बैंक ईमानदारी बरतेंगे तभी मिलेगा रेपो रेट कम होने का फायदा

रेपो रेट से रातोंरात जादुई बदलाव की उम्मीद करना बेमानी होगी। पर हां, अगर आरबीआई सचमुच बाजार को, निवेशकों और अंतिम रूप से ग्राहकों को यह भरोसा दिलाए कि यह स्थिति यानी रेपो रेट दरों में कटौती कम से कम अगले दो से तीन सालों के लिए है। तब निश्चित ही बाजार में उभार देखने को मिलेगा।

इन पंक्तियों के लिखे जाने तक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया द्वारा 6 महीने के भीतर तीसरी बार 50 बेसिस प्वाइंट तक की गई रेपो रेट में कटौती के बाद अभी तक सिर्फ 4 बैंकों ने इसके मुताबिक अपने ग्राहकों को लाभ देने का फैसला किया है, उसमें भी दो बैंकों यूको और एचडीएफसी ने शुरुआती घोषणा महज प्वाइंट 10 प्रतिशत के ब्याज दरों में कटौती करने की बात कही है। इससे साफ है कि महज रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया द्वारा रेपो रेट में कटौती कर दिये जाने के कारण रातोंरात लोन की दरें उसी के मुताबिक कम हो जाएंगी। यह कोई जरूरी नहीं है।

गौरतलब है कि गुजरी 6 जून 2025 की सुबह पिछले छह महीनों के भीतर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने तीसरी बार रेपो रेट में 0.50 प्रतिशत की कटौती की है। इस तरह पिछले पांच सालों बाद अब रेपो रेट की दर 5.5 प्रतिशत हो गयी है। इसे इस तरह समझें कि अगर आपने 20 लाख रुपये का लोन 20 साल की अवधि के लिए ले रखा है, तो आरबीआई की मौजूदा रेपो रेट की नीति के चलते बैंकों को इस लोन पर 1.48 लाख रुपये ब्याज में कटौती देना चाहिए।

रेपो रेट कटौती से रीयल एस्टेट को नई उम्मीद

इस तरह रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के नये गवर्नर संजय मल्होत्रा ने अपनी नियुक्ति के बाद से अब तक तीन बार बैंक के रेपो रेट में कटौती करके, लोगों के सस्ते लोन पाने का माहौल बनाया है और देश में जो करीब 12 करोड़ लोग बैंक लोन की किस्तें भर रहे हैं, उन्हें भी ईएमआई में कटौती की राहत दी है। लेकिन क्या इससे अर्थव्यवस्था उम्मीद के मुताबिक छलांग लगाने लगेगी? क्या इससे रीयल एस्टेट सेक्टर में जिस बूम का सपना देखा जा रहा है, वह सपना पूरा होगा? गौरतलब है कि रीयल एस्टेट सेक्टर भारत में सबसे ज्यादा नौकरियां देता है।

भारत में कुल नौकरियों का करीब 10 से 14 प्रतिशत इसी सेक्टर से आता है। लेकिन पिछले पांच सालों से लगातार होम लोन की बढ़ी दरों के कारण नये घर खरीदने वाले ग्राहक बाजार से नदारद थे। देश में लगभग 80 लाख छोटे बड़े फ्लैट या तो बने पड़े हैं या कुछ बने हैं, कुछ अधूरे हैं। बहरहाल 80 लाख फ्लैट ऐसे पड़े हैं, जिनको अभी तक ग्राहक नहीं मिले। पिछले दो सालों से छोटे व मझोले और जनता फ्लैट के बाजार में वास्तविक ग्राहक लगभग न के बराबर हैं। हां, लग्जरी होम और लग्जरी अपार्टमेंट की बिक्री पिछले तीन सालों में लगातार बढ़ी है।

सस्ती दरों का लाभ आम खरीदार तक नहीं पहुँचा

2 करोड़ रुपये और उससे ज्यादा कीमत वाले अपार्टमेंट और 5 करोड़ रुपये तथा उससे ज्यादा कीमत वाले विलाज की पिछले तीन सालों में बिक्री 175 से 200 प्रतिशत तक बढ़ी है। लेकिन आम मध्यवर्गीय लोगों द्वारा खरीदे जाने वाले फ्लैट्स की संख्या में जरा भी बढ़ोत्तरी देखने को नहीं मिली। क्या अब जबकि लगभग एक फीसदी तक रिजर्व बैंक ने बैंकों को दिए जाने वाले लोन में जो ब्याज की कटौती की है, क्या उससे फ्लैट सस्ते होंगे और छोटे घरों की बिक्री में तेज आयेगी? रिजर्व बैंक के आला अधिकारियों की धारणा तो यही है, पर यह धारणा पूरी तरह से जमीन पर उतरेगी, इसकी संभावना सौ प्रतिशत नहीं है।

निश्चित रूप से आरबीआई के इस प्रयास से बैंक ने पहले से लोन ले रखे और नया लोन ले रहे ग्राहकों की ब्याज दरों में कटौती तो की है, लेकिन जितनी छूट उन्हें खुद आरबीआई से मिली है, उतनी कटौती वे अपने ग्राहकों को नहीं दे रहे। इससे बहुत ज्यादा उम्मीद भी नहीं है कि बाजार में तुरंत असर दिखे। लेकिन हां, अगर बाजार को लगा कि यह स्थिति लंबे समय तक रहेगी तो जरूर मार्केट में गर्मी देखने को मिलेगी। गौरतलब है कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया तो कटौती की घोषणा करता है।

लेकिन ज्यादातर बैंक खुद अपने ग्राहकों को दिये जाने वाले लोन में तीन महीने का सर्किल रेट बना रखा है। इसलिए बैंकों को जो राहत पहले दिन से मिलनी शुरु हो जाती है। आमतौर पर बैंक अपने ग्राहकों को तीन महीने बाद देना शुरु करते हैं या फिर उनके सर्किल पीरियड के मुताबिक। जो बैंक फायदा तुरंत उठा लेते हैं, ग्राहकों को वही फायदा वो नहीं देते। कई बार तीन महीने के बाद अर्थव्यवस्था की स्थितियां बदलने लगती हैं और छह महीने के भीतर रिजर्व बैंक की पॉलिसी में तब्दीली हो जाती है।

कटौती के बावजूद अनिश्चित है फायदा मिलने का वक्त

इसलिए जो फायदा बैंकों को मिल चुका होता है, बैंक खुद अपने ग्राहकों को वे नहीं दे पाते। इस तरह बाजार में एक अनिश्चितता बनी रहती है कि रेपो रेट में जो कटौती हुई है, उसका फायदा कब तक मिलेगा और कितना मिलेगा। फिलहाल सीआरआर घटने से देश में बैंकों के पास 2.5 लाख करोड़ रुपये लोन देने के लिए अतिरिक्त हो चुके हैं। आरबीआई ने बैंकों को दिये जाने वाले ब्याज दर को 4 प्रतिशत से घटाकर 3 प्रतिशत कर दिया है।

बैंकों को चाहिए कि वे इस 3 प्रतिशत पर 2.5 प्रतिशत अपना ब्याज जोड़कर ग्राहकों को 5.5 नहीं तो 6 प्रतिशत की दर पर लोन उपलब्ध कराएं। लेकिन देश का कोई भी बैंक फिलहाल 7 फीसदी से कम ब्याज दरों पर ग्राहकों को लोन नहीं देता, तो कई बार होता है कि आंकड़ों की इस कटौती के बाद सब कुछ हरा-हरा और उम्मीदों भरा दिखने लगता है। लेकिन जरूरी नहीं है कि वह हकीकत में भी खरा उतरे। आरबीआई ने यह भी अनुमान लगाया है कि उसके द्वारा ये कटौती कर दिए जाने के बाद फाइनेंशियल ईयर 2026 की पहली तिमाही के बाद महंगाई की दर 3.6 फीसदी से घटकर 2.9 फीसदी हो जायेगी।

दूसरी तिमाही पर 3.9 से घटकर 3.4 फीसदी। तीसरी तिमाही पर 3.8 फीसदी से घटकर 3.4 फीसदी और चौथी तिमाही में 4.4 फीसदी रहेगी। लेकिन जरूरी नहीं है कि महंगाई इसी अनुमान के साथ आगे बढ़ेगी। सबसे ज्यादा उम्मीदें रीयल एस्टेट से ही हैं, क्योंकि एक फीसदी सीआरआर कटौती के बाद लिक्विडिटी में सुधार होगा और बैंक बड़े-बड़े डेवलपर्स की रुकी हुई योजनाओं को पूरा करने के लिए सस्ते दर का लोन देंगे, तो जाहिर है तेजी से काम शुरु होगा।

यह भी पढ़ें… महाकुंभ 2025 ने भारत को चौथी अर्थव्यवस्था बनाया

सबकुछ अनुमान और भरोसे पर टिका है

लोहा, ईंट, सीमेंट आदि की बिक्री रफ्तार पकड़ेगी। लाखों नये कामगारों को रोजगार मिलेगा और अर्थव्यवस्था को बहुत राहत मिलेगी। लेकिन यह सब भी इस पूरे अनुमान के बैंकों द्वारा डिलीवर किये जाने पर ही निर्भर है। असल में रेपो रेट से आरबीआई की ब्याज दरें कम हो जाती हैं और अनुमान लगाया जाता है कि बैंकों को जो राहत मिली है, वे अपने होम लोन ग्राहकों, वाहन खरीदने वालों और अपने बिजनेस को बढ़ावा देने के लिए लोन लेने वालों को भी देंगे। इससे तमाम कंपनियां ज्यादा कर्ज लेकर अपने विस्तार को प्रेरित होंगी।

नतीजतन वे अपना निवेश बढ़ाएंगी और कामगारों को तनख्वाह के रूप में जो ज्यादा पैसे मिलेंगे, उससे उपभोग बढ़ेगा। इस तरह ये एक के बाद दूसरे अनुमान से जुड़ा हुआ अनुमानों का गोल चक्कर इस उम्मीद पर जाकर टिकता है कि अर्थव्यवस्था में उभार आए, लेकिन यह सब कुछ कंपनियों के भरोसे बैंकों द्वारा अपने ग्राहकों को लाभ दिए जाने और सांख्यिकी के अनुमान के मुताबिक लोगों में ज्यादा उपभोग करने पर टिका है और प्रकृति तथा व्यवहारिकता हमें सीख देती है कि कोई भी अनुमान सौ फीसदी खरा नहीं उतरता।

-वीना गौतम
-वीना गौतम

इसलिए रेपो रेट से रातोंरात जादुई बदलाव की उम्मीद करना बेमानी होगी। पर हां, अगर आरबीआई सचमुच बाजार को, निवेशकों और अंतिम रूप से ग्राहकों को यह भरोसा दिलाए कि यह स्थिति यानी रेपो रेट दरों में कटौती कम से कम अगले दो से तीन सालों के लिए है। तब निश्चित ही बाजार में उभार देखने को मिलेगा।

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