शिव के उग्र रूप की साधना का व्रत

तिथि मुहूर्त

विक्रम पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 9 मई, शनिवार की दोपहर 2 बजकर 2 मिनट से शुरु हो रही है, जो 10 मई, रविवार की दोपहर 3 बजकर 6 मिनट पर समाप्त होगी।

नोट

धार्मिक मान्यता के अनुसार, कालाष्टमी व्रत उसी दिन रखा जाता है, जिस दिन अष्टमी तिथि निशिता काल (मध्यरात्रि) में पड़ती है। इस आधार पर कालाष्टमी व्रत 9 मई, शनिवार को रखा जाएगा।

शिव-भक्तों के लिए कालाष्टमी का विशेष महत्व है। यह दिन भगवान शिव के रौद्र रूप भगवान काल भैरव को समर्पित है। हर माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कालाष्टमी मनाई जाती है। हिंदू धर्म में कालाष्टमी का विशेष महत्व माना जाता है। यह तिथि भगवान काल भैरव की उपासना के लिए समर्पित है।

मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा करने पर व्यक्ति के जीवन से भय, बाधा और नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं। इस दिन पूजा के लिए सबसे शुभसमय निशिता काल यानी मध्यरात्रि के दौरान भगवान काल भैरव की पूजा करना बहुत ही फलदायी माना जाता है।

पूजा विधि

कालाष्टमी को पूजा करने के लिए सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लें। पूजाघर या भैरव मंदिर में भगवान काल भैरव की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। उन्हें धूप, दीप, फूल, अक्षत और काले तिल अर्पित करें। विशेष रूप से सरसों का तेल, नारियल और मीठा प्रसाद चढ़ाना शुभमाना जाता है। रात्रि में निशिता काल के दौरान फिर से विधिपूर्वक पूजा करें और भैरव चालीसा या मंत्रों का जाप करें। इस दिन कुत्तों को भोजन कराना भी शुभ माना जाता है, क्योंकि उन्हें काल भैरव का वाहन माना जाता है।

व्रत के लाभ

कालाष्टमी व्रत रखने से व्यक्ति को मानसिक शांति मिलती है और जीवन में आ रही परेशानियों से छुटकारा मिलता है। यह व्रत नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है और आत्मबल को मजबूत बनाता है। यह साधना और आध्यात्मिक उन्नति के लिए बहुत ही प्रभावी माना जाता है।

महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, काल भैरव को भगवान शिव का उग्र स्वरूप माना जाता है। कालाष्टमी को उनकी पूजा करने से शत्रुओं पर विजय मिलती है, ग्रह दोष शांत होते हैं और जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं। मान्यता है कि इस दिन व्रत और पूजा करने से अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है और व्यक्ति को सुरक्षा एवं समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।

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