आत्मनिष्ठ आचारनिष्ठ व निस्पृह साधक आचार्य महाश्रमण

व्यक्ति जन्म लेता है और बचपन, यौवन आदि अवस्थाओं को पार करता हुआ अपना जीवन यापन करता है, यह जीवन की साधारण यात्रा है, पर कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जो अपने जीवन की यात्रा को असाधारण व अनुकरणीय बना देते हैं। विश्वपटल के अनेक महापुरुषों में एक नाम है-जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्म संघ के 11वें अधिशास्ता आचार्य महाश्रमण का।

राजस्थान के छोटे-से कस्बे सरदारशहर में जन्मे बालक मोहन से मुनि मुदित व महाश्रमण की यात्रा पर यात्रायित आचार्य महाश्रमण न सिर्फ एक विशाल धर्म संघ के आचार्य हैं बल्कि इनकी पहचान एक गुरु और एक विधान के नाम से तेरापंथ धर्म संघ से है, जिसकी मर्यादा व अनुशासन शैली अद्भुत व अद्वितीय कही जा सकती है। धर्म संघ के 10 आचार्यों की उज्जवल इतिहास परंपरा पर चलने वाले ये 11वें अधिशास्ता एक उच्च कोटि के आत्मनिष्ठ व दृढ़ आचारनिष्ठ संत कहे जा सकते हैं।

बाल्यकाल से दीक्षा तक: संयम और सेवा की प्रेरक यात्रा

इन्होंने 12 वर्ष की छोटी-सी वय में संयम ग्रहण किया और जैन साधु की कठिन साधना पद्धति व परिग्रहों में अपने आपको पूर्ण अहोभाव से समर्पित कर दिया। वैसे तो यहां यह परंपरा है कि जो भी मुमुक्षु होते हैं, आचार्य के हाथों से ही दीक्षित होते हैं, पर कुछ मुमुक्षुओं को आचार्य की अनुज्ञा से संघ के साधु-साध्वियों के हाथों से भी दीक्षित होने का अवसर मिला है, पर वे शिष्य एक आचार्य ही कहलाए जाते हैं।

इसमें एक उदाहरण स्वयं आचार्य महाश्रमण का है जिनकी दीक्षा गुरुदेव तुलसी की आज्ञा से मुनि सुमेरमल लाडनूं के करकमलों से हुई, उनके सहदीक्षित मुनि उदित कुमार हैं, कुछ समय उपरांत आचार्य प्रवर ने अपने दीक्षा गुरु मुनि सुमेरमल स्वामी लाडनूं को तेरापंथ धर्म संघ के मंत्री मुनि प्रवर पद पर सुशोभित किया, वे शासन स्तंभ भी कहलाए।

तिन्नाणं तारयाणं की युक्ति को सार्थक करते हुए, आचार्य महाश्रमण ने अब तक सैकड़ों मुमुक्षुओं को शिक्षित व दीक्षित किया, जिनमें एक साथ 41 दीक्षाएं जो सर्वाधिक संख्या है, उनके हाथों से संपन्न हुई। आचार्य महाश्रमण की इस बैशाख शुक्ल पक्ष में 65वाँ जन्मदिन, 17वाँ पाट महोत्सव और आज उनका 53वां दीक्षा दिवस पूरे धर्म संघ में उल्लास व उत्साह के मनाया जा रहा है।

अहिंसा के संदेश के साथ 61,000 किमी की प्रेरक पदयात्रा

तीर्थंकर भगवान महावीर व तेरापंथ के आध्य प्रवर्तक आचार्य भिक्षु के सिद्धांतों पर अटूट श्रद्धा रखने वाले महाश्रमण एक महान यायावर कहे जा सकते हैं। इतने कम आचार्य काल में आपने 61000 किलोमीटर की यात्रा की और अहिंसा, नैतिकता व सद्भावना के संवाहक बने। तीन देश नेपाल, भूटान और ब्रह्मा के अलावा भारत के 23 राज्यों की यात्रा संपन्न कर चुके हैं और भविष्य में पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, जम्मू, कश्मीर आदि की यात्रा द्रव्य क्षेत्र कल की अनुकूलता के अनुसार घोषित की गई है।

आप एक स्थिर योगी साधक हैं, जो मितभाषी अनुत्तर इंद्रिय संयमी (चौबीस 24 घंटे आत्मलीन रहने वाले), जीना बाहर रहना भीतर की साधना में स्थितप्रज्ञ योगी पुरुष है। आप में जीव मात्र के प्रति करुणा व अनुकंपा के भाव अतुलनीय हैं। आपकी पाप भीरुता देखते ही बनती है, बिना प्रक्षालन मानो आपकी कोई भी क्रिया संपन्न नहीं हो पाती। दो दो आचार्य की शासना व शिक्षा से आपकी नेतृत्व क्षमता बेजोड़ है। आपकी संघ संचालना सैकड़ों शिष्य संपदा को प्राण देने वाली है।

आपका हर प्रवचन आगम वाणी से ही प्रारंभ होता है। ऐसा लगता है, जैसे आप आगम के संगायक हैं। भगवान की वाणी यानी आगम संपादन के दुरुह कार्य में आप वर्षों से संलग्न हैं। चाहे यात्रा हो या चाहे हजारों भक्तों का आवागमन हो, आपका निर्धारित हर कार्य निर्बाध गति से संचालित होता है। अभी वर्तमान में तेरापंथ की राजधानी लाडनूं में योगक्षेम वर्ष गतिमान है। सैंकड़ों की संख्या में चारित्र आत्माएं आपके उपपात में नूतन ज्ञान प्राप्त कर रही हैं तथा प्राप्त के संरक्षण में प्रशिक्षित हो रही हैं।

प्रवचन और साहित्य से समाज को दिशा देने वाले संत

प्रतिदिन के आपके समीक्षात्मक प्रवचन मानों शिष्य संपदा की हर जिज्ञासा को समाहित और समाधित करने वाले हैं। आप उच्च कोटि के साहित्यकार हैं। आपको हृदयग्राही सहज, सरल भाषा तत्वों व आगमों के गूढ़ रहस्यों को उद्घाटित करने वाली है। आपकी लेखनी ने न जाने कितने सुधि पाठकों की जिज्ञासाओं को शांत किया है। गीता जैसे महाग्रंथ के तुलनात्मक साहित्य ने हर वर्ग के पाठकों को आकर्षित किया है।

अंजू बैद

अब तक आपकी लगभग पचासों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें मुख्यत संवाद भगवान से, धर्म का शिलान्यास, धर्म है उत्कृष्ट मंगल, निर्वाण का मार्ग, सुखी बनो, संपन्न बनो, विजयी बनो, 18 पाप, तीन बातें, छ बातें और सात बातें ज्ञान की साहित्यिक संपदा है।

आप कुशल प्रवचनकार के साथ-साथ समाज की समस्याओं के सुधारक भी हैं। साधु के हर परिग्रह को शांत मन से सहन करने वाले आप त्यागी, वैरागी, महातपस्वी, शांति दूत, युग प्रधान आचार्य हैं, जो सिर्फ जैन तेरापंथ धर्म संघ के गणनायक नहीं बल्कि जन-जन को त्राण देने वाले संत शिरोमणि व पथ प्रणेता हैं।

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