आत्म-संयम और मोक्ष-साधना का पवित्र काल
तिथि मुहूर्त
इस वर्ष भीष्म पंचक आज से शुरु हो रहा है, जिसका समापन 5 नवंबर, बुधवार को कार्तिक पूर्णिमा के दिन होगा।
हिंदू धर्मग्रंथों में भीष्म पंचक को अत्यंत पुण्यदायी व्रत माना गया है। यह व्रत देवउठनी एकादशी से लेकर कार्तिक पूर्णिमा अर्थात पांच दिन तक किया जाता है। इन पांच पवित्र दिनों को भीष्म पंचक इसलिए कहा जाता है, क्योंकि भीष्म पितामह ने महाभारत के युद्ध के बाद अपने अंतिम समय के इन दिनों व्रत रखा था और भगवान विष्णु की उपासना की थी।
शास्त्रों में लिखा है कि जो व्यक्ति भीष्म पंचक का व्रत पूरे नियमों के साथ करता है, उसे चातुर्मास व्रत के समान फल प्राप्त होता है। यह काल आत्मसंयम, पूजा, दान और मोक्ष-साधना का प्रतीक माना गया है। इन पांच दिनों में भगवान विष्णु, माता तुलसी और माँ गंगा स्नान का विशेष महत्व है।

महत्व
भीष्म पंचक को पितरों की शांति, विष्णु उपासना और मोक्ष प्राप्ति के लिए श्रेष्ठ काल माना गया है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भीष्म पितामह बाणों की शय्या पर लेटे थे, तो उन्होंने इन पांच दिनों तक उपवास और तप किया था। इस कारण यह काल आत्मशुद्धि और तपस्या का प्रतीक बन गया। जो व्यक्ति इस अवधि में दान, जप, स्नान और व्रत करता है, उसे अनेक जन्मों के पापों से मुक्ति मिलती है।
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पूजा विधि और नियम
प्रातकाल स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करें। पूजा-स्थल पर भगवान विष्णु और माता तुलसी की मूर्ति स्थापित करें। दीपक जलाकर ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम: मंत्र का जाप करें। तुलसी को जल अर्पित करें और प्रतिदिन दीपक जलाएं। इन शुभ दिनों में फल, दूध, मूंग दाल, चावल आदि सात्विक भोजन का सेवन करें। व्रती केवल फलाहार या एक समय भोजन कर सकता है। पांचों दिन दान, जप और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
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