नैमिषारण्य में ब्रह्म-सत्र : डोंगरे जी महाराज

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नैमिषेऽनिमिषक्षेत्रे ऋषय शौनकादय।
सत्रं स्वर्गाय लोकाय सहस्रसममासत।।

(श्रीमद्भा.1/1/4) एक बार ऋषियों ने ब्रह्माजी से प्रश्न किया कि कृपा करके हमको कोई ऐसी पवित्र भूमि बताओ, जो भूमि भक्ति में साथ दे। हमें सर्वकाल भक्ति करने की इच्छा है। भोग-भूमि में काम के परमाणु घूमते हैं। गृहस्थ का घर भोग-भूमि है। घर में भक्ति तो होती है, पर सर्वकाल भक्ति नहीं हो सकती है। काम के परमाणु मन को बिगाड़ते हैं। गृहस्थ का घर बहुत पवित्र नहीं है। जिस घर में जैसा कर्म होता है, उस कर्म के सूक्ष्म परमाणु वहाँ रहते हैं। काम के परमाणु मन को बिगाड़ते हैं। सर्वकाल भक्ति करने की इच्छा है। ऐसी कोई पवित्र भूमि बताओ, जो भूमि भक्ति में साथ दे।

ब्रह्माजी ने ऋषियों को एक चक्र दिया और आज्ञा देते हुए कहा कि इस चक्र के पीछे-पीछे चलो। इस पा की गति जहाँ स्थिर हो जाय, वहाँ बैठ जाओ। नैमिषारण्य में आने के बाद वह चक्र शांत हो गया। थोड़ा-सा विचार करने पर ध्यान में आयेगा कि मानव का मन पा के जैसा ही घूमता ही रहता है। चक्र स्थिर नहीं होता है। मन भी स्थिर नहीं रहता। एक ठिकाने स्थिर रहना मन को अच्छा लगता ही नहीं। मन का स्वभाव ही ऐसा है।

सभी के लिए समान फल

नैमिषारण्य में आने के बाद वह मनोमय चक्र शांत हो गया। नैमिषारण्य में गोमती गंगा है। नैमिषारण्य में चक्र-पुष्करिणी तीर्थ है। भाग्यशाली वैष्णव को चक्र-पुष्करिणी तीर्थ में स्नान करने से चक्रांकित शालिग्राम भगवान मिलते हैं। चक्रांकित शालिग्राम वहाँ से प्रकट होते हैं। पवित्र भूमि नैमिषारण्य में ऋषियों ने ब्रह्म-सत्र किया है। यज्ञ और सत्र में अन्तर है। जहाँ एक ही यजमान होता है, उसका नाम यज्ञ है। जहाँ सभी यजमान हैं, वह सत्र है। भागवत की कथा ज्ञान-सत्र है –

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सत्रं स्वर्गीय लोकाय सहस्रसममासत।
स्वर्गीयते इति स्वर्गाय: विष्णुः, सत्राय इत लोकाय।

भगवान के चरण में स्थिर होना है। ऋषियों ने ब्रह्म-सत्र किया है। सत्र में सभी यजमान हैं। यज्ञ में एक ही यजमान होता है। यज्ञ में एक ही यजमान को यज्ञ का सोलह आने फल मिलता है। सत्र में सभी को समान फल मिलता है। जहाँ फल में विषमता है, उसको यज्ञ कहते हैं। जहाँ फल में समता है, उसको सत्र कहते हैं।

भागवत की कथा यज्ञ नहीं है – भागवत की कथा ज्ञान-सत्र है। कथा में जितने लोग बैठते हैं, सभी यजमान हैं। कोई वैष्णव बहुत गरीब हो, उसको एक पैसा भी देने की जरूरत नहीं है। हजार जो देता है, हजार का जो खर्च करता है – उसको जो फल मिलता है, वही फल गरीब वैष्णव को भी मिलता है, यदि वह शांति से कथा सुनता है। कथा में जितने बैठे हैं, सभी यजमान हैं –

सत्रं स्वर्गाय लोकाय सहस्रसममासत।

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