भगवान महावीर के पिता सिद्धार्थ का अनुकरणीय आदर्श

ईस्वी पूर्व 599 में चैत्र शुक्ल त्रयोदशी की मध्य रात्रि को वैशाली के क्षत्रियकुण्ड ग्राम में मानो सूर्य ही उदित हुआ। महारानी त्रिशला के पुत्र-जन्म का मंगल-संदेश देने के लिए दासी प्रियंवदा राजा सिद्धार्थ के पास पहुँची। पुत्र-जन्म की खबर पाकर पिता सिद्धार्थ का रोम-रोम खिल उठा। उन्होंने अपने राजत्व के प्रतीक मुकुट को छोड़कर सारे आभूषण प्रियंवदा को सहर्ष भेंट कर दिए। इसके साथ ही उन्होंने सदा-सदा के लिए प्रियंवदा को दासत्व से मुक्त कर दिया। कहने को तो अभी वर्धमान का जन्म हुआ ही था, किन्तु अपने निमित्त से उन्होंने मानवीयता, स्वतंत्रता और उदारता का संदेश दे दिया था।


वस्तुत सिद्धार्थ का परिवार जैन धर्म के तेईसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ का अनन्य उपासक था। उस समय तक गणतंत्रीय प्रणाली का सूत्रपात हो चुका था। सिद्धार्थ के साले (भगवान महावीर के मामा) चेटक वैशाली गणतंत्र के अध्यक्ष थे। सबके प्रति समता और समानता तथा मूक-प्राणियों के प्रति करुणा जैसे जीवन मूल्यों के बीच सिद्धार्थ एक प्रजा-वत्सल नरेश के रूप में लोकप्रिय थे।


सिद्धार्थ को वर्धमान के गौरवशाली पिता होने का अवर्णनीय हर्ष था। उनके आदेश से संपूर्ण राज्य में वर्धमान का बारह दिवसीय जन्मोत्सव मनाया गया। उस दौरान पूरे वैशाली गणराज्य में जन्मोत्सव की धूम थी। कुंडलपुर का कोना-कोना सुगंध से सुरभित, वाद्य से निनादित और रोशनी से जगमगा उठा था। देवी-देवताओं ने भी उस जन्मोत्सव का भरपूर आनंद लिया। प्राकृत ग्रंथ कल्पसूत्र के अनुसार वर्धमान के जन्म के उपलक्ष्य में पिता सिद्धार्थ ने कारागृह से कैदियों को मुक्त कर दिया।

कर्जदारों के कर्ज माफ कर दिए। जरूरतमंदों की जरूरी आवश्यकताएँ पूरी कीं। आवश्यक वस्तुओं के दाम घटा दिए। विभिन्न कलाकारों को उनकी कलाबाजियाँ दिखाने का मौका दिया गया। कथा-वाचकों और सूक्ति-पाठकों के अलग सत्र आयोजित हुए।बारहवें दिन नाम-संस्कार किया गया। सबने कहा कि इस दिव्य शिशु के माता की कोख में आते ही संपूर्ण राज्य में धन-धान्य और सुख-सौभाग्य में अतिशय वृद्धि हुई। अत शिशु का नाम वर्धमान रखा गया। उस दिन सिद्धार्थ ने अपने स्वजनों, मित्रों, कर्मचारियों आदि को सादर आमंत्रित करके उनका आहार और उपहार से सत्कार किया।

- डॉ. दिलीप धींग
– डॉ. दिलीप धींग

यशस्वी पिता सिद्धार्थ द्वारा आयोजित वर्धमान का जन्मोत्सव प्रजाहित, परोपकार, कला, संस्कृति व साहित्य को बढ़ावा देने वाला एक अनुकरणीय आयोजन बन गया। आगम में सिद्धार्थ का एक अपर नाम यशस्वी भी बताया गया है। पिता के रूप में वे अपने नाम के अर्थ को सिद्ध करके सचमुच यशस्वी बन गए। उन्होंने अपने पिता होने का गौरव बढ़ाया। महान पुत्र ने संपूर्ण मानवता को गौरवान्वित कर दिया।

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