परमाणु जंग की दहलीज पर खड़ी दुनिया अब कमर कसे भारत

पश्चिम एशिया में जिस तेजी से सामरिक परिदृश्य बदल रहा है, उससे इजरायल, अमेरिका तथा ईरान जंग धीरे-धीरे परमाणु यद्ध की दहलीज पर आ खड़ी हुई है। जंग के 23वें दिन ईरान ने कई इजरायली शहरों पर कलस्टर बमों की झड़ी लगा दी। उसके डिमोना व अराद जैसे परमाणु शोध के सबसे संवेदनशील शहरों को निशाना बनाया। भले इजरायल ईरान को घुटनों पर लाने की धमकियां दे रहा हो, लेकिन सैन्य विशेषज्ञों के मुताबिक सच्चाई यह है कि इजरायल के होश फाख्ता हो गये हैं।

इस वर्ष 28 फरवरी को जिस आक्रामक तरीके से इजरायल और अमेरिका ने मिलकर ईरान पर महज कुछ घंटों के भीतर 50 हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा के बम बरसाये थे और ईरान के टॉप लीडर अयातुल्ला खामनेई सहित 9 शीर्ष राजनेताओं तथा 11 से ज्यादा वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को मार डाला था, उससे दुनिया को यह संदेश देने की कोशिश हुई थी कि ईरान के विरुद्ध अमेरिका और इजरायल चंद घंटों में ही जंग खत्म कर देंगे। लेकिन इस 22 मार्च और 23 मार्च को ईरान ने दोहरी ताकत से पलटवार करके ईंट का जवाब पत्थर से दिया।

अमेरिका अब ईरान से युद्ध-विराम की कोशिश में

हकीकत ये है कि अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी टीम ईरान से युद्ध-विराम करने की फिराक में है। ईरान अमेरिका के हर हमले को पलटकर जवाब दे रहा है और साफ शब्दों में कह दिया कि अगर युद्ध-विराम चाहिए, तो पहले 6 शर्तें माननी होगी। ईरान की ये शर्तें हैं-

  • भविष्य में दोबारा युद्ध नहीं होगा, इसकी गारंटी दें।
  • मध्य पूर्व में अमेरिका के 38 सैन्य ठिकानों को बंद किया जाए।
  • ईरान को इस युद्ध में अब तक हुए सारे नुकसान की मुआवजा देकर भरपाई की जाए।
  • पूरे मध्य पूर्व में चल रहे सभी युद्ध खत्म किए जाएं।
  • होर्मुज स्ट्रेट के नये नियम बनाए जाएं।
  • ईरान के खिलाफ मीडियाकर्मियों पर कार्यवाई की जाए।

इस तरह भले अमेरिका में इजरायल के राजदूत येचिएल लीटर कह रहे हों कि वो ईरान को घुटनों पर लाकर ही दम लेंगे, लेकिन खुली नजरों से इस जंग पर नज़र रखने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि अब तो यह महज इजरायल की गीदड़ भभकी ही लगती है, क्योंकि इजरायली राजदूत की प्रेस कॉन्फ्रेस खत्म होते ही ईरान के राष्ट्रपति मसूद पज़शकियान ने गरजकर कहा कि हम किसी भी हमले का न सिर्फ जवाब देंगे बल्कि अगर ईरान के परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया गया, तो होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह से बंद कर देंगे, जिससे पूरी दुनिया तेल संकट से घिर जाएगी।

ट्रंप और सलाहकारों के बीच सीजफायर पर चर्चा

इजरायल भले ईरान को लेकर लापरवाह बयान और बार-बार मिटा देने की धमकी दे रहा हो, लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके मुख्य सलाहकारों में से दो सलाहकार जेरेड कुशनर और स्टीव विटकॉफ ने ईरान की धमकियों को गंभीरता से लिया। शायद यही कारण है कि एक्सियोज न्यूज के मुताबिक राष्ट्रपति ट्रंप अपने सलाहकारों के साथ इस बात पर गंभीरता से चर्चा कर रहे हैं कि सीजफायर की कोई राह कैसे निकले?

हालांकि उन्होंने ईरान की मुआवजा संबंधी शर्त को न केवल मानने से इंकार कर दिया है बल्कि अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में यह धमकी भी दी है कि अगर 48 घंटों के भीतर ईरान का होर्मुज स्टेट को लेकर रवैया नहीं बदलता तो उसके ऊर्जा ठिकानों पर बमबारी की झड़ी लगा दी जाएगी। इस लेख के लिखने और भारतीय समयानुसार 23 मार्च, सोमवार की देर शाम 48 घंटे की अवधि खत्म होगी। अगर सचमुच ट्रंप पागलपन में उतरे तो सैन्य विशेषज्ञों को शक है कि सीमित प्रभावी परमाणु युद्ध छिड़ सकता है और अगर ऐसा न भी हुआ तो जिस तरह दोनों तरफ से एक-दूसरे पर हमले किए जा रहे हैं, यदि ये भी अगले एक हफ्ते तक जारी रहे, तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पटरी से उतर जाएगी।

इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के प्रमुख फातिह बिरोल ने दुनिया को चेतावनी दी है कि ईरान जंग दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा खतरा बन चुकी है। इस 22 मार्च को कैनबरा में उन्होंने कहा, जंग के हालात बेहद खराब हैं। यह अगर एक सप्ताह तक भी यह जारी रही, तो पूरी दुनिया तेल और गैस संकट में फंस जाएगी। उन्होंने साफ कहा कि हालात ऐसे हो गये हैं कि दुनिया का कोई भी देश इससे बच नहीं पाएगा और पूरी दुनिया की तेल व गैस सप्लायी चेन पूरी तरह से बाधित हो जाएगी।

यूरोप के साथ भारत की भूमिका हो सकती है निर्णायक

सवाल ये है कि धोखे से और कुछ घंटों में निपटा देने के इरादे से ये जंग शुरु हुई थी, जो अब एक खतरनाक मोड़ पर आ पहुंची है, तो क्या इसे थामने, रोकने या धीमा करने का दारोमदार अब केवल उन देशों पर ही रह गया है, जो सीधे-सीधे आमने-सामने हैं? नहीं। अब इस सरलीकरण से बचना होगा। अब दुनिया की कई दूसरी ताकतों को आगे बढ़कर इस खतरनाक हो चली जंग पर दखल देना ही होगा। इसमें यूरोप के साथ बड़ी भूमिका भारत की भी हो सकती है। भारत एकमात्र ऐसी बड़ी राजनीतिक ताकत है, जिसके इस युद्ध में शामिल तीनों पक्षों के साथ अच्छे रिश्ते हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप चाहे जिस भी वजह से कहते हों, लेकिन वह कोई ऐसा एक हफ्ता नहीं गुजरने देते, जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना सबसे अच्छा दोस्त न कहते हों। दूसरी तरफ सच्चाई ये है कि इस जंग से शुरु होने के ठीक दो दिनों पहले प्रधानमंत्री मोदी ने इजरायल की यात्रा की थी। वहाँ के प्रधानमंत्री नेतन्याहू मोदी को अपना दोस्त तथा दुनिया के महत्वपूर्ण राजनेताओं में शुमार करते हैं। ईरान भी भले दुनिया के दूसरे देशों को इतना महत्व न देता हो, लेकिन पिछले 72 घंटों में ईरानी राष्ट्रपति मसूद पज़शकियान ने प्रधानमंत्री मोदी से न सिर्फ दो बार बात की है बल्कि साफ शब्दों में कहा कि ब्रिक्स के अध्यक्ष होने के नाते मोदी इस युद्ध को रुकवाने में अपनी भूमिका निभाएं।

यह भी पढ़ें… इजराइल-अमेरिका-ईरान : जंग पर भारी पड़ रहे हैं ड्रोन !

दुनिया भर में युद्ध को लेकर बढ़ी चिंता और सिहरन

गौरतलब है कि पिछले 72 घंटों में पूरी दुनिया में इस युद्ध को लेकर सिहरन बढ़ गई है। यूरोप से लेकर दक्षिण अफ्रीका तक हर महत्वपूर्ण और बड़े राजनेता के माथे पर परेशानियों की लकीर देखी गई हैं, क्योंकि यह जंग बिना रुके परमाणु युद्ध की दहलीज पर पहुंच गई है। जिस तरह से ईरान ने इजरायल के डिमोना और अराद जैसे शहरों को निशाना बनाया, जिसे वह हमेशा इस जंग से बिल्कुल दूर रखने की कोशिश कर रहा था, उससे इजरायल में हड़कंप मचा गया है।

दूसरी महत्वपूर्ण बात ये है कि ईरान ने जिस तरह हिंद महासागर में स्थित ब्रितानी और अमेरिका के साझे सैन्य ठिकाने डियागोगार्सिया तक मिसाइल हमला किया, उससे साफ है कि अभी तक दुनिया को यही मालूम था कि ईरान के पास 2000 से 2500 किलोमीटर तक मार करने वाली बैलिस्टिक मिसाइलें हैं, लेकिन लगभग 4000 किलोमीटर दूर डियागोगार्सिया पर उसने जिस तरह बैलिस्टिक मिसाइल से हमला किया है, उससे बात साफ हो गई है कि पूरा यूरोप उसके निशाने की जद में है।

-लोकमित्र गौतम
-लोकमित्र गौतम

इसलिए अब भारत जैसे देश को कूटनीतिक कमर कसकर आगे आना ही होगा, ताकि दुनिया युद्ध की आग में राख़ होने से बच सके। भारत पूर्व की गुटनिरपेक्ष ताकत होने के कारण न सिर्फ अपना असर रखता है बल्कि बड़े उपभोक्ता बाजार होने के कारण दुनिया की हर आर्थिक शक्ति उसके बाजार में कारोबार करने के लिए लालायित है। भारत को अपनी इस हैसियत का फायदा उठाना चाहिए और प्रधानमंत्री मोदी को बढ़कर सचमुच युद्ध रुकवाने का श्रेय लेना चाहिए।

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