हेपेटाइटिस : लिवर का साइलेंट किलर
हेपेटाइटिस एक ऐसी बीमारी है, जो यकृत यानी लिवर में सूजन पैदा करती है। आमतौर पर यह बीमारी वायरस, अत्यधिक शराब के सेवन, कुछ दवाओं के इस्तेमाल या आटोइम्यून स्थितियों के कारण होती है। लेकिन जब हम हेपेटाइटिस शब्द का प्रयोग करते हैं तो आमतौर पर इसका मतलब वायरल हेपेटाइटिस से होता है। लेकिन हेपेटाइटिस बीमारी केवल एक प्रकार के नहीं होती, यह अलग-अलग पांच प्रकार के होती है। हेपेटाइटिस ए, हेपेटाइटिस बी, हेपेटाइटिस सी, हेपेटाइटिस डी और हेपेटाइटिस ई।
हेपेटाइटिस एक गंभीर लेकिन आमतौर पर अनदेखी कर दी जाने वाली बीमारी है, शायद इसीलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने लोगों को इसकी गंभीरता के प्रति ध्यान आकर्षित करने के लिए साल 2010 में 28 जुलाई को वर्ल्ड हेपेटाइटिस डे मनाने की घोषणा की, जिसका उद्देश्य हेपेटाइटिस जैसी साइलेंट किलर बीमारी को लेकर लोगों को सतर्क करने का आह्वान था।
हेपेटाइटिस डे: जागरूकता, परीक्षण और रोकथाम का वैश्विक प्रयास

इस दिन विश्व स्वास्थ्य संगठन अनेक स्थानीय स्वास्थ्य संस्थाओं और शैक्षिक संस्थाओं के साथ मिलकर हेपेटाइटिस के बारे में जन जागरुकता फैलाने का काम करता है। इस दिन इसके परीक्षण, रोकथाम और उपचार को बढ़ावा देने का आह्वान किया जाता है। हालांकि, पिछले 15 सालों से हेपेटाइटिस डे के लगातार मनाएँ जाने के बावजूद इसके उन्मूलन को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन को पूरी तरह से सफलता नहीं मिली। मगर हां, इस कवायद से लोगों में हेपेटाइटिस को लेकर जागरुकता बढ़ी है।
हेपेटाइटिस बी, वायरस की खोज करने वाले डॉ. बारुक ब्लूमबर्ग, जिन्हें साल 1976 में इसके लिए नोबेल पुरस्कार भी मिला था, उन्हीं के जन्म दिन की इस स्मृति में वर्ल्ड हेपेटाइटिस दिवस मनाया जाता है और इस दिन पूरी दुनिया में हेपेटाइटिस के सभी पांचों प्रकारों के बारे में जागरुकता फैलाने की कोशिशें की जाती हैं। समय पर इसकी जांच और उपचार के महत्व को इस दिन विशेष तौरपर रेखांकित किया जाता है, तथा वैक्सीनेशन और सुरक्षा उपायों पर विशेष रूप से जोर दिया जाता है।
2030 तक हेपेटाइटिस उन्मूलन का लक्ष्य, पर राह अब भी कठिन
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का लक्ष्य साल 2030 तक इसके वैश्विक खतरे को खत्म करना है। हालांकि, अभी तक इस सिलसिले में बहुत ज्यादा सफलता तो नहीं मिली, लेकिन हां, कुछ हद तक सफलता मिली है। कई देशों ने हेपेटाइटिस वैक्सीनेशन का अभियान शुरू किया है, विशेषकर हेपेटाइटिस बी के लिए और अब बहुत से देशों में नवजात बच्चों का टीकाकरण अनिवार्य हो गया है, इसमें भारत भी शामिल है।
अगर इलाज की बात करें तो हेपेटाइटिस सी के लिए अब ज्यादातर जगहों पर इसका प्रभावी इलाजा उपलब्ध है, लेकिन दिक्कत यह है कि ज्यादातर इसके पीड़ितों को पता ही नहीं होता कि वे हेपेटाइटिस सी से पीड़ित हैं। वास्तव में जागरुकता की कमी खासकर भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में यह बीमारी साइलेंट किलर के रूप में विख्यात होती जा रही है। हालांकि सरकार टीका कवरेज की कोशिश में है, फिर भी अभी पूरी तरह से इसमें सफलता नहीं मिली है।
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डब्ल्यूएचओ ने हेपेटाइटिस के विरूद्ध कारगर जंग छेड़ने के लिए हर साल इसकी अलग-अलग थीम या काम करने की दिशा चुनता है। जैसे साल 2025 की दिशा है, हेपेटाइटिस इंतज़ार नहीं कर सकता-जांच करें, इलाज करें, समाप्त करें। इस थीम का उद्देश्य यही है कि हमें इस खामोश बीमारी से जागरूक होना है, सतर्क बनना है और इसकी चपेट आने से पहले खुद को सुरक्षित रखना है। वर्ल्ड हेपेटाइटिस डे हमें इस बात की याद दिलाता है कि यह चुपके से दबोचने वाली खतरनाक बीमारी है। अत इसके प्रति हमें अतिरिक्त रूप से सतर्क रहना होगा।
हेपेटाइटिस के लक्षण, बचाव और इलाज से जुड़ी जरूरी बातें
हेपेटाइटिस के सामान्य लक्षण
शुरूआत में ज्यादातर लोगों में इसके लक्षण नहीं दिखते। लेकिन ध्यान दें तो लक्षण पकड़े जाते हैं। इसके सामान्य लक्षणों में शामिल हैं-

- भूख न लगाना।
- थकान और लगातार कमजोरी महसूस होना।
- रह-रहकर उल्टी और मतली आना।
- आंखों और त्वचा का रंग पीला पड़ना।
- पेशाब का रंग गहरा होना।
- पेट में दर्द होना खासकर इसके ऊपरी हिस्से में।
- लगातार हल्का बुखार रहना।
हेपेटाइटिस बी और सी की चपेट में आने से धीरे-धीरे जहां तक इसके बचाव के प्राथमिक उपाय हैं। उनमें ये विशेष रूप से कारगर हैं- - उबला हुआ साफ पानी पीना।
- सड़क किनारे और पांमित जगह का खाना खाने से बचना।
- हेपेटाइटिस बी और सी से बचाव के लिए एचवीवी का टीका ज़रूर लगवाएं।
- असुरक्षित यौन संबंध से बचें।
- पांमित व्यक्ति के ब्लड या सुईं से संपर्क न करें।
- टैटू पियर्सिंग आदि केवल लाइसेंस प्राप्त जगह से कराएं।
हेपेटाइटिस हो जाने पर इससे कैसे निपटें, हेपेटाइटिस ए/सी होने पर-

- आमतौर पर ये 4 से 6 हफ्ते में खुद ही ठीक हो जाता है। इसलिए आराम करें। हल्का खाना खाएं। भरपूर साफ पानी पीएं। नियमित रूप से हल्की-फुल्की एक्सरसाइज करें और डॉक्टर से अपने लिवर का फंक्शन टेस्ट करवाएं।
- अगर हेपेटाइटिस बी और सी की चपेट में आ जाएं तो याद रखें यह क्रोनिक हो सकते हैं। इसलिए डॉक्टर से रेगुलर मिलें, अपनी बीमारी की मॉनिटरिंग कराएं। बी के लिए दवाएं उपलब्ध हैं। इसलिए यह जिस वायरस से होता है, उसे कंट्रोल किया जा सकता है। हेपेटाइटिस सी के लिए 12 से 24 हफ्तों का इलाज उपलब्ध है। लगभग 95 फीसदी मामलों में इसका इलाज संभव है, लेकिन देर न करें, सतर्क रहें। गर्भवती महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को इससे विशेष रूप से बचाएं।
- हेपेटाइटिस ए और ई बीमारियां, विशेषकर बरसात और गंदे पानी से बढ़ती हैं। इसलिए ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में इसके संक्रमण को लेकर जागरुकता फैलाने की बहुत ज़रूरत है। क्योंकि सबसे ज्यादा यही इलाके इसकी चपेट में आते हैं। जागरूता के लिए लोगों में इसके टीकाकरण पर जोर देना चाहिए। हेपेटाइटिस सी का परीक्षण और इलाज बहुत सीमित है। इसलिए नाइयों, टैटू आर्टिस्टों, छोटे क्लीनिकों में इसकी जागरूकता का विशेष अभियान चलाया जाना चाहिए। क्योंकि इन जगहों पर संक्रमण की स्थिति सबसे ज्यादा होती है।
-रेखा देशराज
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