चुगली का पलटवार

चाणक्य के आश्रम में एक शिष्य था, जिसे दूसरों की बातें इधर-उधर पहुंचाकर आनंद मिलता था। उसकी इस आदत ने पूरे आश्रम का माहौल बदल दिया था। जहां पहले शांति थी, वहीं अब छोटी-छोटी बातों पर विवाद होने लगे।

एक दिन चाणक्य ने उसे पास बुलाकर एक तकिया थमाते हुए कहा- जाओ, पूरे गांव में घूमकर आओ और इस तकिए की रूई को हवा में उड़ाते जाओ। शिष्य को चाणक्य की यह बात अजीब लगी, लेकिन उसे वैसा ही किया था। वह लौटकर आया, तो चाणक्य ने शांत स्वर में कहा- अब जाओ, उन सारे रुई के टुकड़ों को इकट्ठा करके ले आओ।

चाणक्य का कथन सुनर शिष्य हंसते हुए कहने लगा- गुरुजी, यह कैसे संभव है? वे तो हवा में बिखर गए होंगे। चाणक्य ने कहा- जैसे ये रूई के टुकड़े हवा में फैलकर कभी वापस नहीं आ सकते, वैसे ही तुम्हारे शब्द भी लोगों के दिलों में फैल जाते हैं। तुम एक पल के आनंद के लिए जो चुगली करते हो, वही आनंद कभी तुम्हारे लिए पलटवार बनकर लौट सकता है तब चाहकर भी तुम उसे समेट नहीं पाओगे। चाणक्य की बात सुनते ही शिष्य का सिर शर्म से नीचे झुक गया। उसे समझ आ गया कि उसका आनंद वास्तव में दूसरों के दर्द की कीमत पर था।

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-मुनीष भाटिया

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