पुणे दुष्कर्म : आखिर कब तक हैवानियत ?

महाराष्ट्र के पुणे जिले की भोर तहसील के नसरापुर में चार साल की एक मासूम बच्ची के साथ हुए दुष्कर्म और निर्मम हत्या ने पूरे देश की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया है। एक 65 वर्षीय व्यक्ति द्वारा बच्ची को खाने का लालच देकर मवेशियों के बाड़े में ले जाना और उसके साथ वहशियाना हरकत कर उसे मौत के घाट उतार देना, केवल अपराध नहीं; हमारे समाज के नैतिक पतन और चरमराती न्याय व्यवस्था का खौफनाक जीवंत प्रमाण है।
पूरी घटना का सबसे दुखद और आक्रोशित करने वाला पहलू यह है कि आरोपी भीमराव कांबले कोई पहली बार अपराध नहीं कर रहा था। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, उस पर 1998 और 2015 में भी आपराधिक मामले दर्ज थे, जिनमें यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम का मामला भी शामिल था। इसके बावजूद वह बरी होकर समाज में खुलेआम घूम रहा था। यह व्यवस्था के गाल पर करारा तमाचा नहीं तो और क्या है?
लचर कानूनी प्रक्रिया पर उठते गंभीर सवाल
क्या हमारी कानूनी प्रक्रिया इतनी लचर हो गई है कि एक आदतन अपराधी सबूतों के अभाव या कानूनी पेचीदगियों का लाभ उठाकर बार-बार छूट जाता है? यदि 2015 में ही इस व्यक्ति को कठोर सजा मिली होती, तो आज उस चार साल की बच्ची की किलकारियाँ अपने घर-आंगन में गूंज रही होतीं। यह मौत सिर्फ उस दरिंदे ने नहीं दी है, बल्कि उस सिस्टम ने भी दी है जिसने उसे आजाद छोड़ दिया था!
घटना के बाद मुंबई-बेंगलुरु राजमार्ग पर सैकड़ों लोगों का उतरना, लंबा ट्रैफिक जाम लगना और न्याय की गुहार लगाना, आम जनता के भीतर पनप रही उस गहरी हताशा का प्रतीक है, जो न्याय मिलने में होने वाली देरी से पैदा होती है। जब कानून का खौफ अपराधियों के मन से खत्म हो जाता है, तो जनता का सड़कों पर उतरकर रास्ता रोको जैसे कदम उठाना स्वाभाविक हो जाता है। यद्यपि कानून-व्यवस्था को हाथ में लेना किसी भी सभ्य समाज में उचित नहीं है, लेकिन समझना होगा कि यह आक्रोश उस खोखले आश्वासन के खिलाफ है, जो हर ऐसी घटना के बाद रस्म अदायगी के तौर पर दिया जाता है।
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस द्वारा मामले की सुनवाई फास्ट-ट्रैक कोर्ट में कराने और आरोपी को फांसी की सजा दिलाने की मांग करना स्वागतयोग्य है। उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार ने भी पीड़ित परिवार को त्वरित न्याय का आश्वासन दिया है। लेकिन सवाल यह है कि, क्या ये कदम हमेशा घटना घटित होने के बाद ही उठाए जाएंगे? शक्ति अधिनियम जैसे कठोर कानून, जो लंबे समय से लंबित हैं, उन्हें लागू करने में केंद्र और राज्य के बीच चल रही राजनीतिक रस्साकशी को क्यों नहीं खत्म किया जाता? हमें प्रतिक्रियावादी(रिएक्टिव) होने के बजाय निवारक (प्रिवेंटिव) होने की जरूरत है।
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बच्चियों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल, समाज आत्ममंथन को मजबूर
याद रहे कि किसी भी समाज की महानता और उसकी नैतिक प्रगति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वहाँ सबसे कमजोर और असुरक्षित वर्ग (बच्चे) कितने सुरक्षित हैं! यह घटना हमें आत्ममंथन के लिए विवश करती है। हम किस तरह के समाज का निर्माण कर रहे हैं, जहां घरों के बाहर खेलती बच्चियां महफूज नहीं हैं? इस समस्या का समाधान केवल फांसी की सजा में नहीं है; बल्कि न्यायिक प्रक्रियाओं को तेज करने, पुलिस की जांच प्रणाली (सीसीटीवी और फॉरेंसिक) को और अधिक पारदर्शी व पुख्ता बनाने, और समाज में एक गहरी नैतिक चेतना जगाने में है।
नसरापुर की उस नन्ही जान को हम वापस नहीं ला सकते, लेकिन 15 दिनों के भीतर चार्जशीट दाखिल करने और फास्ट ट्रैक कोर्ट के जरिए दरिंदे को उसके अंजाम तक पहुंचाने का जो वादा प्रशासन ने किया है, वह हर हाल में पूरा होना चाहिए। हमारी चुप्पी अपराधियों का सबसे बड़ा हथियार है। वक़्त आ गया है कि एक स्वर में यह सुनिश्चित किया जाए कि भारत की बेटियाँ अपने ही देश में शिकार न बनें।
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