जीएसडीपी से जुड़े पुनर्विभाजन : रेवंत रेड्डी

हैदराबाद, मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने महिला आरक्षण और निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्विभाजन को एक साथ जोड़ने पर केंद्र सरकार की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने कहा कि दोनों मुद्दे अलग-अलग हैं और इन्हें अलग-अलग लागू किया जाना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र की मोदी सरकार महिला आरक्षण की आड़ में दक्षिण और छोटे राज्यों के साथ अन्याय करने की घोर साजिश कर रही है, जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि निर्वाचन क्षेत्रों का विभाजन जनसंख्या के आधार पर स्वीकार नहीं होगा।

इसके उलट केंद्र को चाहिए कि दक्षिण और छोटे राज्यों को विशेषाधिकार दे। उन्होंने कहा कि यदि मोदी सरकार अपने वर्तमान स्वरूप में निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्विभाजन करती है तो देश का राजनीतिक सत्ता पूरी तरह से उत्तर भारत के हाथ में आ जाएगी और यह पूरे देश लिए अच्छा संकेत नहीं होगा। रेवंत रेड्डी ने एक हाइब्रिड मॉडल का प्रस्ताव देते हुए कहा कि नई सीटों का वितरण जनसंख्या और राज्यों के आर्थिक योगदान (जीएसडीपी) के आधार पर किया जाना चाहिए। इस मुद्दे पर सभी राजनीतिक दलों, विशेषज्ञों और राज्यों से व्यापक चर्चा की जानी चाहिए।

केंद्र सरकार पर राजनीतिक रणनीति अपनाने का आरोप

मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी आज सचिवालय में उप मुख्यमंत्री भट्टी विक्रमार्का, मंत्रिमंडल के सदस्यों, सांसदों एवं विधायकों के साथ संवाददाताओं को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार रणनीतिक रूप से दोनों विषयों को मिलाकर विपक्ष पर सहयोग न करने का आरोप लगा रही है। उन्होंने सुझाव दिया कि इन पर अलग-अलग चर्चा कर स्पष्ट नीतियाँ बनाई जाएँ।

रेवंत रेड्डी ने कहा कि महिलाओं को मताधिकार देने से लेकर उन्हें विभिन्न संवैधानिक पदों पर अवसर देने तक कांग्रेस पार्टी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। महिला आरक्षण विधेयक को पहले राज्यसभा में पारित किया गया था, लेकिन भाजपा के कारण ही लोकसभा में यह पारित नहीं हो सका। उन्होंने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया कि महिला आरक्षण कानून को तत्काल लागू करने के बजाय 2026 की जनगणना से जोड़कर टालने की कोशिश की जा रही है। उनका कहना है कि यदि 2024 के लोकसभा चुनाव में 33 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जाता, तो बड़ी संख्या में महिलाएं संसद में पहुंच सकती थीं।

परिसीमन को लेकर भाजपा पर साजिश के आरोप

सीएम ने निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्विभाजन को लेकर भाजपा की साजिश पर चिंता जताते हुए कहा कि जनसंख्या के आधार पर सीटों की संख्या बढ़ाने से दक्षिण और उत्तर भारत के बीच असमानता बढ़ेगी। केंद्र सरकार 50 प्रतिशत सीटें बढ़ाने की योजना बना रही है, जिससे दक्षिणी राज्यों की राजनीतिक हिस्सेदारी कम हो सकती है, जबकि उत्तरी राज्यों का प्रभाव बढ़ेगा।

सीएम ने चेतावनी दी कि जल्दबाजी में लिए गए फैसले देश में क्षेत्रीय असंतुलन को बढ़ा सकते हैं और उत्तर-दक्षिण के बीच दूरी बढ़ा सकते हैं। उन्होंने कहा कि आज भाजपा जानबूझ कर महिला आरक्षण को निर्वाचन क्षेत्र पुनर्विभाजन से जोड़ रही है। यह एक राजनीतिक साजिश है। यदि 2026 की जनगणना के अनुसार नियम संशोधित किए जाएँ, तो 2029 लोकसभा और विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों में महिला आरक्षण लागू किया जा सकता है।

कांग्रेस इसको पूर्ण समर्थन देगी, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्विभाजन को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि पहले तीन बार पुनर्विभाजन हुआ है। 1967 में 520 सीटें, 1976 में 542 सीटें और बाद में सिक्किम से एक सीट जुड़कर 543 हो गईं। दक्षिण भारत में परिवार नियोजन के कारण जनसंख्या कम हुई, जबकि उत्तर भारत में इसके अभाव में जनसंख्या बढ़ी। इंदिरा गांधी ने इस स्थिति को समझते हुए लोकसभा सीटों के आधार पर पुनर्विभाजन का निर्णय लिया और 25 वर्षों तक सीटों की वृद्धि पर रोक लगाई थी।

जनसंख्या आधारित परिसीमन पर रेवंत रेड्डी का बयान

रेवंत रेड्डी ने कहा कि जनसंख्या आधारित पुनर्विभाजन को नियंत्रित किया गया। 2001 में वाजपेयी सरकार ने पुनर्विभाजन पर कानून में संशोधन किया। इसके परिणामस्वरूप 2009 में तेलंगाना को 17 और आंध्र प्रदेश को 25 लोकसभा सीटें मिलीं। तेलंगाना को 119 और आंध्र प्रदेश को 175 विधानसभा सीटें मिलीं। 2026 तक सीटों की वृद्धि पर कानूनी रोक है। दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या आधारित पुनर्विभाजन का विरोध करते हुए प्रधानमंत्री को पत्र लिखा है।

अब अनुपात के नाम पर 50 प्रतिशत सीटें बढ़ाने की बात की जा रही है। इससे दक्षिण के साथ घोर अन्याय होगा। केरल में 20 और यूपी 80 सीटों के आधार पर इन राज्यों के बीच अभी 60 सीटों का अंतर है, लेकिन 50 प्रतिशत बढ़ाने पर यह अंतर 90 सीट हो जाएगा। तेलंगाना और यूपी के बीच भी अंतर बढ़ेगा। दक्षिण में 130 सीटें हैं, जो 50 प्रतिशत बढ़कर 195 हो जाएँगी। उत्तर में 413 सीटें हैं, जो बढ़कर 621 हो जाएँगी।

इससे दक्षिण और उत्तर के बीच अंतर और बढ़ेगा। इससे देश की सरकार बनाने का पूरा अधिकार उत्तर के हाथ में चला जाएगा। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर दक्षिणी राज्यों के साथ-साथ दिल्ली और पंजाब जैसे छोटे राज्यों को भी एकजुट किया जाएगा और इस संबंध में पत्र लिखा जाएगा। साथ ही उन्होंने कहा कि संसद में इस विधेयक को कैसे पारित किया जाता है, यह देखा जाएगा और इस पर राजनीतिक लड़ाई जारी रहेगी।

बीजेपी ने नहीं बनाया महिला को अध्यक्ष

मुख्यमंत्री ने बीजेपी पर हल्ला बोलते हुए कहा कि भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के बाद से अब तक 15 अध्यक्ष नियुक्त हुए, लेकिन एक भी महिला को अध्यक्ष नहीं बनाया गया। उन्होंने कहा कि इससे स्पष्ट होता है कि बीजेपी में महिलाओं के प्रति न तो सम्मान है और न ही ईमानदार प्रतिबद्धता। इसके विपरीत, कांग्रेस पार्टी ने इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी के नेतृत्व में लंबे समय तक काम किया और महिलाओं को नेतृत्व के अवसर दिए।

राजनीति में नंबर के महत्व को रेखांकित करते हुए रेवंत रेड्डी ने कहा कि वाजपेयी सरकार एक वोट से गिर गई थी, जो इस बात का उदाहरण है कि राजनीति में नंबर का कितना महत्व होता है। उन्होंने कहा कि बिना पर्याप्त संख्या के कोई भी राजनीतिक दल प्रभावी बातचीत नहीं कर सकता। उन्होंने चेतावनी दी कि अच्छी तरह काम कर रहे राज्यों को दंडित नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने भाजपा नेताओं, विशेष रूप से बंडी संजय की टिप्पणियों की आलोचना करते हुए कहा कि उनके बयान दक्षिण भारत के एससी, एसटी और महिलाओं के खिलाफ हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी महिलाओं को द्वितीय श्रेणी के नागरिकों की तरह देखती है।

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द्वितीय श्रेणी में धकेलने का प्रयास

मुख्यमंत्री ने कहा कि बीजेपी शासन में दक्षिणी राज्यों को केंद्र में महत्वपूर्ण मंत्रालय नहीं दिए गए। राष्ट्रपति जैसे बड़े पद भी दक्षिण को नहीं दिए गए। उन्होंने कहा कि संवाद समान स्तर वालों के बीच होता है, कमजोर और मजबूत के बीच संवाद नहीं होता। केंद्र सरकार राजनीतिक रूप से कुछ राज्यों को द्वितीय श्रेणी में धकेलने की कोशिश कर रही है। यदि मोदी सरकार इस साजिश में कामयाब होती है तो छोटे राज्यों जैसे दिल्ली और पंजाब की राजनीतिक स्थिति भी कमजोर होगी।

दक्षिण और छोटे राज्यों के लिए यह गंभीर खतरा है। पहले यह तय होना चाहिए कि किस आधार पर सीटें बढाई जा रही है। यह केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि जनता से जुड़ा विषय है। उन्होंने कहा कि तेलंगाना राज्य का गठन और नक्सलवाद जैसी समस्याएं भेदभाव के कारण उत्पन्न हुईं। बीजेपी इस भेदभाव को और बढ़ाना चाहती है। महिला बिल के नाम पर बाधाएं डाली जा रही हैं। महिला आरक्षण तुरंत लागू किया जाना चाहिए। वर्तमान लोकसभा और विधानसभा सीटों में ही इसे लागू किया जाए। उन्होंने बार बार यह प्रश्न उठाया कि मोदी गुजरात छोड़कर उत्तर प्रदेश से क्यों चुनाव लड़ते हैं। वे जानते हैं कि देश की सत्ता का अधिकार बड़े राज्य तय करते हैं।

केवल कर देने और झुकने को तैयार नहीं

रेवंत रेड्डी ने कहा कि दक्षिण भारत आर्थिक शक्ति है, जबकि उत्तर भारत राजनीतिक शक्ति है। उन्होंने कहा कि हम केवल कर देने और झुकने के लिए तैयार नहीं हैं। साथ ही सुझाव दिया कि संसद में विस्तृत बहस और राज्यों की सहमति के बाद ही कोई निर्णय लिया जाए। उन्होंने कहा कि मैं पुनर्विभाजन के लिए एक हाइब्रिड मॉडल प्रस्तावित करता हूँ। 272 नई सीटों में से 136 सीटें जनसंख्या के आधार पर और 136 सीटें जीएसडीपी के आधार पर दी जाएँ, जो राज्य अर्थव्यवस्था में अधिक योगदान देते हैं, उन्हें प्राथमिकता मिलनी चाहिए। दक्षिण भारत देश को राजस्व, रोजगार और अवसर प्रदान करता है।

फिर हमें क्यों दंडित किया जा रहा है? उन्होंने कहा कि पूर्वोंत्तर की तरह दक्षिण और छोटे राज्यों को 25 वर्ष के लिए विशेषाधिकार दिया जा सकता है। रेवंत रेड्डी ने कहा कि पूर्वोत्तर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में केवल जनसंख्या के आधार पर सीटें नहीं दी गईं, बल्कि प्रतिनिधित्व के लिए दी गई हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि शिक्षा और नौकरियों में 50 प्रतिशत आरक्षण और 50 प्रतिशत मेरिट होना चाहिए। पुनर्विभाजन पर सभी दलों की बैठक होनी चाहिए। सभी संस्थाओं से चर्चा करनी चाहिए। संसद में इस पर विस्तृत बहस होनी चाहिए। विशेषज्ञ समिति बनाई जानी चाहिए। सभी विधानसभा में चर्चा के बाद संसद में मंजूरी लेकर निर्णय लिया जाए। उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया को मार्च 2028 तक पूरा किया जा सकता है। जल्दबाजी में निर्णय लेकर देश में उत्तर और दक्षिण के बीच अंतर नहीं बढ़ाना चाहिए।

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