अन्तर्हृदय में कौन बसा है
गुरु द्रोणाचार्य दुर्योधन तथा अर्जुन दोनों के गुरु थे। उन्होंने अर्जुन को शिष्य के रूप में स्वीकार किया तथा अर्जुन ने उन्हें गुरु माना। उन्होंने दुर्योधन को भी शिष्य के रूप में स्वीकार किया, परंतु उसने उन्हें अपना गुरु नहीं माना। तीसरा नाम भी स्मरण करें- एकलव्य। उसे द्रोणाचार्य ने अपना शिष्य स्वीकार नहीं किया, परंतु उसने उन्हें अपना गुरु माना। इन तीनों में ग्रहण करने का सबसे अधिक सामर्थ्य एकलव्य में था। उसके पास साक्षात् गुरु नहीं थे।
अत उसने उनकी प्रतिमा गढ़ी एवं उसमें अपनी श्रद्धा अर्पित की। द्रोणाचार्य ने उसे विद्या प्रदान नहीं की, तथापि उसने स्वयं की श्रद्धा से ग्रहण की। यह ग्रहणशीलता की शक्ति है। ग्रहण करने के लिए आपको अपने अतिरिक्त किसी और की आवश्यकता नहीं है। आप स्वयं ग्रहण कर सकते हैं, पूर्ण स्वतंत्रता से ग्रहण कर सकते हैं, यह आपके अंदर की प्रक्रिया है। एकलव्य को अपने मनोबल के अतिरिक्त किसी की आवश्यकता नहीं थी, उस गुरु की भी नहीं, जिनका वह परम भक्त था। वह जब भी तीर चलाता था, तो अपने श्रद्धेय द्रोणाचार्य का अन्तर्हृदय में ध्यान करता था।
केवल श्रद्धा नहीं, ग्रहणशीलता भी ज़रूरी है
वहीं से उसे संकेत प्राप्त होते थे, जो उसके अंदर रूपान्तरित हो जाते थे। यह है, लेश्या की शक्ति। आपके अन्तर्हृदय में कौन बसा है? आपकी श्रद्धा किस पर टिकी है? स्वयं की जाँच करें। क्या श्रद्धा आवश्यक है किसी भी पदार्थ की द्रव्य लेश्या में वर्ण, गंध, स्पर्श, रस चारों होते हैं। इसका अभिप्राय है कि वे इंद्रियों द्वारा ग्रहणशील हैं, तन-मन द्वारा ग्रहण हो सकती हैं। इसके लिए श्रद्धा आवश्यक नहीं है।
यहीं प्राय मनुष्य त्रुटि करता है। वह नादान समझता है कि हममें श्रद्धा है। अत यही हमारे जीवन में सुख, समृद्धि तथा चमत्कार बरसाएगी। इस नासमझी में वह अपनी ग्रहण शक्ति पर ध्यान नहीं देता है, परंतु सत्य यही है कि जैसा ग्रहण करेंगे, वैसे परिणाम प्राप्त होंगे। बुखार उतारना हो तब औषधि का ज्ञान आवश्यक है या औषधि को ग्रहण करना आवश्यक है?
आपको वैद्य में विश्वास है अथवा नहीं, आपकी इच्छा है या नहीं, परंतु औषधि ग्रहण करने से ही स्वस्थ होंगे। इसी प्रकार आपको अपने इष्ट में श्रद्धा है, तब विचार कीजिए कि क्या आप मात्र श्रद्धा में जी रहे हैं या उनकी ऊर्जा भी ग्रहण कर रहे हैं? उनके जीवन से मात्र ज्ञान अर्जित करेंगे या स्वयं में उन गुणों को विकसित करेंगे? इस विषय पर अन्तर्मन से चिन्तन-मनन करें तथा अपनी ग्रहणशीलता बढ़ाएँ। प्राय श्रद्धा भाव सुप्त रहता है। जागृत श्रद्धाभाव में ग्रहण की प्रक्रिया सहज संपन्न होती है। यह सभी प्रयोग जागृत श्रद्धाभाव के हैं।

- श्रद्धा है अथवा नहीं, ग्रहण करेंगे तब ही परिणाम प्राप्त होंगे।
- श्रद्धा है, परंतु ग्रहण नहीं किया, तब परिणाम प्राप्त नहीं होंगे।
- श्रद्धा तथा ग्रहण दोनों हैं, तब सोने पे सुहागा।
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