ख़तरे में अरावली !

अरावली के आख़िरी दिन/ एक मधुमक्खी परागकणों के साथ/ उड़ते-उड़ते थक जाएगी।/ सभी बहेलिए जाल को देखकर/ उलझन में पड़ जाएँगे।/ एक नन्हा ख़रगोश लू की बौछार में/ हाँफते-हाँफते थक जाएगा।/ चेतना आकुलित बघेरे कहीं नहीं दिखेंगे/ इस निरीह-निर्वसन धरती पर। (त्रिभुवन)।

जी हाँ, अरावली पहाड़ियाँ भारत की सबसे पुरानी पर्वत शृंखलाओं में से एक हैं। ये दिल्ली से गुजरात तक फैली हुई हैं और हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। ये रेगिस्तान को रोकती हैं, पानी की नदियों को जन्म देती हैं और हवा को साफ रखती हैं। चंबल और साबरमती जैसी नदियाँ इन्हीं से निकलती हैं। दिल्ली-एनसीआर का प्रदूषण इन्हीं की हरियाली से कम होता है। लेकिन दिसंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने इन्हें फिर चर्चा में ला दिया। कोर्ट ने सरकार की सलाह पर अरावली की साफ-साफ (?) परिभाषा को मंजूरी दी। इसमें 100 मीटर से ऊँची पहाड़ियों को अरावली माना जाएगा। यह कदम संरक्षण के लिए अच्छा लगता है, लेकिन कई लोग कह रहे हैं कि इससे खनन (पत्थर तोड़ने का काम) आसान हो जाएगा! इसीलिए राजस्थान और गुजरात में इसका विरोध हो रहा है।

दरअसल, यह फैसला सरल लेकिन विवादित है। पहले अरावली की कोई साफ परिभाषा नहीं थी। राजस्व रिकॉर्ड और स्थानीय नामों पर निर्भरता से अवैध खनन बढ़ गया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 में सरकार की कमेटी की रिपोर्ट मानी। इसमें 100 मीटर ऊँचाई को आधार बनाया गया है। सरकार कहती है कि इससे 90 प्रतिशत से ज्यादा क्षेत्र सुरक्षित रहेगा। सिर्फ 0.19 प्रतिशत हिस्सा ही सीमित खनन के लिए खुलेगा।

विकास बनाम पर्यावरण: खनन माफिया और नीतिगत अस्पष्टता

दिल्ली में तो बिल्कुल खनन नहीं होगा। लेकिन विरोधी कहते हैं कि इससे 90 प्रतिशत छोटी पहाड़ियाँ (100 मीटर से नीचे वाली) असुरक्षित हो जाएँगी। निर्माण और खनन आसान हो जाएगा। सोशल मीडिया पर लोग इसे पहाड़ियों की मौत बता रहे हैं। राजस्थान की सड़कों पर हजारों लोग सड़क पर उतर आए हैं।

कहना न होगा कि यह विकास और पर्यावरण के बीच की जंग है। मुख्य समस्या पुरानी अस्पष्टता और पैसे का लालच है। दशकों से खनन माफिया अवैध काम कर लाभ कमा रहे थे, क्योंकि राजस्थान, हरियाणा और गुजरात की परिभाषाएँ अलग-अलग थीं। केंद्र सरकार ने पर्यावरण मंत्रालय और वन अनुसंधान परिषद की मदद से वैज्ञानिक तरीका अपनाया। यह अंतरराष्ट्रीय स्तर का है। लेकिन कई लोग कहते हैं कि यह खनन कंपनियों के दबाव का नतीजा है! अरावली में चूना पत्थर और संगमरमर जैसे कीमती पत्थर हैं।

शहरों का फैलाव (जैसे दिल्ली-एनसीआर) ने दबाव बढ़ाया। वन सर्वे की रिपोर्ट कहती है कि पिछले 10 सालों में 10,000 से ज्यादा पहाड़ियाँ खनन से गायब हो चुकी हैं। जलवायु बदलाव के समय यह फैसला पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने जैसा लगता है। बेशक, ये चिंताएँ बहुत गंभीर हैं। अरावली भू-जल का बड़ा स्रोत है। खनन से पानी के तालाब खराब हो जाएँगे, जिससे गुजरात, राजस्थान और हरियाणा में पानी की कमी बढ़ेगी।

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खनन रोकने से लेकर ग्रीन वॉल तक: क्या हैं ठोस समाधान

हवा का प्रदूषण और बिगड़ेगा। दिल्ली का एक्यूआई पहले ही खराब है। धूल से यह और खराब होगा। तेंदुआ, सियार जैसे जीव प्रभावित होंगे। रेगिस्तान फैलेगा। डर है कि अरावली गई तो दिल्ली का फेफड़ा बंद हो जाएगा! सवाल है कि, समाधान क्या है? है; पर उसके लिए इच्छाशक्ति चाहिए। सबसे पहले, कोर्ट की सलाहों को सख्ती से लागू करें। यानी, नई खनन अनुमति पर पूरी रोक, पर्यावरण जांच अनिवार्य! अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट को बड़ा करें।

यानी, 5 किमी के आसपास पेड़ लगाने का लक्ष्य 10 गुना बढ़ाएँ। केवल सीमित खनन चलाएँ। स्थानीय लोगों को जोड़ें। ग्राम सभाओं को संरक्षण में भूमिका दें। तकनीक इस्तेमाल करें। अवैध खनन पर ड्रोन और एआई से नजर रखें। राज्यों को एकजुट करें। गुजरात-राजस्थान की संयुक्त टीम बनाएँ। पर्यावरण पर्यटन और जड़ी-बूटियों की खेती को बढ़ावा दें। अगर 100 मीटर पर शक है, तो इसे 150 मीटर करें। अंतत, अरावली सिर्फ पहाड़ियाँ नहीं, जिंदगी का हिस्सा हैं और यह जंग विकास और पर्यावरण की नहीं; लालच और समझदारी की है। जागरूकता चाहिए। अरावली रहेगी, तो देश हरा-भरा रहेगा; वरना रेगिस्तान हमें घेर लेगा। समय है, कदम उठाने का!

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