परामी परशुराम के परामी शिष्य

भगवान परशुराम श्रीहरि विष्णु के छठवें अवतार थे। उनका अवतार भगवान श्रीराम से पहले हुआ था। परशुराम चिरंजीवी हैं और वे आज भी इस धरती पर मौजूद हैं। उनका जन्म वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र में रात के प्रथम प्रहर में हुआ था। परशुराम की माता का नाम रेणुका और पिता का त्रषि जमदाग्नि बताया जाता है। उन्होंने भगवान शिव की कठिन तपस्या की थी।

तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने परशुराम को कई अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए। इन अस्त्रां में जो सबसे दिव्य और शक्तिशाली अस्त्र था- फरसा यानी परशु था। इसी को धारण करने से भगवान परशुराम के नाम से विख्यात हुए। परशुराम भगवान विष्णु के उग्र अवतार माने जाते हैं। उन्होंने इक्कीस बार इस धरती को क्षत्रियों से विहीन किया। महाभारत काल में उनके तीन शिष्य थे, जिनकी शक्ति से संसार कांपता था। यहां उनका वर्णन किया जा रहा है।

भीष्म पितामह

हस्तिनापुर के महाराज शांतनु और माँ गंगा के पुत्र देवदत्त, जिन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य की भीष्म प्रतिज्ञा की और भीष्म के नाम से विख्यात हुए। महाभारत काल में भीष्म से बड़ा कोई योद्धा नहीं था। उनको इच्छा-मृत्यु का वरदान प्राप्त था। भगवान परशुराम से ही उन्होंने अस्त्र-शस्त्रां का ज्ञान प्राप्त किया था। भीष्म के धनुष की टंकार सुनकर बादलों का सीना फट जाता था। भीष्म ने अपने गुरु परशुराम से युद्ध किया था, जो 21 से 23 दिन तक चला, लेकिन उसका कोई नतीजा नहीं निकला था।

द्रोणाचार्य

परशुराम के दूसरे शिष्य का नाम था- द्रोणाचार्य। वो ब्राह्मण, जिसने बहुत से योद्धा बनाए। द्रोणाचार्य महागुरु कहे जाते हैं। परशुराम ने उन्हें न सिर्फ शस्त्रां का ज्ञान दिया था, बल्कि दिव्यास्त्रां का भी ऐसा ज्ञान दिया, जो पूरी सृष्टि को भस्म कर सकता था। कहा जाता है कि जब तक द्रोणाचार्य के हाथ में धनुष था, तब तक उनको परास्त नहीं किया जा सकता था।

कर्ण

माता कुंती के पुत्र कर्ण के पिता सूर्य देव थे। कर्ण कवच और कुंडल के साथ जन्मे थे। वह दानवीर के नाम से विख्यात हैं। कर्ण के गुरु भी परशुराम थे। हालांकि कर्ण ने छल से परशुराम से धनुर्विद्या सिखी थी। यही कारण था कि उन्हें गुरु परशुराम ने श्राप दिया था। कहते हैं कि अगर कर्ण के पास उनका कवच और कुंडल होता तो उन्हें कोई भी हरा नहीं सकता था।

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