दुःखों की जड़ है प्रत्याशा
डॉ. घनश्याम बादल आशा एक सकारात्मक ऊर्जा है, यह भविष्य के प्रति विश्वास जगाती है, परंतु प्रत्याशा किसी विशेष परिणाम या व्यक्ति से बंधी होती है। जब हम किसी से अपेक्षा रखते हैं, चाहे वह प्रेम, सम्मान, सहयोग या मान्यता की तो हम अनजाने में अपने सुख का नियंत्रण दूसरे के हाथों में सौंप देते हैं। यही बंधन दुःख का मूल कारण बनता है। संस्कृत में कहा गया है-
आशा नाम मनुष्याणां काचिदाश्चर्यशृंखला।
यया बद्धाः प्रधावन्ति मुक्तास्तिष्ठन्ति पंगुवत्।।
अर्थात् आशा एक अद्भुत श्रृंखला है, जिससे बंधे हुए मनुष्य दौड़ते रहते हैं और जो इससे मुक्त हो जाते हैं, वे स्थिर हो जाते हैं। यह श्लोक आशा के द्वैत स्वरूप को दर्शाता है। वह प्रेरक भी है और बंधनकारी भी। जब आशा स्वीकार के साथ जुड़ी होती है, तो वह उत्साह बनती है, पर जब वह प्रत्याशा बन जाती है, तब मानसिक क्लेश का कारण बनती है।
जब हमारी अपेक्षाएं पूरी होती हैं, तो क्षणिक सुख और संतोष मिलता है, जो स्थायी नहीं होता, क्योंकि मन तुरंत नई अपेक्षाएं गढ़ लेता है। दूसरी ओर, जब अपेक्षाएं पूरी नहीं होतीं, तो निराशा, क्रोध, हताशा और कभी-कभी संबंधों में दूरी उत्पन्न होती है। विशेष रूप से निकट संबंधों में प्रत्याशा एक अदृश्य दबाव बन जाती है।
हम चाहते हैं कि सामने वाला व्यक्ति हमारी भावनाओं को बिना कहे समझे, हमारे अनुसार व्यवहार करे और हमारे मानकों पर खरा उतरे। जब ऐसा नहीं होता, तो हम आहत होते हैं और धीरे-धीरे संबंधों में कटुता आ जाती है। भगवद्गीता का एक प्रसिद्ध श्लोक इस स्थिति को स्पष्ट करता है-
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगो?स्त्वकर्मणि।।
अर्थात् मनुष्य को केवल कर्म करने का अधिकार है, फल की चिंता नहीं करनी चाहिए। जब हम इस सिद्धांत को जीवन में उतारते हैं, तब अपेक्षाओं का बोझ स्वत हल्का हो जाता है। भले ही आज के युग में व्यक्ति इस सिद्धांत को सही नहीं माने, लेकिन यह जीवन का शाश्वत सत्य है कि अपेक्षाओं की वजह से ही अधिकांश संबंधों में खटास आती है।
अपेक्षाओं से मुक्त जीवन: सच्चे सुख और संतोष का मार्ग
असंतोष की वृत्ति: अपेक्षाएं जितनी बढ़ती हैं, संतोष उतना ही घटता है। जीवन और लोगों को जैसे हैं, वैसे स्वीकार करना सीखें। यह निपियता नहीं, बल्कि यथार्थ का सम्मान है। रिश्तों में मौन अपेक्षाओं के बजाय स्पष्ट संवाद करें। इससे भ्रम और तनाव कम होते हैं। अपने सुख का स्रोत बाहरी नहीं, आंतरिक बनाएं।
ध्यान, स्वाध्याय और आत्मचिंतन इसमें सहायक हैं। जो है, उसके लिए आभार व्यक्त करें। कृतज्ञता अपेक्षाओं को संतुलित करती है। फल की चिंता छोड़कर कर्म में आनंद खोजें। यही सच्ची स्वतंत्रता है।आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाए तो प्रत्याशा एक प्रकार का मानसिक बंधन है, जो हमें वर्तमान क्षण से दूर ले जाता है, जबकि सच्चा आनंद अप्रत्याशित जीवन जीने में है, जहां हम कर्म करते हैं, प्रेम करते हैं, परंतु बदले में कुछ पाने की शर्त नहीं रखते।
जब मनुष्य अपेक्षाओं से मुक्त होकर जीना सीख लेता है, तब उसके संबंध भी सहज हो जाते हैं और मन भी शांत हो जाता है। वह दूसरों को बदलने की कोशिश नहीं करता, बल्कि स्वयं के दृष्टिकोण को बदलता है। यही परिवर्तन आध्यात्मिक उन्नति की शुरुआत है। अस्तु, जीवन का सार इसी में है कि हम आशा रखें, पर प्रत्याशा के बंधन में न बंधें, प्रेम करें, पर शर्तों के बिना और कर्म करें, पर फल की चिंता के बिना।
यही अंतस स्वतंत्रता का सर्वश्रेष्ठ मार्ग है और यही सच्चे सुख का आधार भी है। इसलिए यदि जीवन में सुखी रहना है तो अपने सुख की डोर दूसरों के हाथों में मत दीजिए। इसका सीधा-सा रास्ता है, आपको जो करना है, किसी की भलाई के लिए कीजिए, लेकिन बदले में यह अपेक्षा मत रखिए कि आपके प्रति भी दूसरी तरफ से ऐसा ही व्यवहार होगा यानी साधारण शब्दों में कहें तो नेकी कर दरिया में डाल ही आत्म संतुष्टि और विकारों से बचने का सबसे सरल रास्ता है।
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