शिवरात्रि जागरण की नहीं, जागृति की रात्रि : सद्गुरु रमेशजी

हैदराबाद, जागरण स्थूल और जागृति सूक्ष्म घटना है। केवल शरीर के द्वारा जागरण करने से हम शिवरात्रि का लाभ नहीं उठा सकते। जब तक हम भीतर से जागृत नहीं होते, तब तक शिवरात्रि सार्थक नहीं हो सकती। शिवरात्रि जागरण की नहीं जागृति की रात्रि है। उक्त उद्गार सद्गुरु रमेशजी ने शिवरात्रि पर आयोजित विशेष सत्संग में पूर्णानंद केंद्र, जनवाड़ा में व्यक्त किए। रमेशजी ने कहा कि जो जीव सत् चित् आनंद स्वरूप सर्वव्यापी शिव की शरण में चला जाता है, वह मुक्त होकर समस्त सृष्टि में शिव बनाकर विचरण करता है।

अवसर पर महाकाल यात्रा का आयोजन किया गया, जिसका आध्यात्मिक अर्थ समझाते हुए रमेशजी ने कहा कि महाकाल, काल और स्पेस के परे हैं। महाकाल से ही समय और स्पेस उत्पन्न हुए हैं, जिसे हम काल कहते हैं। इसमें व्याप्त प्राण शक्ति को ही काली के नाम से जाना जाता है। ब्रह्मा और विष्णु में कौन श्रेष्ठ है, इस कथा के माध्यम से उन्होंने आदि और अंत से रहित शिव तत्व के अनेकों रहस्य प्रकट किए।

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चंचल मन शक्ति, स्थिर चित शिव का स्वरूप

रमेशजी ने कहा कि जीव में जो चंचल मन है, वह शक्ति का स्वरूप है और जो स्थिर चित है, वह शिव का स्वरूप है। गुरु ही हमारे मन को किस प्रकार चित् से प्रेम करके भक्ति में हों, इसका ज्ञान करवाता है। इसके माध्यम से हमारा मन, चंचल मन के द्वारा संसार में विचरण करते हुए भी भीतर चित में स्थिर रहता है। तब हम आत्मज्ञान की स्थिति के आनंद में झूमते रहते हैं। निर्वाण अष्टकम् के जप, ज्ञान और ध्यान द्वारा उन्होंने सभी उपस्थित जीवों को उनके शिव स्वरूप की अनुभूति करवाई।

गुरु माँ ने अपने संबोधन में कहा कि शिवरात्रि मुक्ति की रात्रि है और मुक्ति जागरण से नहीं, बल्कि जागृति से संभव है। जागृति के लिए गुरु का ज्ञान, दर्शन, सत्संग और सान्निध्य आवश्यक है। हम सबको शिवरात्रि के काल का लाभ उठाते हुए टाइम और स्पेस के पार जाने की, यानि महाकाल की यात्रा करनी है। महाकाल ही सच्चिदानंद स्वरूप है। शिवरात्रि के विशेष कीर्तन, भजन, नृत्य और महाकाल की यात्रा तथा गुरु कृपा का लाभ उठाकर सभी उपस्थित जीवों ने पूर्ण आनंद की अनुभूति की।

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