अग्नि के अवतार संत वल्लभाचार्य

रत्नगर्भा भारत भूमि पर तात्विक अनुसंधान की यात्रा में द्वैताद्वैत सिद्धांत के बाद हमारा परिचय शुद्धाद्वैत सिद्धांत से हुआ, जिसके प्रवर्तक संत वल्लभाचार्य हुए, जिन्होंने न केवल दुनिया को नई तात्विक दृष्टि प्रदान की, बल्कि सूरदास जैसे कोमल भावों और मोहक अनुभूतियों वाले महान कवि भी इस जगत को प्रदान किया।

संत वल्लभाचार्य का जन्म बैसाख मास के कृष्ण पक्ष की वरुथिनी एकादशी को वाराणसी के एक साधारण तेलुगु परिवार में हुआ था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, उनके पिता लक्ष्मण भट्ट अपने साथियों और पत्नी इल्लम्मा संग यात्रा पर थे। छत्तीसगढ़ के रायपुर स्थित चंपारण्य वन में इल्लम्मा ने शमी के एक विशालकाय वृक्ष के नीचे आठ माह के शिशु को जन्म दिया। प्रसव के उपरांत इल्लम्मा को लगा कि उनका शिशु मृत जन्मा है।

वल्लभाचार्य का दिव्य अनुभव और पुष्टिमार्ग की स्थापना

इसलिए दंपत्ति ने बालक को एक कपड़े में लपेटकर उसी वृक्ष के नीचे गड्ढा बनाकर रख दिया और नगर पहुंचकर अपने साथियों के साथ विश्राम करने लगे। निद्रावस्था में इल्लम्मा के सपने में श्रीनाथ जी ने प्रकट होकर कहा, जिस बालक को तुमने मृत समझकर वन में छोड़ दिया है, वह स्वयं मैं ही हूं। मैंने ही तुम्हारी कोख से जन्म लिया है।

दंपत्ति ने जाकर देखा तो अग्नि की सुरक्षा के घेरे के बीच शिशु सुरक्षित पड़ा था। उन्होंने बालक को उठाकर सीने से लगाया। इस प्रकार अग्निदेव द्वारा सुरक्षित रखे जाने के कारण वल्लभाचार्य अग्नि के अवतार माने गये। शास्त्राय मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने भक्त वल्लभाचार्य को गोकुल में एवं गोवर्धन पर्वत पर प्रत्यक्ष दर्शन दिया था।

वल्लभाचार्य ने परमात्मा से प्राणि मात्र को प्राप्त होने वाले अनुग्रह की गहन विवेचना करते हुए उसको पुष्टि या पोषण नाम दिया और अपने सिद्धांत को पुष्टिमार्ग बताया। इस प्रकार, वे पुष्टि मार्ग के प्रवर्तक बने। उन्होंने ब्रज क्षेत्र में वैष्णववाद के भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति पर पेंद्रित पुष्य अथवा पुष्टि संप्रदाय की स्थापना भी की।

वल्लभाचार्य का तात्विक चिंतन

संत वल्लभाचार्य ने अपने तात्विक चिंतन की पृष्ठभूमि से आधिभौतिक, आध्यात्मिक एवं आधिदैविक नामक ब्रह्म के तीन रूप बताये। उन्होंने ब्रह्मसूत्र पर अणुभाष्य, भागवत् की सुबोधिनी व्याख्या, सिद्धान्त रहस्य, भागवत् लीला रहस्य, एकांत रहस्य, विष्णुपद, अंतकरण प्रबोध, आचार्यकारिका, आनंदाधिकरण, नवरत्न निरोध लक्षण और उसकी निवृत्ति, संन्यास निर्णय आदि ग्रंथों की रचना की।

संत वल्लभाचार्य की उद्घोषणा है कि कार्य और कारण एकमेव यानी संपृक्त हैं तथा उत्पत्ति, स्थिति और लय तीनों रूपों में यह दृश्यमान जगत वास्तव में प्रभु की लीला मात्र है। तात्पर्य यह है कि वल्लभाचार्य के परब्रह्म ही श्रीमद्भाग्वद्गीता में उल्लेखित पुरुषोत्तम ब्रह्म अर्थात् स्वयं भगवान श्रीकृष्ण हैं। वे ही लीला पुरुष हैं।

वल्लभाचार्य के अनुसार, यह संपूर्ण जगत् लीला पुरुष के क्रीड़ाभाव के कारण ही आविर्भाव एवं तिरोभाव रूपों में देखा और अनुभव किया जाता है। एक बार संत वल्लभाचार्य आगरा-मथुरा रोड पर यमुना के किनारे वफंदावन की ओर पैदल यात्रा कर रहे थे। रास्ते में उन्हें एक दृष्टिहीन व्यक्ति बिलखता हुआ दिखाई दिया।

सूरदास और महाप्रयाण की कथा

वल्लभाचार्य ने जब उससे बिलखने का कारण पूछा, तो दृष्टिहीन व्यक्ति ने उन्हें बताया, मैं अंधा, क्या जानूं कि लीला क्या होती है? यह सुनते ही वल्लभाचार्य की करुणा जाग गई। तत्पश्चात उन्होंने उस दृष्टिहीन व्यक्ति के माथे पर अपना हाथ रखा, पांच हजार वर्ष पूर्व ब्रज की भूमि पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा रची गईं सभी लीलाएं उसकी बंद आंखों के पटल पर ऐसे तैर गईं, मानो वे भगवान द्वारा उस व्यक्ति के समक्ष अभी ही रची जा रही हों।

उसके बाद वल्लभाचार्य उस व्यक्ति को अपने साथ वफंदावन स्थित श्रीनाथ मंदिर ले गये। वहां होने वाली आरती के समय प्रतिदिन एक नया पद की रचना करके गाने का सुझाव दिया। वह परम सौभाग्यशाली दृष्टिहीन व्यक्ति सूरदास जी थे। शास्त्र बताते हैं कि अपने महत्वपूर्ण आध्यात्मिक कार्यों और कर्तव्यों को पूर्ण करने के बाद वल्लभाचार्य काशी आ गये।

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एक दिन हनुमान घाट पर वे स्नान कर रहे थे, तभी उनके शिष्यों एवं अन्य लोगों ने देखा कि एक उज्ज्वल ज्योति-शिखा ऊपर की ओर उठी है। वल्लभाचार्य ज्योति-शिखा के साथ ही सदेह ऊपर उठने लगे और देखते-ही-देखते आकाश में विलीन हो गये। इस प्रकार, वल्लभाचार्य ने 52 वर्ष की आयु में आषाढ़ शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को महाप्रयाण किया था। हनुमान घाट पर उनकी एक बैठक बनी हुई है।

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