विविधता में एकता का जीवंत प्रतीक है बैसाखी पर्व

भारतीय समाज की संरचना जितनी जटिल है, उतनी ही खूबसूरत है। यहां धर्म, संस्कृति, भाषा और जीवन-शैली की विविधताएं मिलकर एक अद्भुत ताना-बाना रचती हैं। इसी ताने-बाने को मजबूती देने में त्योहारों की इंद्रधनुषी भूमिका होती है। बैसाखी का पर्व यूं तो सिख धर्म से जुड़ा है। 13 अप्रैल, 1699 को बैसाख माह में ही खालसा पंथ की स्थापना गुरु गोविंद सिंह द्वारा की गई थी। इसलिए यह दिन सिखों के लिए धार्मिक नववर्ष और आत्म गौरव का प्रतीक है।

इसी दिन देश के विभिन्न हिस्सों में विभिन्न धार्मिक एवं सांस्कृतिक नववर्ष का उल्लास देखने को मिलता है। इसी दिन तमिलनाडु में पुथांडु (तमिल नववर्ष), पश्चिम बंगाल में पोइला बोइशाख (बंगाली नववर्ष) तथा केरल और असम में क्रमश: विशु और बोहाग बिहू जैसे रंग-बिरंगे त्योहारों की छटा बिखरती है। बैसाखी के दिन पंजाब, हरियाणा और समूचे उत्तर भारत में गुरुद्वारों में कीर्तन, लंगर और अमृत संचार का आयोजन होता है।

भारत के विविध नववर्ष पर्व

तमिलनाडु में लोग घरों में कोलम सजाकर विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। पश्चिम बंगाल में पोइला बोइशाख को सांस्कृतिक जुलूस, गीत, संगीत के आयोजन होते हैं। बंगाल में इस दिन व्यापारी नया खाता शुरु करते हैं। केरल में विशु पर्व समृद्धि और नये आरंभ का प्रतीक है। उत्तर पूर्व में बोहाग बिहू की छटा बिखरती है। असम का यह सबसे बड़ा पर्व खेती और नववर्ष दोनों का साझा उत्सव होता है, जिसमें लोकगीत और लोकनृत्यों की धूम होती है।

निसंदेह त्योहारों के इस संकुल में बैसाखी का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसी दिन 1699 में सिखों के 10वें गुरु गोविंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की थी। यह घटना धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। खालसा पंथ की स्थापना ने सिख समुदाय को एक नई और विशिष्ट पहचान दी है। खालसा पंथ की स्थापना के बाद सिखों में जाति-पांति के भेदभाव समाप्त हो गये। इस दिन देशभर के गुरुद्वारों में विशेष शबद, कीर्तन और प्रभात फेरियां होती हैं।

देशभर के गुरुद्वारों में इस दिन विशिष्ट लंगर का आयोजन होता है। यह घटना भारतीय समाज की उच्च समावेशी परंपरा को मजबूत करती है। वास्तव में सारे नव वर्षीय पर्व भारत की कृषि प्रधानता को भी दर्ज करते हैं। उत्तर भारत में यह रबी की फसल की कटाई का समय होता है और उनकी मेहनत का फल मिलने का भी क्षण होता है।

परंपरा, संस्कृति और कृषि जीवन का उत्सव

महीनों की कड़ी मेहनत, मौसम की मार और अनिश्चिंतताओं के बाद जब खेत सोने जैसे लहलहाते हैं, तो बैसाखी किसानों की इस खुशी का उल्लास बन जाती है। पंजाब और हरियाणा में इस दिन खेतों में भांगड़ा और गिद्दा जैसे लोकनृत्य किए जाते हैं। यह प्रभु के प्रति सम्मान और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन का प्रतीक है। बैसाखी भारतीय समाज के उस मूल भाव का उत्सव है, जिसे हम विविधता में एकता का भाव कहते हैं।

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यह पर्व लोगों को धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक तीनों नजरियों से आपस में जोड़ता है। तमिलनाडु का नववर्ष पुथांडु जीवन में सकारात्मकता की नई शुरुआत का दिन होता है। इस दिन तमिलनाडु में लोग अपने घरों में रंगोली बनाते हैं। विशिष्ट व्यंजन भी तैयार किए जाते हैं। कुल मिलाकर भारतीय समाज अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना को सामूहिक उल्लास के रूप में व्यक्त करता है।

आर.सी.शर्मा

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