ज्ञान का दीपक
सर्वपल्ली राधाकृष्णन एक बार विश्वविद्यालय में कक्षा ले रहे थे। एक छात्र ने साहस करके पूछा, सर, दर्शन पढ़ने से जीवन में क्या बदलेगा, पेट तो इससे नहीं भरता? उसके कथन से कक्षा में सन्नाटा छा गया। राधाकृष्णन कुछ क्षण मौन रहे, फिर बोले, तुम सही कह रहे हो, ज्ञान पेट नहीं भरता।
छात्र के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई। तभी वे आगे बोले, पर याद रखो, पेट भरने के लिए काम चाहिए और सही काम चुनने के लिए विवेक। दर्शन वही विवेक देता है। फिर उन्होंने मेज़ पर रखे दीपक की लौ की ओर संकेत करके कहा, दीपक भोजन नहीं बनाता, पर बिना उसके रसोई अंधेरे में रहती है।
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ज्ञान दीपक है, वह जीवन का बोझ नहीं उठाता, पर दिशा अवश्य देता है। छात्र की आंखें झुक गईं। उस दिन उसने समझा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोज़ी नहीं, बल्कि सही रास्ता चुनने की क्षमता देना है, जिसके भीतर विवेक का प्रकाश जलता है, वह साधारण परिस्थितियों में भी असाधारण जीवन गढ़ लेता है।
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