भाग्य में लिखा है तो कर्म की क्या आवश्यकता
अक्सर लोग प्रश्न पूछते हैं कि जब सब कुछ होना पहले से तय है, तो फिर कर्म करने का क्या औचित्य है? श्रीरामचिरतमानस के प्रसंगों में इस प्रश्न का उत्तर है। श्रीरामचिरतमानस के बालकांड में भगवान शंकर ने सती-मोह के प्रसंग में कहते हैं-
होइहि सोइ जो राम रचि राखा, को करि तर्क बढ़ावै साखा।।
जनमनास में यह चौपाई काफी प्रसिद्ध है। किष्किन्धाकाण्ड में भगवान शंकर और काक भुशुंडी के ये वचन मिलते हैं-
उमा दारु जोषित की नाईं, सबहि नचावत रामु गोसाईं।।
नट मरकट इव सबहिं नचावत, रामु खगेस बेद अस गावत।।
अगर सब कुछ प्रारब्ध (भाग्य) से ही तय होता है, तो लोग पाप-पुण्य, अच्छे-बुरे कर्मों के बारे में क्यों विचार करते हैं? वे निश्चिंत होकर कुछ किए बिना क्यों नहीं बैठ जाते? वास्तविकता यह है कि केवल प्रारब्ध का सहारा लेकर कर्म छोड़ देना जीवन का सही मार्ग नहीं है। मनुष्य का कर्तव्य है कि वह कर्म करता रहे, क्योंकि कर्म ही उसके जीवन को दिशा देते हैं और भविष्य को भी प्रभावित करते हैं।
सुंदरकाण्ड में लक्ष्मण जी ने नाथ दैव कर कवन भरोसा तथा दैव दैव आलसी पुकारा का उद्घोष किया है। इन सब शंका का समाधान करते हुए विद्वान बताते हैं कि भगवान शिव का यह संबोधन, होइहि सोइ जो राम रचि राखा, को करि तर्क बढ़ावै साखा।। उस समय का है, जब उन्होंने सती जी को समझाते समय यह जान लिया कि इनके ऊपर हरिमाया का प्रभाव पड़ रहा है, इसलिये अब इनके द्वारा उसी के अनुसार कार्य होगा। इनकी भावी को मेटना हमारे मान का नहीं है, क्योंकि उसमें हरि -इच्छा सम्मिलित होने के कारण वह बलवान हो रही है।
हृदयं बिचारत संभु सुजाना, हरि इच्छा भावी बलवाना।।
तथा
लाग न उर उपदेसु जदपि कहेउ सिवं बार बहु।
बोले बिहसि महेसु हरि माया बलु जानि जियं।।
अगर किसी व्यक्ति का मन संशय से भरा है और वह समझाने पर भी नहीं समझता, तो उसके लिए अच्छे अवसर या सही बातें भी बेअसर हो जाती हैं। जब भाग्य या सोच विपरीत हो, तो भलाई भी भलाई नहीं लगती। इसी को कहा गया है,
मोरेहु कहें न संसय जाहीं, बिधि बिपरीत भलाई नाहीं।।
यह सब देखकर भगवान शंकर ने यह निश्चय किया कि जाने दो, भगवान श्रीराम ने जो रच रखा है, वही होगा। होइहि सोइ जो राम रचि राखा। क्योंकि उन्हीं की माया की प्रेरणा से सती द्वारा यह लीला हो रही है, इसलिये इसमें कौन कुतर्क करने और शाखा-प्रशाखा निकालने जाए, को करि तर्क बढ़ावै साखा।। ऐसा निश्चय करके भगवान शंकर श्रीराम नाम का जप करने लगे।
अस कहि लगे जपन हरि नाम, गई सती जहं प्रभु सुखधामा।।
रामचरितमानस के गूढ़ रहस्यों को समझने से व्यक्ति को जीवन जीने की उचित राह मिलती है तथा सभी शंकाओं का समाधान स्वत होने लगता है।
ज्योतिषाचार्य आशुतोष वार्ष्णेय
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