साधना के पथ में धैर्य जरूरी : भाग्यचंद्र विजयजी

हैदराबाद, साधना के पथ में धैर्य जरूरी है। साधक की कदम कदम पर परीक्षा होती है। उक्त उद्गार गोशामहल स्थित शंखेश्वर भवन में श्री शंखेश्वर पार्श्वनाथ जैन संघ गोशामहल के तत्वावधान में आयोजित चातुर्मासिक धर्म सभा को संबोधित करते हुए भाग्यचंद्र विजयजी म.सा. ने प्रवचन सभा में दिये। म.सा. ने कहा कि साधना के पथ में धैर्य जरूरी है। साधक की कदम-कदम पर परीक्षा होती है। मंत्र-तंत्र के डर से कोई भी साधु संतों को स्थान प्रदान नहीं करते थे।

अनेक महात्माओं ने शिष्य संपदा के साथ यह ठान लिया था कि हर क्षेत्र का उद्धार करना है। वे अपने संकल्प पर दृढ़ रहे और यतियों की सभी चालों को समझ कर आगे बढ़ते रहे। अपनी साधना से हताश कर ज्ञान चर्चा की चुनौती स्वीकार की। मुंह पट्टी पर चली 3 घंटे की चर्चा में यतियों को परास्त किया और आगम के प्रति आम जन की श्रद्धा को मजबूत कर जिनशासन की प्रभावना की। मुनि श्री ने कहा कि आत्मा का ख्याल रखने वाला सदैव जागरूक रहता है कि कितने कर्म कट रहे हैं और कितने नए बंध रहे हैं।

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जब तक कर्म बंधते रहेंगे, हमारी आत्मा विभाव दशा में ही रहेगी। मात्र सिद्ध स्वरूप ही आत्मा की स्वभाव दशा है। आत्म कल्याण करने के लिए साधना जरूरी है। प्रचार संयोजक जसराज देवड़ा धोका ने बताया कि आज प्रवचन में प्रभावना बाबूलाल जुगराज सालेचा परिवार की तरफ से हुई। संघ अध्यक्ष चंपालाल भंडारी व चातुर्मास संयोजक बाबूलाल सालेचा ने सकल संघ से प्रतिदिन प्रवचन में पधारने की विनती की है।

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