ग़ाज़ा : मृत स्त्री-देहों पर अंकित युद्ध के हस्ताक्षर

यूएन वीमेन की हालिया रिपोर्ट द कॉस्ट ऑफ वॉर इन ग़ाज़ा ऑन वीमेन एंड गर्ल्स (अक्तूबर 2023 से दिसंबर 2025 तक) ने गाज़ा में चल रहे युद्ध के स्त्री-घाती चेहरे को नंगा करके रख दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, इस अवधि में 38,000 से अधिक महिलाएँ और लड़कियाँ मारी गईं – 22,000 से ज़्यादा महिलाएँ और 16,000 लड़कियाँ! औसतन प्रतिदिन कम से कम 47 महिलाएँ-लड़कियाँ शहीद हुईं। लगभग 11,000 महिलाएँ और लड़कियाँ आजीवन विकलांग हो गईं। ये आँकड़े मात्र संख्याएँ नहीं, बल्कि युद्ध की क्रूर सच्चाई के स्त्री-शरीर पर उतरे सबसे भयानक सबूत हैं।
कहना ग़लत न होगा कि युद्ध हमेशा से लिंग-आधारित हिंसा का सबसे बड़ा वाहक रहा है। गाज़ा में तो यह हिंसा कोलैटरल डैमेज नहीं, बल्कि व्यवस्थित स्त्री-हत्या का रूप ले चुकी है। रिपोर्ट से पता चलता है कि महिलाएँ और बच्चे कुल मौतों का दो-तिहाई हिस्सा थे। घरों, स्कूलों और संयुक्त राष्ट्र शेल्टरों पर हुए 83.8 प्रतिशत हमले हवाई बमबारी और आर्टिलरी फायर से हुए। यानी जहाँ महिलाएँ सबसे ज़्यादा समय बिताती हैं – घर, आश्रय और देखभाल के केंद्र – वहीं पर उन्हें निशाना बनाया गया।
युद्ध से परिवार टूटे, बढ़े महिला-प्रधान परिवार
सायनों की मानें तो यह युद्ध केवल शारीरिक हत्या नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना की हत्या भी है। एक लाख से अधिक परिवार अब महिला-प्रधान हो गए हैं! पतियों, बेटों और भाइयों की मौत के बाद विधवाएँ और अनाथ लड़कियाँ न केवल आर्थिक संकट झेल रही हैं, बल्कि यौन-हिंसा, भुखमरी और बीमारियों का भी शिकार हो रही हैं। प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं का पूर्णतः विघटन – 927 स्वास्थ्य केंद्रों पर हमले, आईवीएफ क्लीनिकों का विनाश – महिलाओं की पीढ़ीगत निरंतरता पर हमला है।
गर्भवती महिलाएँ बिना दवा, बिना बेड और बिना साफ-सफाई के घरों में प्रसव कर रही हैं। 40 प्रतिशत गर्भवती महिलाएँ कुपोषण के लपेटे में हैं। यह रिप्रोडक्टिव वायलेंस है। महिलाओं की शारीरिक स्वायत्तता और मातृत्व के अधिकार पर सीधा प्रहार! इस अमानुषिकता पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चुप्पी घोर निंदा का विषय है। अक्तूबर 2025 में घोषित युद्धविराम के बावजूद हमले जारी हैं।
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गाज़ा में मलबे तले दबी महिलाओं की दर्दनाक स्थिति
दुनिया का ध्यान अन्य मुद्दों पर बँट गया है, जबकि गाज़ा की अनेक महिलाएँ अभी भी मलबे में दबी हैं। स्त्रियों की यातना का यह दस्तावेज क्या अंतरराष्ट्रीय कानून की असफलता का दस्तावेज़ नहीं है? युद्धजीवी ताकतों के आगे संयुक्त राष्ट्र क्या केवल काग़ज़ी शेर बन कर नहीं रह गया है? दरअसल, इन युद्धों को पुरुष-केंद्रित राष्ट्रीय सुरक्षा की नज़र से नहीं, बल्कि मानवीय अस्तित्व के लेंस से देखने की भारी दरकार है।
जब महिलाएँ मरती हैं तो सभ्यता मरती है! जब लड़कियाँ विकलांग होती हैं तो भविष्य अपाहिज हो जाता है! गाज़ा की महिलाएँ न केवल पीड़ित हैं, बल्कि प्रतिरोध का प्रतीक भी हैं। वे परिवार संभाल रही हैं, सहायता वितरित कर रही हैं और शांति की माँग कर रही हैं। लेकिन उनकी आवाज़ को दबाया जा रहा है। याद रहे कि यूएन वीमेन की इस रिपोर्ट का असल मकसद आँकड़े पेश करना नहीं, बल्कि कार्रवाई की माँग करना है।
तत्काल पूर्ण युद्धविराम, मानवीय सहायता की बिना शर्त पहुँच, महिलाओं के नेतृत्व वाले संगठनों को वित्तीय सहयोग, युद्ध अपराधों की स्वतंत्र जाँच और शांति वार्ताओं में महिलाओं की 50 प्रतिशत भागीदारी अनिवार्य होनी चाहिए। जवाबदेही के बिना शांति संभव नहीं। अंततः, गाज़ा की 38,000 से अधिक मृत महिलाएँ-लड़कियाँ चीख-चीखकर दुनिया को बता रही हैं – युद्ध कभी लिंग-तटस्थ नहीं होता! जब तक स्त्री-शरीर को युद्ध का मैदान बनाया जाता रहेगा, तब तक मानवाधिकार सिर्फ शब्दों का खेल रहेगा!
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