सत्याग्रह @ कोर्ट : बतर्ज़ केजरीवाल

भारतीय लोकतंत्र में इस समय एक बड़ा दिलचस्प प्रयोग चल रहा है। धरना अब सड़क से उठकर सीधे अदालत में पहुँच गया है। और प्रयोगकर्ता हैं अरविंद केजरीवाल, जो अब भूतपूर्व मुख्यमंत्री की गरिमा और जिम्मेदारी के साथ ‘सत्याग्रह’ की नई परिभाषा गढ़ रहे हैं।
मामला कुछ यूँ है कि श्रीमान ने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की अदालत में पेश न होने का ऐलान किया है। कहते हैं, ‘न्याय मिलने की उम्मीद टूट गई है’, इसलिए गांधीजी के रास्ते पर चलना पड़ेगा। अब यह सुनकर गांधीजी की दिवंगत आत्मा भी शायद सोच रही होगी-‘भाई, हमने अंग्रेजों के खिलाफ सत्याग्रह किया था, जज के सामने पेश न होने का नहीं!’
लेकिन ठहरिए, कहानी यहीं खत्म नहीं होती। अदालत ने भी साफ कहा कि सिर्फ ‘शक’ के आधार पर जज को हटाया नहीं जा सकता, और इसे ‘फोरम शॉपिंग’ जैसा भी बताया। यानी, उधर से भी संदेश साफ है, ‘यह अदालत है, मनपसंद जज चुनने का ऐप नहीं।’ इस तरह, एक तरफ श्रीमान जी हैं, जो कहते हैं कि ‘न्याय होना ही नहीं, दिखना भी चाहिए।’ दूसरी तरफ अदालत है, जो कहती है, ‘न्याय प्रक्रिया से होता है, प्रेस कॉन्फ्रेंस से नहीं।’ और जनता बीच में बैठी है, झालमुड़ी लेकर। क्योंकि यह पूरा मामला अब कानूनी कम, नाटकीय ज्यादा लगने लगा है।
सत्याग्रह बनाम ‘सुविधाग्रह’ की बहस तेज
सयाने भी असमंजस में हैं कि अदालत के सामने पेश न होना ‘सत्याग्रह’ है या ‘सुविधाग्रह’! क्योंकि सत्याग्रह में आदमी अन्याय सहकर भी व्यवस्था के भीतर लड़ता है, उससे भागता नहीं। यहाँ तो व्यवस्था को धता बताना ही सत्याग्रह की ओर पहला कदम है। घोषणा है कि आपकी अदालत पर हमें भरोसा नहीं! यानी, न्याय भी अब ‘पसंदीदा चैनल’ पर चाहिए – जैसे टीवी पर क्रिकेट मैच। कैसी हास्यास्पद जिद है। मेरे खिलाफ मुकदमे के लिए न्यायपीठ मैं खुद चुनूंगा!
कइयों को लग सकता है कि अदालत का रवैया भी सवालों से परे नहीं है। जब एक पक्ष बार-बार ‘न्याय के दिखने’ की बात उठा रहा है, तो क्या अदालत को उस आशंका को थोड़ा और संवेदनशीलता से नहीं लेना चाहिए? आख़िर न्याय केवल किया जाना ही नहीं, दिखाई भी देना चाहिए, यह सिद्धांत अदालतों का ही है, नेताओं का नहीं। यहाँ विडंबना दोहरी है। श्रीमान ने मान लिया है, ‘मुझे न्याय नहीं मिलेगा।’ अदालत कह रही है, ‘यह आशंका अनुचित है।’ और दोनों अपनी-अपनी पर इतने अड़े हैं कि सच खुद कन्फ्यूज हो गया है कि वह जाए तो जाए कहाँ!
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न्याय प्रक्रिया के बहिष्कार की नई राजनीतिक शैली
इस पूरे घटनाक्रम ने एक नई राजनीतिक-न्यायिक शैली पैदा कर दी है। न्याय प्रक्रिया के बाइकाट की शैली! न्यायपालिका की पीठ न हुई, विधायिका का सदन हो गया! पहले अदालत में जिरह होती थी, अब जिरह से पहले ही नैतिकता का प्रेस नोट जारी हो जाता है। पहले वकील दलील देते थे, अब श्रीमान वीडियो संदेश देते हैं। पहले जज फैसला सुनाते थे, अब ट्विटर टाइमलाइन पहले ही फैसला सुना देती है।
और हाँ, इस ‘सत्याग्रह मॉडल’ का असर भी तेजी से फैल रहा है। खबर है कि उनके अनुयायी भी इसी राह पर कदम बढ़ा रहे हैं। जेठानी की लीक पर चलती देवरानी की तरह। यानी यह अब व्यक्तिगत नहीं, संस्थागत प्रयोग बनता जा रहा है – ‘कोर्ट में न जाना, लेकिन कोर्ट से न्याय माँगना!’
आख़िर में, यह मामला सिर्फ एक केजरीवाल और एक जज का नहीं है। यह उस दौर का आईना है, जहाँ राजनीति नैतिकता की भाषा में रणनीति बोलती है, और न्यायपालिका प्रक्रिया की भाषा में प्रतिष्ठा बचाती है। दोनों अपने-अपने किले में खड़े हैं। एक के हाथ में सत्याग्रह का झंडा है, दूसरे के हाथ में न्याय की मर्यादा। और जनता? वह समझने की कोशिश के रही है कि यह लड़ाई ‘न्याय’ की है, या ‘नैरेटिव’ की! क्योंकि अगर हर असहमति सत्याग्रह है, और हर असहमति का जवाब ‘फोरम शॉपिंग’ है, तो फिर असली सत्याग्रह और असली न्याय – दोनों ही कहीं फाइलों के नीचे दबकर दम तोड़ देंगे!
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