राजनीतिक दंगों के विरुद्ध आवाज़ बना मिलाप

हैदराबाद, पत्रकारिता का पहला धर्म सच्चाई है। विशेषकर जनता के हित में सच के साथ खड़ा होना आसान नहीं होता। वह भी तब, जब सत्ता के गलियारे स्वार्थ में रंग कर जनता को गुमराह कर रहे हों। 1990 के उत्तरार्ध में हैदराबाद में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे थे। सब जानते थे कि ये दंगे सांप्रदायिकता की आड़ में राजनीतिक स्वार्थ से भरे थे। उन्हीं दिनों जब शहर में चौबीस घंटे का कर्फ्यू लगा दिया गया और तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. चेन्ना रेड्डी की सरकार स्थिति पर नियंत्रण नहीं कर पा रही थी, आदमी की मौत पशुओं की मौत से भी सस्ती हो गयी थीI मिलाप दंगों की सच्चाई लिखता रहा।

इन हालात में दूरदर्शन से कुछ लोग मिलाप अख़बार के संस्थापक और स्वतंत्रता सेनानी युद्धवीर जी से मिलने के लिए मिलाप घर आये। वक्तव्य लेकर वे गये तो सही, लेकिन बाद में फोन आया कि युद्धवीर जी का वक्तव्य दूरदर्शन के निदेशक के पल्ले नहीं पड़ा, क्योंकि वह काफी सख़्त है। दूरदर्शन की टीम ने उनसे पुनः वक्तव्य देने का अनुरोध किया। युद्धवीर जी ने उनसे साफ कह दिया कि जहाँ दंगे हो रहे हैं, वहाँ के स्थानीय निवासी आपस में प्रेमपूर्वक रह रहे हैं और दंगे बाहर से आकर पेशेवर गुंडे कर/करवा रहे हैं। यह सब राजनीति से प्रेरित है।

दूसरे दिन दूरदर्शन की टीम फिर मिलाप घर आयी, लेकिन युद्धवीर जी ने अपना वक्तव्य बदलने से इनकार कर दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने साफ कह दिया कि वे अपने बयान पर अटल हैं। इसी शीर्षक से उन्होंने मिलाप में अग्रलेख भी लिखा। दूरदर्शन के लोग समझ गये कि युद्धवीर जी सिद्धांत के पक्के हैं। दंगों के पीछे की राजनीति को बेनकाब करने के बाद उन्हें जान से मारने की धमकियाँ भी मिलने लगी। युद्धवीर जी डरे नहीं, बल्कि आबिद अली खान साहब के साथ दंगापीड़ित इलाकों का दौरा भी किया। इस तरह एक पत्रकार के रूप में युद्धवीर जी हमेशा सच के साथ खड़े रहे और आज भी मिलाप उनके सिद्धांतों पर चल रहा है।

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