राष्ट्र निर्माण की नींव हैं : अनुशासन और मूल्य
वर्तमान परिवेश में सबसे बड़ी चुनौती हमारे सामने हैं- देश के युवाओं में बढ़ती कुंठा या हताशा। शोध के अनुसार, प्राचीन काल से अनुशासनहीनता और मूल मानव मूल्यों की कमी को सभ्यता के पतन के लिए प्रमुख कारक माना गया है। अत: जिस देश की आवाम अनुशासनहीन होती है, वह देश कभी भी ऊपर नहीं उठ पाता है। अनुशासन की कमी समूचे समाज में हताशा व असंतोष का माहौल पैदा कर देती है।
फलस्वरूप लोग निहायत दिशाहीन एवं अनियंत्रित हो जाते हैं और फिर आचरण की सब संहिताओं को अपदस्थ करके बड़े पैमाने पर अशांति फैलाने का कार्य करने लगते हैं। हम देख रहे हैं कि विश्वभर में हो रहे असैनिक दंगों के पीछे आवामी असंतोष एवं अविश्वास प्रमुख कारण है। किन्तु, इस समस्या के निवारण का मार्ग कोई भी देश की सरकार या प्रशासन-तंत्र ढूंढ नहीं पाया है।
सकारात्मक दिशा देने में परिवार और शिक्षा की निर्णायक भूमिका
वर्तमान समय की माँग है कि युवाओं को रचनात्मक गतिविधियों में संलग्न करके उनकी ऊर्जा को सकारात्मक तरीके से उपयोग में लाना। उन्हें सामाजिक परिवर्तन के लिए पीय करना ताकि वे विनाशकारी भूमिका निभाने के बजाय प्रलक्षित भूमिका निभाने में खुद को एवं अपने मित्रों को प्रोत्साहित करें। अनुभव से देखा गया है कि छोटे बच्चे एवं युवा अपने माता-पिता, निकटवर्ती वातावरण, शिक्षकों आदि को देखकर ही कई बातें परोक्ष रूप से सीखते रहते हैं।
अत: माता-पिता और शिक्षकों पर यह बहुत बड़ी जिम्मेवारी है कि वे युवा पीढ़ी को प्रेम, त्याग, चरित्र एवं व्यवहार और सामंजस्य की भावना से निरंतर प्रेरित करते रहें, परन्तु वे ऐसा करने में असफल हो जाते हैं तो वह युवा पीढ़ी जिनके अंदर ज़रूरत से ज़्यादा भौतिक ऊर्जा मौजूद है, उत्तेजित होकर शालीनता की सभी हदें पार करके तंत्र को उखाड़ फेंकने के लिए अमादा हो जाते हैं। वर्ष, 2013 में अमेरिका के मनोचिकित्सकों के एक समूह द्वारा किए गए अनुसंधान में पाया गया कि बच्चों के भीतर बेचैनी और अनुशासनहीनता के लिए जिम्मेदार प्रबल कारक है- स्कूलों में नैतिक और आध्यात्मिक शिक्षा का न होना एवं परिवार में बड़े-बुजुर्गों से प्रेरणा की कमी।
अनुशासित और संस्कारवान समाज का निर्माण
सुनने में यह साधारण कारण लगता है, किंतु आज समस्त विश्व में फैली अराजकता का मुख्य कारण यही है। आधुनिकीकरण के मद्देनजर हम यह भूल गए हैं कि नैतिक और आध्यात्मिक शिक्षा एक व्यक्ति को आत्म-नियंत्रण करके सहनशीलता, धैर्य, संयम, विनम्रता जैसे मूल्यों से सुसज्जित करती है। उसमें संतुष्टि एवं समर्पण और बलिदान की भावना का संचार करती है।

अत: समय की आवश्यकता है कि बच्चों को प्रारंभिक चरण में ही मूल्यों की शिक्षा प्रदान करें, जिससे वे अपनी संस्कृति व मूल्यों की विरासत से अवगत रहें और पश्चिमी संस्कृती के आक्रमण से खुद को सुरक्षित रख पाएँ। याद रखें! बचपन में सिखाई हुई हर बात व्यक्ति को सालोंसाल याद रहती है, इसलिए यदि हम एक अनुशासित राष्ट्र का स्वप्न देखते हैं तो उसकी शुरुआत हमें अपने ही परिवार में अपने बच्चों को अनुशासन का पाठ पढ़ाकर करनी होगी तो कहिए आप सभी तैयार हैं?
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