जीवन में जो चाहें वो कैसे पाएं ….

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सृष्टि में मनुष्य मात्र एक कैरेक्टर है, लेकिन अज्ञानता वश वह अपने व्यक्तित्व को ही अस्तित्व समझ लेता है। जैसे वास्तव में स्वप्न के या फिल्म के कैरेक्टर ना तो कुछ पाते हैं, ना कुछ खोते हैं, सब कुछ कल्पना मात्र ही होता है। मनुष्य के मन की प्रकृति संग्रह करने और सुख पाने की है। इसीलिए वह न केवल धन-संपत्ति का संग्रह करता है, बल्कि विचारों, भावों, घटनाओं, व्यवहार, हर एक चीज का संग्रह अपने मन में कराता जाता है। इस संग्रह के बोझ से उसे शारीरिक व मानसिक थकान होने लगती है।

यदि हमें सुख और शांति से जीना है तो संग्रह की प्रवृत्ति से बचना होगा और मन से भेदभाव को मिटाना होगा। प्रकृति के नियम के अनुसार हमें जो भी पाना है, पहले हमें वह देना होगा, जैसे हम सम्मान पाना चाहते हैं, प्यार पाना चाहते हैं, अधिकार पाना चाहते हैं, धन पाना चाहते हैं तो हमें भी सभी को सम्मान देना होगा, सभी से प्यार करना होगा, सामने वाले को भी अधिकार देने होंगे, संतोष रूपी धन बांटना होगा।

मन की गांठें छोड़ें: सद्भावना और सकारात्मक सोच का रास्ता

दूसरा हमें यह ध्यान रखना है कि जिस प्रकार हम परमात्मा से प्रार्थना करते हैं कि मेरे अवगुण चित्त ना धरो उसी प्रकार हमें भी किसी के दुर्व्यवहार – अवगुण आदि को अपने चित्त पर अंकित नहीं करना चाहिए। इसका वैज्ञानिक नियम है कि प्रकृति में सब कुछ हर पल बदल रहा है तो क्यों हम अनावश्यक रूप से किसी के व्यवहार को मन में बिठाकर उसके प्रति पूर्ण धारणाएं बना लें।

कई बार देखा गया है कि समय के साथ सामने वाला व्यक्ति पूरी तरह बदल जाता है, लेकिन हमने अपने मन में उसकी जो छवि बना रखी है, उसके कारण हम अब भी दुःखी होते जा रहे हैं। सृष्टि में कोई भी व्यक्ति पूरी तरह से खराब या बुरा नहीं होता। हो सकता है कि जो मनुष्य हमें अच्छा ना लगता हो, वह दूसरे कई अन्य लोगों का बहुत प्रिय हो। इसलिए कभी मन में किसी के प्रति कोई गांठ न रखें, ये गाँठें ही हमारे अस्वस्थ होने का मूल कारण हैं।

तीसरी बात यह है कि हम जिस भाव से दूसरों के साथ व्यवहार करते हैं या बातचीत करते हैं, उसी भाव से वे भी प्रतिािढया देते हैं। अत सद्भावना से ही हमें सद्भावना मिलेगी। यदि किसी विशेष परिस्थिति या व्यक्ति से आपको सद्भावना देने पर भी सद्भावना नहीं मिलती तो इसका अर्थ यह है कि परमात्मा आपके कठिन प्रारब्ध कर्मों को इस रूप में काट रहा है।

देने का भाव अपनाएं: समर्पण में ही सच्ची संतुष्टि

ऐसी स्थिति में परमात्मा, उस व्यक्ति और परिस्थिति से क्षमा मांगते हुए तथा उनका आभार प्रकट करते हुए आप अपने अच्छे व्यवहार को बनाए रखें। ऐसा करने पर निश्चित रूप से आपको जीवन में जो चाहिए, वह अवश्य मिलेगा। चौथा नियम यह है कि हम परमात्मा से प्रार्थना के द्वारा जो कुछ मांगते हैं, वह सब स्वाभाविक रूप से बिना मांगे हमें सृष्टि को देना चाहिए।

जैसे हमें परमात्मा की कृपा चाहिए, आशीर्वाद चाहिए तो हमें भी बिना कंजूसी के आशीर्वाद देना चाहिए। प्रभु से सहयोग, मार्गदर्शन, सहायता, संबल, इच्छा पूर्ति के लिए हमें अपने आस-पास के सब लोगों में परमात्मा के दर्शन करते हुए, उन्हें ये सब देना चाहिए।

सद्गुरु श्री रमेशजी

वास्तव में ना कुछ देना है, ना लेना है, तेरा तुझको अर्पण है और यही समर्पण है। हमारे पास जो भी कुछ था, वह सब हमने दे दिया और सृष्टि में जो भी कुछ उपलब्ध है। उसके साथ हम एक हो गए, अब हमारा कोई अलग अस्तित्व नहीं रहा। इसका अर्थ यह हुआ कि स्वयं को देने में ही सब कुछ पा लेने का सूत्र छिपा हुआ है।

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