अतीत की कड़वी यादों को रखें मन से दूर
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज में संतुलन एवं अनुशासन बनाए रखने के लिए हमें कई नियम अपनाने पड़ते हैं। बचपन से ही हम परिवारों में सुनते आ रहे हैं कि छोटी-छोटी बात को पकड़ कर नहीं रखें, दिल बड़ा रखें। बड़ा दिल रखने का सूत्र हमारे जीवन को सुख-शांति और आनंद से भर देता है, क्योंकि इसके पीछे का मनोविज्ञान, विज्ञान और आध्यात्मिकता सूक्ष्म रूप से हमारे शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक पक्ष पर प्रभाव डालती है।
व्यावहारिक रूप से दिल बड़ा रखने का अर्थ है कि हम सभी की जाने-अनजाने में हुई छोटी-मोटी गलतियों को माफ करते चलें और हमसे जो भी गलती हुई है, उसके लिए सामने से माफी मांग लें। कई बार अतीत की बातें हमारे मन को बार-बार चुभती रहती हैं तो जिस प्रकार हम पुराने अखबारों को आज नहीं पढ़ते, उसी प्रकार इन पुरानी बातों पर ध्यान न दें, इन पर चिंतन-मनन और विचार न करें।
मन हल्का करो, जीवन सहज बनाओ
यदि वो मन में आती हैं तो उन्हें एक मिनट आँखें बंद करके ब्रह्मांड में छोड़ दें या प्रार्थना के साथ भगवान को अर्पित कर दें। जैसे हम रद्दी बेच देते हैं, घर में इकट्ठी नहीं करते, उसी तरह मन में बेकार विचारों की रद्दी जमा न करें। जब मन में पुराने विचार नहीं रहते हैं तो मन स्वाभाविक रूप से शांत और खुश रहता है, जैसे हमें खाली स्थान देखकर सुकून मिलता है, वैसे ही खाली मन भी सुकून की अनुभूति करता है, लेकिन मन से विचारों को निकालने के लिए हमको दिल बड़ा जरूर करना पड़ता है। हम सब चीजों को मन में जमा करके संकुचित करके रखते हैं तो सबसे ज्यादा तकलीफ हमें ही होती है।
इसलिए हमारे दिल बड़ा करने से सामने वाले को जितना लाभ होता है, उससे कई गुना अधिक लाभ हमें होता है।
खुले आकाश की ओर देखें, ध्यान लगाएं और विस्तार की कल्पना करें। इससे हमारा हृदय विशाल होता है और जाने-अनजाने जो हमने इसे सिकोड़ कर रखा है, वह सिकुड़न निकल जाती है, हमारी व्याकुलता कम हो जाती है, हम प्रसन्न रहने लगते हैं, निर्भय हो जाते हैं।
तीसरा फार्मूला यह है कि हम मन में जिन चीजों को पकड़ कर रखते हैं। ब्रह्मांड से वे ही चीजें आकर्षित होकर हमारी ओर आती रहती हैं, इसलिए विशालता, प्रसन्नता, सकारात्मकता, सहजता, सरलता और स्वभाविकता को मन में जगह दें। मैं ब्रह्म हूं, मैं मुक्त हूं, मैं चेतना हूं, मैं आकाश की तरह विशाल हूं आदि वाक्य एक बड़े पेपर पर लिखकर अपने कमरे में चिपका लें ताकि उठते-बैठते सोते समय आपको आपकी वास्तविकता का स्मरण होता रहे और आप सर्वव्यापी विशालता का आनंद लेते रहें।
सद्गुरु रमेश
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