भाजपा को सीखना होगा संघ का लोकमंगल
संघ प्रमुख भागवत का कहना है कि समस्त हिंदू समाज एकजुट होकर काम करेगा, तो राष्ट्रहित के साथ लोकमंगल की भावना भी प्रबल होगी। भागवत की भावना के मूल को समझने के साथ हम सभी को मिलकर काम करना होगा, तभी लोकमंगल का सपना साकार हो सकेगा।
हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने एक बार फिर लोकमंगल की भावना से काम करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि समस्त हिंदू समाज एकजुट होकर काम करेगा, तो राष्ट्रहित के साथ लोकमंगल की भावना भी प्रबल होगी। इसके लिए हम सभी को मिलकर काम करना होगा। आखिर यह लोकमंगल है क्या? कैसे इसके साथ काम किया जा सकता है? सबसे पहले लोकमंगल को समझने की कोशिश करते हैं।
लोकमंगल की भावना का अर्थ है कि समाज के कल्याण और सभी के हित के प्रति प्रेम और समर्पण। लोकमंगल की भावना साहित्य, कला और जीवन के सभी क्षेत्रों में एक महत्वपूर्ण आदर्श है। यह समाज के विकास और सभी के लिए एक बेहतर जीवन का मार्ग प्रशस्त करता है। लोकमंगल की भावना के कुछ महत्वपूर्ण पहलू भी हैं। इनमें लोक कल्याण, प्रेम और सहिष्णुता, सत्य और न्याय, साहित्य और कला तथा व्यक्तिगत विकास भी शामिल है।
लोकमंगल की भावना का मूल लक्ष्य समाज के कल्याण और सभी के लिए सुख और समृद्धि को सुनिश्चित करना है। लोकमंगल की भावना में प्रेम, करुणा और सहिष्णुता की भावनाएं शामिल हैं। यह सभी के साथ अच्छे संबंध स्थापित करने और किसी भी प्रकार के भेदभाव से बचने की बात करती है। लोकमंगल की भावना सत्य और न्याय के प्रति प्रतिबद्ध है। यह अन्याय और अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने और समाज में न्याय स्थापित करने की बात करती है। लोकमंगल की भावना साहित्य और कला में भी महत्वपूर्ण है। लोकमंगल की भावना से युक्त साहित्य और कला समाज को बेहतर बनाने में मदद करते हैं।
लोकमंगल की भावना: साहित्य से राजनीति तक
लोकमंगल की भावना व्यक्तिगत विकास में भी महत्वपूर्ण है। लोकमंगल की भावना से प्रेरित व्यक्ति समाज के लिए कुछ अच्छा करने की कोशिश करते हैं और अपने जीवन को सार्थक बनाते हैं। असल में लोकमंगल की भावना एक ऐसा आदर्श है, जो समाज को बेहतर बनाने और सभी के लिए एक बेहतर जीवन सुनिश्चित करने में मदद करता है।
यह सभी के लिए एक महत्वपूर्ण प्रेरणा है। लोकमंगल की सिद्धावस्था को स्वीकार करने वाले कवि प्रेम को ही बीज भाव मानते हैं। कबीर की आध्यात्मिक अनुभूत के उद्गार तीव्रतर हैं, लेकिन वे समाजगत हैं। समाज कल्याण, लोकमंगल की भावना के परिप्रेक्ष्य में वे कुशल व्यावहारिक सिद्ध होते हैं। वहीं रामचरितमानस में तुलसीदास ने लोकमंगल की भावना पर गहन कार्य किया है। संघ और संघ प्रमुख बार-बार लोकमंगल से कार्य करने की भावना पर जोर देते हैं। संघ के कार्य में यह दिखाई भी देता है, लेकिन भाजपा के अधिकतर नेताओं के काम में लोकमंगल की भावना नदारद है।
भाजपा के अधिकतर नेता न केवल संवादहीन हैं, बल्कि संवेदनहीन भी हो गए हैं। सत्ता मिलने के बाद उनका लोकमंगल गायब हो जाता है, जबकि विपक्ष में रहते यह जीवित रहता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ कुछ नेताओं को छोड़ दें, तो भाजपा के अधिकतर नेता सत्ता में आने के बाद राष्ट्रहित की अपेक्षा स्वहित पर ज्यादा जोर देने में लगे हुए हैं। ये नेता अपने और अपने परिवारजनों के लिए सात पीढ़ी का इंतजाम कर लेना चाहते हैं।परिवारवाद का विरोध करने वाली भाजपा में किसी विधायक का बेटा सांसद बना हुआ है, किसी का विधायक बना हुआ है, किसी का खेल प्रशासक बना हुआ है, तो कोई कुछ और बना हुआ है।
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भाजपा में कार्यकर्ता और लोकमंगल की उपेक्षा
परिवार के किसी नेता पर कोई आरोप लगता है, तो दिखावे के लिए उसका टिकट काटकर उसके परिवार के दूसरे सदस्य को दे दिया जाता है। यह सब कुछ ठीक नहीं कहा जा सकता। इसमें कहीं पर भी लोकमंगल की भावना नहीं है। लोकमंगल की भावना को समझने के लिए संघ को समझना पड़ेगा। बिना संघ को समझे लोकमंगल की भावना को नहीं समझा जा सकता। देर-सबेर भाजपा के नेताओं को फिर संघ की शरण में आना पड़ेगा।
कभी हार के बाद कहा गया था कि भाजपा राख से भी उठ खड़ी होने वाली पार्टी है। यह तभी संभव है, जब भाजपा लोकमंगल की भावना को आत्मसात करके काम करेगी। कार्यकर्ताओं को तवज्जो देगी और उनकी जरूरत पर उनके साथ खड़ी मिलेगी। मौजूदा दौर में यह हो नहीं रहा है। भाजपा अपने कार्यकर्ताओं का साथ नहीं दे पा रही है। भाजपा ने अपनी एक प्रवक्ता को उसी के हाल पर छोड़ दिया। अगर भाजपा कार्यकर्ता के साथ खड़ी नहीं होगी, तो कार्यकर्ता भी भाजपा के साथ खड़ा होने से बचेगा। यह स्थिति ठीक नहीं कही जा सकेगी। कार्यकर्ता भाजपा की रीढ़ हैं।

संघ हमेशा कहता आया है कि कार्यकर्ता का काम करो, संगठन का काम स्वत: ही हो जाएगा। संघ तो यह भी कहता है कि भले ही नया कार्यकर्ता ना बने, लेकिन पुराना कार्यकर्ता टूटना नहीं चाहिए। जरूरत है कि संघ और संघ प्रमुख की बातों पर अमल किया जाए और लोकमंगल की भावना के साथ काम किया जाए। कार्यकर्ता के साथ खड़ा हुआ जाए, ताकि कार्यकर्ता को सम्मान और अपनापन मिल सके। बाकी दल का काम स्वत: ही हो जाएगा और बहुत अच्छे ढंग से हो जाएगा।
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