संत एकनाथ प्रवृत्ति और निवृत्ति का अनूठा समन्वय थे


तिथि मुहूर्त

आज संत एकनाथ षष्ठी का व्रत एवं पूजन किया जाएगा।

महाराज एकनाथ भारत के एक प्रसिद्ध संत थे। उनका जन्म सन् 1533 पैठण में संत भानुदास के कुल में हुआ था। उनकी माता का नाम रुक्मिणी और पिता का नाम सूर्यनारायण था, लेकिन दुर्भाग्य से एकनाथ के बचपन में ही जब उनके माता-पिता का निधन हो गया, तो उनके दादा पापाणि ने उनकी देखभाल की। एकनाथ के परदादा संत भानुदास विट्ठल भक्त थे।

बालक एकनाथ स्वभावत: श्रद्धावान तथा बुद्धिमान थे। देवगढ़ के हाकिम जनार्दन स्वामी की ब्रह्मनिष्ठा, विद्वत्ता, सदाचार और भक्ति से भावुक होकर एकनाथ उनकी ओर आकृष्ट हुए और उनके शिष्य बन गए। एकनाथ ने अपने गुरु से ज्ञानेश्वरी, अमृतानुभव, श्रीमद्भागवत आदि ग्रंथों का अध्ययन किया, जिससे उनका आत्मबोध जाग्रत हुआ।

गुरु की आज्ञा से गृहस्थ बने। एकनाथ अपूर्व संत थे। प्रवृत्ति और निवृत्ति का ऐसा अनूठा समन्वय कदाचित् ही किसी अन्य संत में दिखाई देता है। आज से 400 वर्ष पूर्व इन्होंने मानवता की उदार भावना से प्रेरित होकर अछूतोद्धार का प्रयत्न किया। ये जितने ऊँचे संत थे, उतने ही ऊँचे कवि भी थे।

इनकी टक्कर का बहुमुखी सर्जनशील प्रतिभा का कवि महाराष्ट्र में इनसे पहले पैदा नहीं हुआ था। महाराष्ट्र की अत्यंत विषम अवस्था में इनको साहित्य सृष्टि करनी पड़ी। मराठी भाषा, उर्दू-फारसी से दब गई थी। दूसरी ओर संस्कृत के पंडित देशभाषा मराठी का विरोध करते थे।

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इन्होंने मराठी के माध्यम से ही जनता को जाग्रत करने का बीड़ा उठाया। संत एकनाथ का निधन 25 फरवरी, 1599 मराठी पंचांग के अनुसार फाल्गुन वद्य षष्ठी, शक 1521 को हुआ। इस दिन को एकनाथ षष्ठी के नाम से जाना जाता है। आज भी हर साल षष्ठी के दिन हजारों श्रद्धालु संत एकनाथ के दर्शन के लिए पैठण पहुंचते हैं।

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