अब आदमी जिए तो जिए कैसे
हमारे यहाँ की पुरानी कहावत जिसकी लाठी, उसकी भैंस में जितना दम है, उतना आज की दुनिया के किसी घोषणापत्र में नहीं है। फर्क बस इतना है कि पहले लाठी मोटे बांस की होती थी, अब उसके नाम बदल गए हैं- बंदूक, मिसाइल और दादागिरी। आज पूरी दुनिया में लाठी वाला मिनटों में भैंस खोलकर ले जाता है और मालिक कागजों में बस अधिकार ढूँढता ही रह जाता है। शांति की बातें मंचों पर होती हैं लेकिन बंदूक की नोक से शांति शब्द कभी लिखा ही नहीं जा सकता। शांति तो आज भी प्यार की कलम से आएगी मगर उसे पकड़ने के लिए हाथ नहीं, हिम्मत चाहिए। वहीं आज की दुनिया में ऐसी हिम्मत किसी के पास नहीं है तभी तो शांति की सिर्फ बातें ही होती रहती है, वह भी मंचों पर और शांति कभी किसी को नसीब नहीं होती।
पहले कहते थे -घर में रहो, सुरक्षित रहोगे। अब तो घर ही टारगेट बन गया है। दीवारें भी घबराई हुई हैं। चोरों के हौसले ऐसे बुलंद हैं कि दीवार फांद कर नहीं आते, सीधे किवाड़ तोड़ देते हैं। और हम? हम तो बस गिनती करते रह जाते हैं- टीवी गया, जेवर गया, नींद गई, आत्मसम्मान गया। ये आग अब सिर्फ हमारे मोहल्ले तक सीमित नहीं रही। अब तो एक देश के मुखिया की कुर्सी तक को निगलने चली आई है। जब सबसे ऊँची कुर्सियां ही हिल रही हैं तो आम आदमी की चारपाई की औकात ही क्या है? जब सारी दुनिया में हो-हल्ला मच रहा है और कोई किसी की सुनने वाला ही नहीं है तो फिर आम आदमी बेचारा करे तो क्या करे।
यह भी पढ़ें… जब गांधी घर में महकेगी देशी व्यंजनों की खुशबू
नत्थू की ससुराल कथा में छिपा तंज और सियासी व्यंग्य
यहाँ तो ऊपर से नीचे तक बस एक ही संदेश है- जिसकी लाठी, उसी की भैंस। आज के जमाने में भैंस रस्सी से नहीं, डर से बंधी होती है। अब न खूंटा चाहिए, न बाड़, बस एक धमकी और एक हथियार से भैंस दौड़ी चली आती है। डर ऐसी लाठी है कि भैंस तो कब की जा चुकी होती है और हम रस्सी ढूँढते रह जाते हैं।
लाठीधारी दादा लोगों को न डर लगता है, न शर्म आती है। बेशर्मी से हंसते हुए ये डर का फ्री पैकेज देते फिर रहे हैं। इन्हें सिर्फ विस्तार चाहिए, कब्जा चाहिए, लूट चाहिए। हाल ये हो गया है कि आदमी से लेकर राष्ट्राध्यक्ष तक न घर में सुरक्षित है, न बाहर। न कुर्सी बची है, न खाट।
लड़कियों के अपहरण की खबरें तो सुनी थीं पर एक देश का राष्ट्रपति पत्नी समेत उठा लिया जाए तो बताओ आम लोग-लुगाई किस खेत की मूली हैं। जिस देश में ताज भी सुरक्षित नहीं वहां तकिया तो किस हाल में होगा, सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। एक बर की बात है अक नत्थू अपणी सुसराल म्हं बीस दिन ताहिं जम्या रह्या तो उसकी सास्सू बोल्ली- आपणैं घणे दिन हो लिये, कद जाण का इरादा है? नत्थू बोल्या- थारी छोरी सुसराल म्हं छह-छह महीन्ने रहण लाग री। सास्सू बोल्ली- वा तो उड़ै ब्याह राखी है। नत्थू छोह म्हं बोल्या- तो मैं के अपहरण करकै ल्या राख्या हूं?
शमीम शर्मा
अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।



