शिव से शिवांश तक एक अनूठी यात्रा-वृतांत

कैलाश-मानसरोवर यात्रा पर वृत्तांतों की कमी नहीं है। विभिन्न विशद जानकारियां उपलब्ध हैं, लेकिन कुछ विषय या प्रसंग ऐसे होते हैं, जिन पर कितनी भी कृतियां या सामग्री उपलब्ध क्यों न हो, लेखन के लिए स्पेस या गुंजाइश बची रहती है। भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी ओमप्रकाश श्रीवास्तव की भारती के साथ रची कृति शिवांग से शिव तक इसी की पूर्ति करती है।
तीर्थ के बहाने अंतर्यात्रा
वह तीर्थयात्रियों की भी सारणियां होती हैं। प्राय उनका अभीष्ट होता है पुण्य लाभ, लेकिन एक श्रेणी ऐसे तीर्थयात्रियों की भी होती है, जो आध्यात्मिक अनुभूति पाना चाहते हैं। कैलाश मानसरोवर यात्रा पर वृत्तांतों की कमी नहीं है। विभिन्न विशद जानकारियां उपलब्ध हैं, लेकिन कुछ विषय या प्रसंग ऐसे होते हैं, जिन पर कितनी भी कृतियां या सामग्री उपलब्ध क्यों न हो, लेखन के लिए स्पेस या गुंजाइश बची रहती है। ओमप्रकाश श्रीवास्तव की भारती के साथ रची कृति शिवांग से शिव तक इसी की पूर्ति का ऐसा उपाम है, जो कैलास मानसरोवर पर प्रामाणिक और श्रेष्ठ लेखन की परंपरा में कुछ नया जोड़ता है।
पुस्तक के आवरण पर शीर्षक के साथ है उपशीर्षक मानसरोवर यात्रा में शिवत्व की खोज। ये शीर्षक कंटेंट को बखूबी उजागर करते हैं। आध्यात्मिक पृष्ठभूमि वैज्ञानिक एवं तार्किक आधारों पर लिखित यह यात्रा वृत्तांत धर्म और दर्शन के रहस्यों को रोचकता से प्रस्तुत करता है और पाठकों को कैलाश मानसरोवर की मनोयात्रा करा देता है। श्रीवास्तव दंपत्ति के लिए कैलाश मानसरोवर की यात्रा वर्षों के संचित स्वप्न के साकार होने का प्रसंग है। उनकी मान्यता है कि यह सब मनुष्यों के पूर्व कर्मों, प्रारब्ध, वर्तमान विचारों और पुरुषार्थ के साथ ही शिवकृपा से तय होता है।
जब यह घटित होता है तो कड़ी से कड़ी जुड़ती जाती है। वे बताते हैं कि 31 मई, 2014 को दिल्ली से फोन पर सूचना मिलने के साथ ही तैयारियों का कठिन दौर शुरू हो गया। कठिन पहाड़ी रास्तों और बर्फ में 200 किमी से ज़्यादा चलना किसी कठिन परीक्षा से कम न था, मगर चाह ने राहें खोली। तड़के टहलने, ट्रेडमिल पर वर्जिश और प्राणायम का दौर शुरू हुआ। संकल्प लिया कि यात्रा पैदल ही करेंगे और यथासंभव घोड़े की सवारी से बचेंगे। इसे ईश्वरीय विधान कहें या कुछ और कि विदेश मंत्रालय ने कई श्रद्धालुओं का चयन किया, किन्तु उनमें से भारती-ओम समेत 49 यात्री ही यात्रा के लिए रवाना हो पाए।
उनकी ऐसी रोचक रोमांचक यात्रा प्रारंभ हुई, जिसमें अनेकश लोमहर्षक प्रसंग आये। प्रसंगवश उल्लेखनीय है कि कैलाश तिब्बत के आधिपत्य में है। यह मात्र हिन्दुओं का महातीर्थ नहीं है, बल्कि बौद्धों और जैनों का भी है। यह शिव-शंकर का वास स्थान है, तो अवलोकितेश्वर का निवास और प्रथम जैन तीर्थकर का निर्वाण स्थल भी है। सन् 62 के भारत-चीन युद्ध के उपरांत बीस वर्षों तक भारतीयों का आगमन वहाँ प्रतिबंधित रहा।
सन् 1981 में भारत सरकार के अथक प्रयासों से चीन ने प्रतिवर्ष 1080 यात्रियों को लिपुलेख दर्रे के परंपरागत मार्ग से यात्रा की अनुमति दी। दिल्ली से मानसरोवर तक की यात्रा पर सवा लाख से डेढ़ लाख रुपयों के बीच खर्च आता है और अनेक औपचारिकताओं की पूर्ति करनी होती है। यहाँ तक कि यात्रा में मृत्यु होने पर चीनी अफसरों की इच्छानुसार अंत्येष्टि पर सहमति भी होती है। कभी तिब्बत में लोथ के टुकड़े गिद्धों का आहार बना करते थे, किन्तु अब लाश के टुकड़े मुख्यत खूंखार कुत्तों का निवाला बनते हैं।

इस आशय के दस्तावेज पर दस्तखत का अर्थ था, देह के मोह से मुक्ति। लेखक का कहना है कि मृत्यु के बारे में चिंतन अद्भुत अनुभव था, शिवांश से शिव तक की यात्रा की अनिर्वच अनुभूति का पहला कदम। उन्हें डोल्मा-ला की यात्रा के समय ज्ञात हुआ कि समीपवर्ती पर्वत पर 84 सिद्धों की आकाश-समाधियां हैं। यह सदियों तक पुरजोखिम यात्रा का नतीजा ही है कि यह मान्यता बनी कि कैलाश जाना सौभाग्य की बात है, तो वहाँ से न लौट पाना परम सौभाग्य की। इस भावना के वशीभूत लेखक ने यात्रा के पूर्व चुपचाप अपनी वसीयत भी लिख दी। इससे उनमें जागृत हुआ, शिवांश से शिव की यात्रा का दूसरा कदम।
कैलाश-मानसरोवर की यात्रा क्या थी, तपस्या थी। सम, दम और तितिक्षा प्रदायिनी ओमप्रकाश श्रीवास्तव भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी रहे हैं। मनोवृत्ति के चलते उन्होंने अपने लिए विविधवर्णी विषयों के बजाय आध्यात्मिक संकाय चुना और प्रगाढ़ अध्ययन और मनन से विषय में पारंगतता अर्जित की। इस तैयारी और उपाम में उनकी सहधर्मिणी भारती भी यकसां शरीक रहीं। कैलाश मानसरोवर की दुर्गम कष्टसाध्य और साहसिक यात्रा भारती और ओमप्रकाश ने संग-साथ की और अनुभूतियों के दुर्लभ लोक में संग-साध विचरण किया।

तपस्या, ऐसी तपस्या जिसमें प्रकृति के शुद्धतम रूप से साक्षात्कार होना था। लेखक ने इसे लाइफ टाइम अचीवमेंट की संज्ञा दी है। यात्रा वृतांत को पढ़ना यकीनन दिलचस्प अनुभव से गुजरना है। पैदल यात्रा का पहला पड़ाव था गुंजी (10,370 फुट)। यहाँ से लिपुलेख दर्रा (17,495 फुट) और फिर तिब्बत में लकलाकोट (12,930 फुट) और तदंतर 18,532 फुट पर स्थित डोल्मा-ला। यहीं कविर्मन लेखक कह उठता है कि पर्वतों का भी अपना व्यक्तित्व होता है और चेतना का सम्मान करना चाहिए। इस यात्रा में शिवांश शिव में समाहित होता है। व्यष्टि समष्टि का अंश हो जाता है।
लेखक ने रास्ते में कीट व कवक के योग से निर्मित 15 से 20 लाख रुपये कीमत की कीट जड़ी भी देखी, जिसकी चीन, जापान, थाईलैंड और वियतनाम में भारी मांग है। यात्रा में निराश्रय ने ईश्वर पर श्रद्धा को दृढ़ किया। कालीगंगा को देखना लेखक के मन में कविता का उमगना था। बानगी देखिये… नदियां अपने जन्मस्थान पर शिशुवत होती हैं। एक क्षीण जलधारा, जिसकी कल-कल ध्वनि नवजात शिशु के रूदन-सी कोमल होती है।
आगे चलकर नदी किशोरी-सी अल्हड़ और चंचल हो जाती है। उसका जल पवित्र और स्वच्छ होता है। उसकी जलधारा पहाड़ी चट्टानों से टकरा कर कैशोर्य के गीत गाने लगती है। आगे नदी का यौवन आता है, तब वह अनेक झरनों, नालों, छोटी नदियों से संगम करती हुई आगे बढ़ती है। उद्दाम यौवन की तरह वह हर तरह के बंध तोड़ देना चाहती है। यात्रा के क्रम में लेखक छियालेख की मनोरम फूलों की घाटी, गांग आदि कैलाश, नावीडांग का उल्लेख करता है। नाबीडांग के रास्ते का वर्णन देखिये- नालीतांग के रास्ते के किनारे छोटी घास मिलती है, जिस पर बैंगनी रंग के छोटे-छोटे पुष्प खिले थे।
यह इतने छोटे और घने थे, जैसे धरती पर बैंगनी गालीचा बिछा दिया हो। इसके बीच-बीच में चट्टानों पर नारंगी रंग की कवक उगी थी। गली के बीच नारंगी टीले अद्भुत दृश्य निर्मित कर रहे थे। लेखक के साथ पाठक भी स्वर्गीय सौन्दर्य से बंजर पठारों की ओर बढ़ता है। वह तकलाकोट से निकलकर दारचेन से गुरला दर्श होते हुए बरखा मैदान से गुजरता है। वह पवित्र राक्षसताल पहुँचता है और लाचातो तथा तोप्सेरमा नामक युग द्वीप देखता है। वह पुरखों की स्मृति में निर्मित पत्थर-दर-पत्थर रखकर बनाए बौद्धों के सैकड़ों चोरतेनों का दर्शन करता है।
लोकमान्यता है कि राक्षसपाल रावण की लघुशंका से निर्मित सरोवर है। इसी के दक्षिण में गुरला मान्धाता (मेमो नामग्याल) पर्वत स्थित है, जहाँ कैलाश की खोज का श्रेय प्राप्त मांधाता ने तपस्या की थी। वे आगे बढ़ते हैं तो 20 मिनट बाद ही उन्हें जैदी में विशाल, स्वच्छ मीठे पानी के झील के दर्शन होते हैं, जहाँ देवी-देवता व सिद्ध आत्माएं मज्जन (स्नान) को आती हैं। लेखक ने 14वें अध्याय में कैलास या कैलाश की दुविधा और क्या कैलास ही सुमेरु पर्वत है, पर गहन विचार किया है।
क्या गंगा कैलास से निकली है और क्या यह विश्व की आध्यात्मिकता का केन्द्र है पठनीय व विचारणीय है। उन्होंने कैलास के संदर्भ में हिन्दू, बौद्ध, जैन, ईसाई और बान-पा धर्मों पर भी विचार किया है। उन्होंने भारतीय स्थापत्य पर कैलास के प्रभाव को भी आंका है। इसी अध्याय में पद्मसंभव और निलारेपा की महत्ता के साथ ही स्वामी प्रणवानंद, स्वामी अपूर्वानंद, श्री हंस स्वामी और डॉ. स्वेन हेडिन के अनुभव भी समेटे हुए हैं। कौन यकीन करेगा कि प्रणवानंद ने सन् 1928 से 1954 के मध्य कैलास मानसरोवर की 33 परामाएं कीं।
यह सदियों तक पुरजोखिम यात्रा का नतीजा ही है कि यह मान्यता बनी कि कैलाश जाना सौभाग्य की बात है, तो वहाँ से न लौट पाना परम सौभाग्य की। इस भावना के वशीभूत लेखक ने यात्रा के पूर्व चुपचाप अपनी वसीयत भी लिख दी। डॉ. क्रटिन तो कहते हैं कि कोई भी भाषा या शब्द इस सरोवर का वर्णन नहीं कर सकते। कैलास के दक्षिणी, पश्चिमी और उत्तरी मुखों के दर्शन के अध्याय अत्यंत रोचक हैं। मां तारा के डोल्मा-ला का वृतांत अनूठा है। पूर्वी मुख के दर्शन का अध्याय भी इसी का अनुवर्ती है। अध्याय 21 में मानसरोवर झील के बखान में लेखक ने मानो अपने प्राण उड़ेल दिये हैं।
किताब में अन्य अनेक प्रसंग हैं, जो हमारे ज्ञान कोष को समृद्ध करते हैं। दिलचस्प तौर पर लेखक इतिहास की गुहा गत्थर में भी धंसा है। कश्मीर के महाराज गुलाबसिंह के शूरवीर सेनापति सरदार जोरावर सिंह की कैलास मानसरोवर विजय गाथा और सन् 1841 में वीरगति का प्रसंग इतिहास के अल्पज्ञात किन्तु महत्वपूर्ण अध्याय हैं। यह अकारण नहीं है कि लेखक लेखन की परिधि में इस जिज्ञासा को भी समेटता है कि क्या कैलास कभी भारत में आ पाएगा?

लेखक ने इस प्रश्न का सीधा और स्पष्ट उत्तर दिया है। शिवांश से शिव तक यात्रा वृत्तांत की श्रृंखला की अनूठी कड़ी है। कृति में बारीकियां है और विस्तार भी। भाषा विषयानुकूल और प्रवाहमयी है। कैलास मानसरोवर की यात्रा के अभिलाषियों के लिए कृति के सप्त परिशिष्ट उपयोगी हैं। अगर कोई यात्रा किसी ट्रैवेलॉग की निमित्त बनती है, तो इसे यात्रा की द्विगुणित सफलता ही मानना चाहिए।
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