नारी शक्ति वंदन : परिपूर्ण लोकतंत्र की दिशा

दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित नारी शक्ति वंदन सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संबोधन मात्र एक औपचारिक भाषण नहीं था, बल्कि 21वीं सदी के सबसे बड़े लोकतांत्रिक सुधार की दिशा में एक ठोस कदम था। उन्होंने साफ कहा कि भारत 21वीं सदी का सबसे बड़ा निर्णय लेने जा रहा है, जो पूरी तरह नारी शक्ति को समर्पित है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 को 2029 तक लागू करने के लिए संसद के विशेष सत्र में संशोधन लाने के ऐलान के साथ उन्होंने विपक्ष सहित सभी दलों से सहयोग की अपील की। कहना न होगा कि यह संबोधन न केवल अधिनियम के समयबद्ध क्रियान्वयन का आह्वान था, बल्कि सामाजिक न्याय को शासन की संस्कृति का अभिन्न अंग बनाने का संकल्प भी था।
इस संबोधन के निहितार्थ गहरे हैं। 2023 में नए संसद भवन में सर्वसम्मति से पारित अधिनियम ने 33 प्रतिशत आरक्षण की नींव रखी थी। लेकिन जनगणना और परिसीमन के बाद लागू होने की प्रक्रिया लंबित थी। प्रधानमंत्री ने इसे दशकों की प्रतीक्षा का अंत बताते हुए साफ किया कि लोकसभा से लेकर विधानसभाओं तक महिलाओं की भागीदारी लोकतंत्र को मजबूत करेगी। यह संदेश केवल आरक्षण तक सीमित नहीं; यह परिवार, समाज और राजनीति में महिलाओं की बदलती भूमिका को उजागर करता है।
स्थानीय नेतृत्व से राष्ट्रीय संसद तक महिलाओं की पहुंच
संबोधन का मूल संदेश था – स्थानीय स्तर पर साबित हुई क्षमता अब राष्ट्रीय संसद तक पहुंचे। गौरतलब है कि इस मामले में, दुनिया के संदर्भ में, भारत की स्थिति चिंताजनक रही है। वैश्विक स्तर पर 2026 में संसदों में महिलाओं का औसत 27.5 प्रतिशत है, जबकि 28 देशों में राष्ट्राध्यक्ष या सरकार प्रमुख महिला हैं। रवांडा, क्यूबा, मेक्सिको, स्वीडन और फिनलैंड में 40-60 प्रतिशत तक प्रतिनिधित्व है, जहाँ लंबे समय से आरक्षण या सकारात्मक कार्रवाई लागू है।
वहीं, कई अरब देशों में यह 10 प्रतिशत से नीचे है। भारत में पंचायती राज में 46 प्रतिशत महिला प्रतिनिधित्व विश्व का सबसे बड़ा प्रयोग है, जो साबित करता है कि आरक्षण से बदलाव संभव है। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर 14 प्रतिशत की स्थिति लोकतंत्र के अधूरे रह जाने की कहानी कहती है! प्रधानमंत्री ने इस अधूरेपन को पूरा करने का आह्वान किया। यह न केवल 2029 का लक्ष्य है, बल्कि विकसित भारत 2047 की नींव भी।
यदि सभी दल मिलकर इसे लागू करें, तो नारी शक्ति वंदन लोकतंत्र का नया अध्याय बन सकता है, जिसमें निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी सामाजिक न्याय का स्वाभाविक हिस्सा हो। समय आ गया है कि हम नारी शक्ति को केवल अभिवादन न करें, बल्कि उसे साझा शक्ति बनाएँ। इस कदम के परिणाम बहुआयामी होंगे। सबसे पहले तो, राजनीतिक प्रतिनिधित्व में संतुलन आएगा।
महिला आरक्षण से नीति-निर्माण में बढ़ेगी संवेदनशीलता
आरक्षण लागू होने से लोकसभा की एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। इससे नीति-निर्माण में लिंग-संवेदनशीलता बढ़ेगी, जैसा पंचायतों में देखा गया। दूसरा, सामाजिक न्याय की संस्कृति मजबूत होगी। दशकों से चली आ रही असमानता का अंत होगा और युवा पीढ़ी को प्रेरणा मिलेगी। तीसरा, आर्थिक सशक्तिकरण को गति मिलेगी। महिला सांसदों की बढ़ती संख्या से महिला-केंद्रित योजनाएँ (बेटी बचाओ – बेटी पढ़ाओ, उज्ज्वला, आयुष्मान) अधिक प्रभावी होंगी। चौथा, राजनीतिक संस्कृति बदलेगी।
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पार्टी टिकट वितरण, चुनावी रणनीति और संसदीय बहस में महिलाओं की गोचरता बढ़ेगी। लेकिन, यह इतना भी आसान नहीं। आरक्षण लागू होने के बाद भी वास्तविक सशक्तिकरण के लिए प्रशिक्षण, सुरक्षा और संसाधन जरूरी होंगे। कुछ दलों में आंतरिक विरोध या उप-कोटा की माँग फिर उभर सकती है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री ने संवाद, सहयोग और भागीदारी पर जोर देकर इसे साझा जिम्मेदारी बताया है। फिलहाल, नारी शक्ति की वंदना में शकील जमाली का यह शेर:
अभी रौशन हुआ जाता है रस्ता,
वो देखो एक औरत आ रही है!
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