बीसी आरक्षण पर कानून के तहत कार्रवाई करें : अदालत

हैदराबाद, तेलंगाना उच्च न्यायालय ने बीसी वर्ग को 42 प्रतिशत आरक्षण उपलब्ध करवाने के मामले पर राज्य सरकार और राज्य चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया और इस मामले पर पूर्ण विवरण पेश करने के आदेश देते हुए मामले की सुनवाई 8 अक्तूबर तक स्थगित कर दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस दौरान स्थानीय निकाय चुनाव को लेकर चुनाव अधिसूचना जारी की जाती है, तब भी इस याचिका पर सुनवाई जारी रहेगी। याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए तथ्यों पर सुनवाई होगी।

स्थानीय निकाय चुनाव में बीसी वर्ग को 42 प्रतिशत आरक्षण उपलब्ध करवाने के लिए राज्य सरकार द्वारा 26 सितंबर को जारी सरकारी आदेश संख्या 9 को चुनौती देते हुए मेडचल-मलकाजगिरी ज़िला, मूडूचिंतलापल्ली मंडल के केशवपुर ग्राम निवासी बुट्टेमगारी माधव रेड्डी, पेद्दीपल्ली ज़िला, महामुतारम मंडल के कम्मापल्ली ग्राम निवासी समुद्राला रमेश समेत नलगोंडा ज़िला, चिंतापल्ली निवासी गोरटी वेंकटेश द्वारा दायर अति आवश्यक हाउस मोशन याचिका पर आज सुनवाई की गई।

उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस अभिनंद कुमार शाविली और जस्टिस बी. विजयसेन रेड्डी की खण्डपीठ ने सुनवाई के दौरान सवाल उठाया कि जारी किए गए सरकारी आदेश पर गजेट आया है या नहीं। गजेट नहीं आया है, तो इन याचिकाओं पर जल्दबाजी में सुनवाई करने की आवश्यकता नहीं है। इस पर महाधिवक्ता ए. सुदर्शन रेड्डी ने कहा कि अभी गजेट जारी नहीं किया गया, लेकिन प्रतिवाद करते हुए याचिकाकर्ताओं की ओर से बताया गया कि गजेट जारी किया गया।

67% आरक्षण पर सवाल, याचिकाकर्ताओं ने बताया संविधान के विरुद्ध

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता बी. मयूर रेड्डी और जे. प्रभाकर ने दलील देते हुए बताया कि बीसी वर्ग को आरक्षण 25 प्रतिशत से बढ़ाकर 42 प्रतिशत करते हुए सरकार ने जल्दबाजी करते हुए रातोंरात सरकारी आदेश जारी किया। एससी वर्ग को 15 और एसटी वर्ग को 10 प्रतिशत आरक्षण को जोड़ा जाए, तो कुल आरक्षण 67 प्रतिशत तक पहुँच जाएगा, जो पंचायतराज अधिनियम की धारा 285 के विरुद्ध है।

वर्टिकल आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। कानून के अलावा कृष्णमूर्ति मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने इसे स्पष्ट किया। इंदिरा सहानी मामले में कुछ छूट दी गई है, जो पिछड़े क्षेत्र पर लागू होती है। कृष्णमूर्ति मामला, विकास किशनराव गवाली मामले में स्पष्ट किया गया है कि आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। राकेश कुमार के मामले में आदिवासी इलाकों में एससी वर्ग को कुछ छूट दी गई है।

तमिलनाडु में 9वें शेड्यूल में शामिल करने के कारण इस पर सवाल करने की आवश्यकता नहीं है। वर्तमान समय में यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में लम्बित है। इसी प्रकार महाराष्ट्र की सरकार द्वारा लाए गए कानून को सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया। एकल सदस्य न्यायाधीश द्वारा स्थानीय निकाय चुनाव करवाने के आदेश देने पर उस समय आरक्षण का उल्लेख नहीं किया गया। चुनाव अधिसूचना जारी होने पर सवाल उठाया जा सकता है।

राज्यपाल की मंजूरी से पहले आदेश क्यों? कोर्ट की सख्ती

दलील सुनने के पश्चात खण्डपीठ ने महाधिवक्ता को उद्देशित करते हुए कहा कि आरक्षण 42 प्रतिशत उपलब्ध करवाने के मामले में अदालत हस्तक्षेप नहीं कर सकती है, यह कहना गलत है। अधिसूचना जारी होती है, तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है। खण्डपीठ ने कहा कि आरक्षण को बढ़ाने के लिए कानून के तहत कार्रवाई की जानी चाहिए। पंचायतराज अधिनियम की धारा 285 में संशोधन करना संभव नहीं है।

विधानसभा में विधेयक सर्वसम्मति से पारित किया गया, लेकिन यह विधेयक मंजूरी के लिए राज्यपाल के पास लम्बित है। जब विधेयक लम्बित है, तब सरकारी आदेश कैसे जारी किया जा सकता है। खण्डपीठ ने कहा कि जनसंख्या के आधार पर क्या आरक्षण उपलब्ध करवाया जा रहा है, तब सरपंच के बीसी रहने या ओसी रहने से क्या फर्क पड़ता है। दोनों के लिए कार्य एक समान ही रहता है। शिक्षा और रोजगार की बात अलग है, लेकिन यहाँ प्रजा अपने प्रतिनिधि को चुनती है। इसे राजनीतिक दलों से हटकर समस्या के रूप में देखने की बात कहने पर भी सवाल उठाया।

खण्डपीठ ने कहा कि उनके उठाए गए सवाल आरक्षण का समर्थन करने या विरोध करने के नहीं है, बल्कि इस मामले को लेकर जताई गई आपत्ति और संदेह को दूर करना है। खण्डपीठ ने बताया कि तमिलनाडु का मामला सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है। इस दलील के साथ खण्डपीठ ने महाधिवक्ता से सवाल किया कि तमिलनाडु की तरह 9वें शेड्यूल में वे क्यों नहीं शामिल कर रहे हैं और वे कैसे संविधान के अनुच्छेद-200 का उल्लंघन कर सकते हैं।

विधेयक लंबित, बिना संशोधन आरक्षण लागू करने की तैयारी

विधेयक को लम्बित रखते हुए इस मामले पर आगे कैसे बढ़ा जा सकता है, इसे भी स्पष्ट नहीं किया गया। आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत को पार न करने के संबंध में संविधान में भी उल्लेख किया गया है और इसे सर्वोच्च न्यायालय ने भी स्पष्ट किया है। कानून में संशोधन किए बिना आगे कैसे बढ़ सकते हैं, एकल सदस्य न्यायाधीश के फैसले के चलते आगामी 30 सितंबर के भीतर अधिसूचना जारी करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

खण्डपीठ ने कहा कि विधेयक को मंजूरी न मिलने के कारण एकल सदस्य न्यायाधीश के समक्ष दो माह का समय देने का आग्रह कर नवंबर माह में चुनाव कराने से कुछ नुकसान होने वाला नहीं है। सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता ने दलील देते हुए कहा कि कानून में संशोधन लाने का सरकार को अधिकार है। इस पर कोई सवाल नहीं उठा सकता।

संशोधन संबंधी विधेयक को विधानसभा में सर्वसम्मति से पारित किया गया और इस विधेयक को राज्यपाल द्वारा मंजूरी देने, न देने पर भी इस मामले पर आगे बढ़ने के लिए सरकार कटिबद्ध है। उन्होंने कल्याणकारी कानून को लेकर हाउस मोशन याचिका दायर करने पर आश्चर्य जताया और कहा कि इस बेकार याचिका पर जब का तब सुनवाई कर फैसला लेने की आवश्यकता नहीं है।

दशहरे तक सुनवाई स्थगित, अधिसूचना पर दो दिन में विवरण मांगा गया

दशहरे के अवकाश तक इसे स्थगित करने और अवकाश के पश्चात पूर्ण विवरण के साथ सरकार की ओर से दलील रखने की महाधिवक्ता ने बात कही। उन्होंने कहा कि चुनाव एक सप्ताह में नहीं कराए जा रहे हैं और सरकार का निर्णय यदि संविधान के विरुद्ध होने पर अधिसूचना जारी होने के बाद भी इस मामले पर सुनवाई की जा सकती है। उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा अनुमति देने के बाद अधिसूचना जारी करने के लिए 45 दिन का समय रहता है।

चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जी. विद्या सागर ने दलील देते हुए बताया कि चुनाव करवाने के लिए चुनाव आयोग तैयार है। सरकार की ओर से मंजूरी मिलने पर चुनाव आयोग आगे बढ़ेगा। सरकार की मंजूरी के बिना आयोग कुछ नहीं कर सकता है। सभी पक्षों की दलील सुनने के पश्चात खण्डपीठ ने महाधिवक्ता से अधिसूचना जारी नहीं की जाएगी, इसका आश्वासन देने के लिए कहा।

इस पर महाधिवक्ता ने कहा कि सरकार से विवरण प्राप्त कर जानकारी दी जाएगी। इस पर खण्डपीठ ने कहा कि सरकारी आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगाते हुए अंतरिम आदेश जारी किया जा सकता है। इस पर महाधिवक्ता ने 15 मिनट का समय लिया और इसके बाद बताया कि संबंधित अधिकारी उपलब्ध नहीं है।

यह भी पढ़े : बीसी आरक्षण के खिलाफ दर्ज याचिकाएँ खारिज

इसीलिए उन्हें विवरण देने के लिए दो दिन का समय चाहिए। दशहरे के अवकाश पूर्ण होने के पश्चात सुनवाई करने की आवश्यकता जताई। दलील सुनने के पश्चात खण्डपीठ ने प्रतिवादी सरकार के मुख्य सचिव, बीसी कल्याण विभाग, पंचायतराज विभाग, ग्रामीण विकास विभाग, सामान्य प्रशासनिक विभाग, विधि विभाग के मुख्य सचिव, राज्य चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर सुनवाई 8 अक्तूबर तक स्थगित कर दी।

अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।

Related Articles

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Back to top button