योग और आयुर्वेद से मधुमेह नियंत्रण पर लगी विज्ञान की मुहर

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हैदराबाद, मधुमेह के इलाज को लेकर पतंजलि के वैज्ञानिकों की ओर से किए गए शोध ने क्रांति को जन्म दिया है, जो वैश्विक स्तर पर लंबे समय से टाइप-1 मधुमेह के मुख्य उपचार इंसुलिन थेरेपी को लेकर नजरिया बदलने को मजबूर कर देगा। अंतरराष्ट्रीय शोध संस्थान फ्रंटियर्स इन क्लीनिकल डायबिटीज़ एंड हेल्थकेयर शोध ने यह प्रमाणित किया कि केवल इंसुलिन से नहीं, बल्कि समग्र इलाज से मधुमेह को मात दी जा सकती है।

जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, इसके लिए योग, प्राणायाम, ध्यान, संतुलित आहार, जीवनशैली में सुधार तथा पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को अपनाना होगा। अप्रैल माह में शोध को प्रकाशित किया गया है। शोध में यह भी साबित किया कि योग-प्रणायाम आदि को अपनाने से मरीजों के मधुमेह नियंत्रण, तनाव स्तर और जीवन की गुणवत्ता में भी सुधार देखा गया। शोध अध्ययन में लगभग 612 शोध पत्रों का विश्लेषण किया गया। इस शोध को पतंजलि योगपीठ के महामंत्री आचार्य बालकृष्ण ने लीड किया। इस शोध ने यह भी प्रमाणित किया कि पतंजलि वेलनेस का वह मॉडल है, जिससे करोड़ों मरीज़ पहले से लाभ उठा रहे हैं और अब विज्ञान भी इसे सार्थक बता रहा है।

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अग्न्याशय की कोशिकाओं के नष्ट होने से बढ़ता खतरा

टाइप 1 मधुमेह मेलिटस (टीवनडीएम), जिसे पहले जुवेनाइल मधुमेह कहा जाता था, एक दीर्घकालिक जीवनशैली संबंधी रोग है। इसमें अग्न्याशय (पैंक्रियाज़) की इंसुलिन बनाने वाली कोशिकाओं का नाश हो जाता है, जिससे शरीर में इंसुलिन की पूर्ण कमी हो जाती है और रक्त शर्करा (ब्लड ग्लूकोज) का स्तर अनियंत्रित हो जाता है। कुछ मामलों में अग्न्याशय से संबंधित ऑटोएंटीबॉडी कम मात्रा में पाए जाते हैं, इसलिए इसे इडियोपैथिक (ऊ1) डायबिटीज भी कहा जाता है। विश्व में हर पाँच में से एक बच्चा, जिसे टीवनडीएम होता है, भारतीय मूल का होता है।

यह रोग आमतौर पर बचपन या किशोरावस्था में शुरू होता है, लेकिन वयस्कों में भी हो सकता है, जहाँ इसके लक्षण धीरे-धीरे और हल्के होते हैं। हर साल लगभग 65,000 बच्चों में इसका निदान होता है। इसकी दर हर साल लगभग 3 प्रतिशत बढ़ रही है। शोध को मजबूत मानकों पर जाँचा गया। शोध का निष्कर्ष निकालने से पहले उसे चार मानकों पर कसा गया। इसमें क्लीनिकल उपचार, योग और वैकल्पिक चिकित्सा, आयुर्वेद और भारत केंद्रित दृष्टिकोण और व्यायाम व ग्लूकोज नियंत्रण शामिल हैं।

शोध में पतंजलि हर्बल रिसर्च डिवीजन, पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन, हरिद्वार, उत्तराखंड, डिपार्टमेंट ऑफ एलाइड एंड एप्लाइड साइंसेज़, यूनिवर्सिटी ऑफ पतंजलि, पतंजलि योगपीठ, हरिद्वार के वैज्ञानिक जया उप्रेती, मुस्कान चौहान, मयूर चौहान, प्रशांत कटियार, अनुराग डाबस और वेद प्रिया आर्य का विशेष योगदान रहा। शोध को पतंजलि योगपीठ के महामंत्री आचार्य बालकृष्ण के नेतृत्व में किया गया। उनकी भूमिका इसमें सबसे अहम रही।

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