विजया एकादशी है आत्म विजय का पर्व

हिंदू पंचांग में एकादशी तिथि का विशेष महत्व होता है। वर्ष में कुल 24 एकादशियों में से विजया एकादशी को अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है। यह फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में पड़ती है और विशेष रूप से विजय, सफलता तथा बाधाओं से मुक्ति की कामना के साथ जुड़ी मानी जाती है। धार्मिक दृष्टि से यह दिन भगवान विष्णु की उपासना को समर्पित होता है, जबकि सांस्कृतिक स्तर पर यह सकारात्मक परिवर्तन का प्रतीक मानी जाती है।

मान्यता यह है कि यह व्रत करने से पूर्व जन्मों के संचित दोष भी समाप्त हो जाते हैं और पुण्य की प्राप्ति होती है। विष्णु भक्तों का विश्वास है कि इस दिन श्रद्धा से की गई पूजा सीधे नारायण तक पहुंचती है और साधक को आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करती है। धार्मिक दृष्टि से यह कहा जाता है कि व्यक्ति विजया एकादशी को उपवास करता है, तो उसका शरीर ही नहीं मन और विचार भी शुद्ध होते हैं, यही शुद्धता उसे निर्णय लेने की क्षमता देती है।

आत्म-शुद्धि और आध्यात्मिक जागरण का संदेश

विजया एकादशी का मूल उद्देश्य बाहरी युद्धों से अधिक आंतरिक युद्धों में विजय प्राप्त करना है। मानव जीवन में काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसे विकार सबसे बड़े शत्रु माने गये हैं। विजया एकादशी इन पर नियंत्रण स्थापित करने की प्रेरणा देती है। इस प्रकार यह व्रत तन के साथ आत्म-शुद्धि की प्रक्रिया का भी हिस्सा बन जाता है। भारतीय संस्कृति में पर्व सामाजिक और नैतिक मूल्यों को भी प्रतिष्ठित करते हैं। विजया एकादशी इसी परंपरा का हिस्सा है।

ग्रामीण क्षेत्रों में यह एकादशी सामूहिक रूप से मनायी जाती है। लोग मंदिरों में एकत्र होकर भजन-कीर्तन करते हैं और कथा सुनते हैं। सांस्कृतिक रूप से इस दिन किसी भी तरह के काम की शुरुआत के लिए शुभ माना जाता है। इस दिन लोग बुरी आदतों को छोड़ने का संकल्प लेते हैं तथा परिवार में शांति और सौहार्द की कामना करते हैं। कई जगहों पर इस दिन दान-पुण्य की विशेष परंपरा है। गरीबों को भोजन, वस्त्र या अनाज दिया जाता है, जिससे करुणा और सेवा की भावना विकसित होती है।

व्रत और परायण विधि

विजया एकादशी की सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजाघर में भगवान विष्णु की पूजा करें। तुलसी दल, फल, फूल, धूप और दीप अर्पित करें। निर्जला व्रत या फलाहारी व्रत करें। इस दिन विष्णु सहस्त्रनाम या एकादशी की कथा का पाठ करें। रात्रि जागरण और भजन करें तथा अगले दिन व्रत का पारण करें। आज के संदर्भ में विजया एकादशी का बहुत महत्व है, क्योंकि आज इंसान अब तक के इतिहास में सबसे ज्यादा तनावग्रस्त तथा प्रतिस्पर्धा और अस्थिरता से घिरा है। ऐसे में यह एकादशी का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है।

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यह पर्व हमें याद दिलाता है कि सफलता केवल बाहरी साधनों से नहीं मिलती। वास्तव में मानसिक दृढ़ता सफलता पाने का सबसे बड़ा हथियार है। इसके अलावा अनुशासन और संयम से भी हम अपने जीवन को बदल सकते हैं। विजया एकादशी केवल व्रत की तिथि नहीं है, बल्कि आत्मविजय का पर्व है। यह हमें सिखाती है कि जीवन की सबसे बड़ी जीत दूसरों पर नहीं बल्कि खुद पर हासिल की जाती है। जब मनुष्य अपने भीतर की कमजोरियों पर विजय पा लेता है, तो बाहरी चुनौतियां उसके लिए स्वतः ही छोटी हो जाती हैं।

आर.सी.शर्मा

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