नेपाल में तख्तापलट राजशाही के मंसूबों के बीच कार्की पर रजामंदी

जेनरेशन ज़ेड के उग्र और हिंसक आंदोलन के फलस्वरूप अराजकता में डूबे नेपाल में पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुश्री सुशीला कार्की के नेतृत्व में अंतरिम सरकार के गठन की संभावना बन रही है। तख्तापलट के बाद सुश्री कार्की के अलावा काठमांडू के युवा महापौर बालेंद्र शाह और बिजली बोर्ड के पूर्व सीईओ कुलमान घीसिंग के नाम हवा में तैर रहे थे, किंतु बालेंद्र शाह के खुलकर सुश्री कार्की के समर्थन में आने से समीकरण बदल गये हैं, अलबत्ता धारण के मेयर हार्क संपांग ने कहा है कि अंतरिम प्रधानमंत्री को युवाओं का समर्थन होना चाहिये और उसका चुनाव नेपाल के स्वाभिमान और देशभक्ति के नजरिये से होना चाहिये, न कि विदेशी दबाव में।

नेपाल में राजशाही समर्थकों का आंदोलन और स्वागत

इस बीच सुश्री कार्की ने जहां नेपाली सेना के मुखिया अशोक राज सिगदल से भेंट की, वहीं एक बड़ी लाबी हिंदु राज्य की स्थापना और राजशाही की वापसी की कोशिशों में मशगूल है। जहां तक राजशाही का प्रश्न है, करीब ढाई दहाई पहले सन् 2008 में नेपाल से राजशाही विदा हो चुकी है। राजवंश के ज्ञानेंद्र राजधानी काठमांडू में निर्मल निवास में रहते हैं। सन् 2024 में वह राजधानी के उपांत में नागार्जुन हिल्स में स्थित हेमंत आबास के शिकारगाह में चले गये थे।

राजमाता रत्ना जहां पूर्व राजप्रासाद महेन्द्र मंजिल में रहती हैं, वहीं परवर्ती पीढ़ी विदेश में। राजमहल में हत्याकांड से सुर्खियों में उभरे पारस शाह की पुत्री कृतिका शाह और युवराज्ञी हिमानी तथा पूर्णिका शाह सिंगापुर में रहती हैं। अपदस्थ ज्ञानेंद्र बीते मार्च में पोखरा से काठमांडू आये तो उनका जबर्दस्त स्वागत हुआ। मई माह में वह नारायण हिती प्रासाद में गये और वहां पूजार्चन किया। अमेरिका में रह रहे पौत्र हृदयेंद्र और परिजन उनके साथ थे। इसके पूर्व मार्च में कम बैक किंग, सेव द कंट्री के नारों के साथ राजशाही समर्थकों ने आंदोलन छेड़ा। पुलिस ने महल में घुसने के लिए उमड़ी भीड़ पर गोलियां दागीं।

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नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता और जेलों से कैदियों की फरारी

फलस्वरूप दो मरे और करीब सौ घायल हुये। मई में नवराज सुबेदी के नेतृत्व में राजभक्तों ने फिर आंदोलन छेड़ा। इस पर ओली सरकार ने जुलाई तक प्रदर्शनों पर पाबंदी लगा दी थी। सीपीएन और यूएमएल ने तब गणतंत्र बचाओ की अपील करते हुये राजशाही के विरोध में प्रदर्शन भी किये थे। कहना कठिन है कि नेपाल में हिन्दु राज्य और राजशाही की वापसी होगी या नहीं, लेकिन पूर्व किंग ज्ञानेंद्र की राजधानी में उपस्थिति उत्प्रेरक का काम कर रही है।

राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी राजशाही के समर्थन में है और उसे ठूंठ में कल्ले फूटने की उम्मीद है। नेपाल में लोकतंत्र की स्थापना में नेपाली कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों के संघर्ष और बलिदान का लंबा इतिहास रहा है, किंतु बेरोजगारी, निरंकुशता, चौतरफा भ्रष्टाचार और संसाधनों की लूटखसोट से युवा वर्ग का व्यवस्था से मोहभंग हुआ है, फलत: आज नेपाल चौराहे पर है। जेलों से हजारों की तादाद में कैदी फरार हैं।

इनमें रवि लामिछाने और संजय टकला जैसे कुख्यात लोग भी हैं, जिन्हें गंभीर आरोपों पर जेल की सजा हुई थी। डिल्ली बाजार, नक्खु, कासकी, कैलाली, झुमका, सोलू, रौतहट, म्याग्दी और भीमफेड़ी जेलों की बैरकें खाली हैं और सारे कैदी फरार। कहना कठिन है कि ये क्या गुल खिलायेंगे। गनीमत है कि करीब 1300 कैदियों की क्षमता में बीरगंज जेल में फरारी का प्रयास सेना ने विफल कर दिया।

नेपाल में सत्ता संकट और भारत-चीन समीकरण

जुलाई 2016 से जून 2017 के दरम्यां चीफ जस्टिस रही सुश्री कार्की ने भारत में बीएचयू से स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की। वह भ्रष्टाचार के विरूद्ध जीरो टालरेंस और न खाएंगे, न खाने देंगे के लिए जानी जाती हैं। वह नरेन्द्र मोदी की प्रशंसक मानी जाती हैं और बर्तनों के टकराने को स्वाभाविक मानती हैं। फिलहाल काठमांड, ललितपुर और भक्तपुर में कर्फ्यू में कुछ घंटों की ढील दी जा रही है और त्रिभुवन हवाई अड्डा खोल दिया गया है।

डॉ. सुधीर सक्सेना
डॉ. सुधीर सक्सेना

जहां तक तख्तापलट और महाशक्तियों की बात है, अमेरिका की परोक्ष शह को भी सूंघा जा रहा है। ओली के पतन से बीजिंग का खिन्न होना स्वाभाविक है। बालेंद्र शाह ग्रेटर नेपाल के हिमायती हैं और भारत के प्रति तल्ख। भारत चीन-नेपाल का 400 वर्ग किमी का त्रिकूट क्षेत्र और सुस्ता विवादग्रस्त है। नेपाल कालापानी के पश्चिम में प्रवाहित नदी को मुख्य काली नदी और उसे अपना क्षेत्र मानता है। नेपाल में गोली चालन से मृतकों की संख्या 31 तक पहुंच गयी है। नेपाल से भारत की नाभि-नाल संबंध है। ओली अपने चौथे राजकाल में एक बार भी भारत नहीं आये। उनके पतन के बाद हिंसा और अराजकता में डूबा नेपाल नये समीकरणों की देहलीज पर है। अंतरिम सरकार के बाद दिल्ली-काठमांडू के रिश्ते कसौटी पर होंगे। अभी तो श्रीलंका, बांग्लादेश के बाद नेपाल में आंदोलन की बेढब तर्ज ने अनेक गंभीर प्रश्न खड़े कर दिये हैं।

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