प्रभु की प्राप्ति के लिए त्यागें अहंकार : हरिप्रियाजी
हैदराबाद, भगवान और भक्त के बीच सबसे बड़ा रोड़ा अहंकार है। जहाँ अहंकार होगा, वहाँ प्रभु नहीं होते। अहंकार का त्याग करने से ही जीव को भगवान की प्राप्ति का मार्ग मिलता है। उक्त उद्गार सिद्दिअंबर बाजार स्थित बाहेती भवन में राजस्थानी जागृति समिति द्वारा आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के छठे दिवस कथा की महत्ता बताते हुए कथावाचक बाल विदुषी हरिप्रिया वैष्णवीजी ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि भगवान ने अनेक राक्षसों का दमन कर ब्रजवासियों की रक्षा की है और गिरिराज को अपना स्वरूप बताया।

भगवान ने स्वर्ग के राजा इंद्र का मान भंग किया। दशम स्कंध के पूर्वार्ध एवं उत्तार्थ में 90 अध्याय हैं, जिसमें 29 से 33 अध्याय को पंचाध्यायी कहा जाता है। हरिप्रियाजी ने कहा कि रास भगवान को समझने का सर्वोत्तम उपाय है। रास में प्रवेश करते ही प्रभु के दिव्य अलौकिक वैभव के दर्शन होते हैं। उसी वैभव के साथ एक जीव का मिलन भी होता है। रास कोई नृत्य नाट्य मनोरंजन नहीं, रास तो भक्त को भगवान से मिलने का समय प्राप्त करवाता है।
ठाकुरजी ने शरद पूर्णिमा की रात्रि में बंसी से गोपियों के चित्त रूपी मणि को चुराने का आग्रह किया। शरद की रात्रि शीतलता व आनंद की अनुभूति करवाती है। ठाकुरजी ने चीरहरण लीला के समय गोपियों को आगामी शरद पूर्णिमा में रासलीला करने का वचन दिया था, जिसे पूर्ण किया। उन्होंने कहा कि सुहागन स्त्रियों की पहचान श्रृंगार होती है, इसलिए श्रृंगार करते रहें, ताकि अधिक समय तक सुहागन बनी रह सकें।
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बंसी की धुन से गोपियों के आकर्षण का वर्णन
जब तक ठाकुर चित्त को नहीं चुरायेंगे, तब तक जीव उनके पास नहीं आएगा। चित्त चुराने के बहाने से जीव आ जाता है। बंसी की तान से श्रीराधा नाम निकलता है। राधा नाम आनंद देता है। राधा नाम जपने से चिंता मिट जाती है। टाकुरजी को राधा से लगाव है। वेणु की धुन से सारी गोपियाँ चली आयीं। ठाकुरजी ने गोपियों को ज्ञानोपदेश देते हुए कहा कि स्त्रियों को रात्रि में बाहर नहीं रहना चाहिए, पतियो के आदेश के बिना बाहर नहीं निकलना चाहिए, पति कैसा भी हो उसकी सेवा करना पत्नी का धर्म है।
प्रभु गोपियों को भेजना चाहते हैं, पर वह मना कर देती हैं। तब प्रभु सभी गोपियों के साथ रास करते हैं। इस प्रकार आत्मा परमात्मा का मिलन होता है। रास के दौरान गोपियों में अहं भाव के जागृत होने पर प्रभु अंतर्ध्यान हो गये और बाद में गोपियों को जब अपनी गलती का पछतावा हुआ और माफी माँगी, तब प्रभु फिर से रास करते हैं। हरिप्रियाजी ने कंस वध और रुक्मणि श्रीकृष्ण विवाह की लीला का रसपान करवाया।
अवसर पर गिरिराज महाराज, श्याम महाराज, हरिकिशन ओझा, मुरलीधर गुप्ता, गोविन्द बिरादर, जयप्रकाश लड्डा, बालाप्रसाद लड्डा, आशा देवी सोमाणी, बबिता सोमाणी, कविता सोमाणी, द्वारकाप्रसाद काबरा, श्रीनिवास सोमाणी, महेश अग्रवाल, संजय राठी, रमेश मोदानी, मनीष सोमाणी, जेठालाल महाराज, दामोदर सोमाणी, जया सोमाणी, प्रेम लाहोटी, लक्ष्मी दत्ता, उर्मिला मोदानी, बालाप्रसाद मोदानी, प्रेमलता बाहेती, कमल भट्टड़, नारायणलाल बाहेती, चाँदमल सीताराम गोयल व अन्य उपस्थित थे।
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