियों में परवान चढ़ा था, जिसके बारे में कहा गया हैI


“प्रेम गली अति सांकरी, जा में दो न समाएं…”

अभी दो-तीन दशक पहले तक प्रेम के लिए सड़क किनारे वाली चाय की दुकानें, स्कूल या कॉलेज का रास्ता, रास्ते के मोड़ या धुंधलाती शामों में छतों की लुकाछुपी ही गुलाबी प्रेम के परवान पथ थे। एक जमाने में शहरों में कई ऐसी छोटी चाय की दुकानें हुआ करती थीं, जहां लकड़ी की बेंच पर प्रेमी जोड़े चाय के बहाने घंटों बतिआया करते थे। टेढ़ी-मेढ़ी मेज, केतली से उठती भाप और पास रखे मिट्टी के कुल्हड़ यही उस जमाने के लव कैफे थे।

जब डेटिंग मतलब सिर्फ देख लेना होता था

यहां प्रेम कोई घोषणा नहीं, प्रतीक्षा होता था। अक्सर लड़का पहले पहुंचता, दो कुल्हड़ चाय मंगवाता और फिर धीरे से लकड़ी की बेंच पर लड़की का आगमन होता। न कोई औपचारिक हाय, न गले लगना, न कोई बॉडी लैंग्वेज बस एक झिलमिलाती नजर, एक हल्की सी मुस्कान और चाय की मीठी चुस्की। चाय ठंडी हो जाती और बातों में धीरे-धीरे गर्माहट बढ़ती जाती। यही उन दिनों की डेटिंग।

यह अकारण नहीं कि कुछ दशक पहले की साहित्यिक कहानियों खासकर शिमला, हल्द्वानी, कसौली जैसी जगहों पर सेट कथाओं में दूर-दराज की चाय की गुमटियों में प्रेम की कहानियां बार-बार दृश्य बनकर उभरती थीं। आज भी छोटे पहाड़ी पर्यटन स्थलों पर किसी उम्रदराज चाय वाले से पूछिए, तो वह दर्जनों प्रेम-किस्से सुना देगा, उन दिनों कुल्हड़ सिर्फ मिट्टी का बर्तन नहीं था, एक एहसास था। उसका खुरदुरा स्पर्श, मिट्टी की सोंधी खुशबू और हल्की सी गर्माहट कई बार एक ही कुल्हड़ में चाय पी ली जाती थी, जानबूझकर नहीं, संयोग से। आज कुल्हड़ों में बसी यादों वाली प्रेम कहानियां नहीं रहीं।

गलियां: प्रेम की सुरक्षित पनाहगाह

पुराने शहरों की गलियां भी मुहब्बत के अड्डे हुआ करती थीं। गलियां प्रेम को गुमनाम आजादियां देती थीं। हाथ पहली बार गलती से छूते थे और जानबूझकर नहीं हटाए जाते थे। डर भी होता था कोई देख न ले और वही डर रोमांच भी बन जाता था। तब बिना नाम वाला भी प्यार होता था। न कमिटेड, न सिचुएशनल, न ब्रेकअप स्टेटस जैसे शब्द। बस दोस्तों से इशारे में कहा जाता था “वह मेरी है” या “वह मेरा है।” प्यार साबित करने के लिए न महंगे गिफ्ट थे, न उनकी जरूरत उन दिनों बड़ी मशक्कत से मिला थोड़ा सा साथ बिताया समय ही सबसे बड़ा गिफ्ट होता था। न मैसेज, न वीडियो कॉल सिर्फ इंतजार। पूरा दिन इसी सोच में गुजरता था कि मुलाकात होगी या नहीं। न मिलने पर न ब्रेकअप होता था, न दिल टूटते थे। क्योंकि तब मिलना संयोग था और न मिलना आम बात।

धीमा लेकिन गहरा प्रेम

साथ पैदल चलना, एक पेन शेयर करना, किताबों के बीच नोट रखना, बारिश में भीगते हुए घर तक जाना ये घटनाएं नहीं, प्रेम के उत्सव थे। पार्क की आखिरी बेंच, नदी का किनारा, बस स्टैंड, स्कूल लाइब्रेरी यहीं प्रेम की पाठशालाएं लगती थीं। आज कैफे और मॉल प्रेम के ठिकाने हैं। तब यही गलियां और चाय की दुकानें थीं। फर्क बस इतना है कि तब प्रेम धीमा था, लेकिन गहरा और टिकाऊ। आज प्रेम चमकदार है, लेकिन क्षणजीवी। बहस यह नहीं कि कौन सा दौर बेहतर है। प्रेम हर दौर में नायाब है। फर्क बस इतना हैI
वह दौर था जब प्रेम को समय दिया जाता था, और यह दौर है जब प्रेम समय से लड़ रहा है।

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