भगवान की लीला

एक निर्धन व्यक्ति था। अभाव में जीवन काट रहा था, परन्तु फिर भी ईश्वर को नहीं भूला था। अपने नियम का पक्का था। सांझ सवेरे दोनों समय मंदिर जाता, भगवान भोलेनाथ की आरती उतारता, पूजा-अर्चना करता और मंदिर के पंडित से प्रसाद ग्रहण करके लौट आता था। एक दिन वह मंदिर में शिव आराधना में लीन था। वहां एक संपन्न व्यक्ति आया। उसके तन पर सुंदर जड़ाऊ वस्त्र थे, पैरों में सुंदर जूतियां थीं।
निर्धन व्यक्ति ने बड़े गौर से संपन्न व्यक्ति को निहारा और फिर स्वयं को देखा, मैले-कुचैले वस्त्र कमजोर शरीर। उसके मन में अपने प्रति घृणा भाव उमड़ पड़ा। जाने क्या सोचकर उसने संपन्न व्यक्ति से पूछा, ‘श्रीमान, आप क्या रोज मंदिर आते हैं?’ ‘नहीं, मैं यहां सप्ताह में केवल एक बार आता हूं।’ संपन्न व्यक्ति ने उत्तर दिया। मैं तो व्यापारी हूं। व्यवसाय में ही इतना व्यस्त रहता हूं कि एक दिन के अलावा समय ही नहीं निकाल पाता।’
तुलना से उपजा भ्रम और आत्मबोध का क्षण
निर्धन व्यक्ति को भोलेनाथ का यह भेदभाव अच्छा नहीं लगा। वह झुंझला कर मन ही मन सोचने लगा कि वह तो रोज दोनों समय मंदिर आकर नीलकंठेश्वर के चरणों में नत-मस्तक होता है फिर भी कंगाली के दिन काट रहा है? पैर के जूतों की दस बार मरम्मत हो चुकी है। शरीर पर ढंग के वस्त्र नहीं हैं। वह व्यवसायी जो सप्ताह में केवल एक बार मंदिर आता है, ठाठ-बाट का जीवन व्यतीत कर रहा है।
निराशा से वह घर जाने के लिये मंदिर की सीढ़ियां उतर रहा था, तभी उसकी दृष्टि मंदिर में आते एक विकलांग पर पड़ी, जिसकी दोनों टांगें नहीं थीं। वह घिसट-घिसट कर सीढियां चढ़ रहा था। यह देखकर उसने दोनों हाथ ऊपर उठाकर भगवान से क्षमा मांगते हुए कहा- ‘हे ईश्वर, तेरी लीला अपरंपार है। मैं तो इस व्यक्ति से हजार गुना सुखी हूं। कठिन परिश्रम करके धनोपार्जन करने के लिए कम से कम मेरे हाथ-पैर तो सही-सलामत हैं। व्यर्थ में ही मैं संपन्न व्यक्ति से अपनी तुलना कर रहा था।’
-परशुराम संबल
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