ज्ञान का नेत्र आत्मचेतना का द्वार

कहा जाता है कि चेहरा हमारे मन का सूचकांक होता है और आँखें आत्मा का दर्पण। यह कथन बहुत सत्य है। सही मानो में देखा जाए तो हमारी आँखें हमारे भीतर जो कुछ भी चल रहा है, उसे बखूबी प्रकट कर देती हैं, तभी तो कहते हैं कि चेहरा झूठ बोल सकता है, पर आँखें नहीं।
अक्सर यह भी देखा गया है कि जब किसी से सच बुलवाना होता है, तब उससे कहा जाता है कि ‘मेरी आँखों में आँखें डालकर कहो।’ हम आँखों से ही किसी को स्वीकार करते हैं और किसी को नजर अंदाज। बिना आँखों के सब कुछ बेरंग और बेसाज़-सा लगने लगता है।
आँखों में वो कशिश होती है, जिस कारण हम आँखों के माध्यम से बात भी कर सकते हैं। तभी तो परमात्मा के लिए कहा जाता है कि नजरो से निहाल करने वाला।आँखों द्वारा हम प्यार का इजहार, घृणा, सहानुभूति तथा अन्य कई ऐसी भावनाओं को प्रकट करते हैं, जो हमारे भीतर निरंतर विकसित होती रहती हैं।
हमारे मन की स्थिति अपनी पसंद और नापसंद, गर्व और पूर्वाग्रहों के अनुसार कार्य करने के लिए हमारी आँखों को निर्देशित करती हैं। एक दूषित मन वाला व्यक्ति अपनी आँखों का प्रयोग वासना, क्रोध, लोभ, जैसे दुराचारी उद्देश्यों को पूर्ण करने के लिए करता है, जबकि धर्मनिष्ठ व्यक्ति अपनी आँखों द्वारा प्रेम, दया, प्रशंसा, सहानुभूति, शुभकामनाएं और आशीर्वाद जैसी शुद्ध भावनाओं को प्रदर्शित करेगा। याद रखें ! हम खुद को सभ्य तभी कहला सकते हैं, जब हमारी आँखें सभ्य या पवित्र होंगी।
यदि हम दुराचारी व आपराधिक दृष्टिकोण वाले बनकर रहेंगे तो हमारे कर्म अधर्मी और पापमय होंगे, जिसके परिणामस्वरूप हम स्वयं दुःखी होंगे और आस-पास के लोग भी पीड़ित होंगे।हमारे शरीर के पांच संवेदीअंगों में से आँखें सबसे अधिक शक्तिशाली होती हैं, क्योंकि यह आत्मा की अनुभूति का द्वार होती हैं जिसके माध्यम से आत्मा हर चीज़ को अनुभूत करती हैं।
आँखों के विषय में जब बात होती है, तब हमारी दो आँखों की ही बात होती है, लेकिन हमारी तीसरी आँख की कभी कोई चर्चा नहीं होती, क्योंकि वह गैर भौतिक है। इसलिए उसे अदृश्य आँख भी कहा जाता है, जिसे भौतिक आँखों से देखा नहीं जाता है, अपितु उसके लिए ‘दिव्य बुद्धि’ या ‘दिव्य अंतर्दृष्टि’ की आवश्यकता पड़ती है, जो केवल सर्वशक्तिमान परमात्मा से ही प्राप्त की जा सकती है।
हमारी तीसरी आँख या ज्ञान का नेत्र खुलता है, तो प्रकाश हमारे जीवन में आता है और हमारी सोच में परिवर्तन आना शुरू हो जाता है। हम स्वयं एवं अन्य के वास्तविक रूप को इस नई दृष्टि के द्वारा स्पष्ट रूप से देखने लगते हैं। दया, सत्य और प्रेम हमारे विचारों में समाविष्ट हो जाते हैं। सर्व के प्रति हमारी दृष्टि बिना कोई द्वंद्व के स्वच्छ और आत्मीय बन जाती है।
इस तीसरी आँख को खोलने की विधि बुहत सहज है। इसके लिए हमें ‘ध्यान’ का अभ्यास करना होगा। ध्यान साधना द्वारा हमें स्वयं को अधिक गहराई से समझने की शक्ति प्राप्त होती है, जो हमें अपने आप को आंतरिक रूप से बहाल करने में मदद करती है। ध्यान द्वारा प्राप्त शांति का अनुभव हमें हमारी मूल प्रकृति के साथ संपर्क में लाने के लिए सक्षम बनाता है। तो आइए, हम सभी नियमित ध्यानाभ्यास द्वारा अपनी तीसरी आँख को खोलकर मन के अंधकार को मिटाएँ, ताकि विश्व में नई रौशनी फैले।
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