हमारा सच्चा स्वरूप क्या है ?

प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में ऐसा समय आता है, जब वह महसूस करता है कि उसका यह शरीर एक दिन नष्ट हो जाएगा और उसके संगी-साथियों के शरीर भी एक दिन मृत्यु को प्राप्त हो जाएँगे। इससे बचने का कोई रास्ता नहीं है। हमें चाहिए कि हम अपने ध्यान को शरीर की नश्वरता से हटाएँ, अपने सच्चे आत्मिक स्वरूप को जानें और सदा-सदा की अमरता को खोजने का प्रयास करें।

हममें से अधिकतर लोग इस वास्तविकता को मानना नहीं चाहते कि हम शारीरिक स्तर पर नश्वर हैं। केवल वही लोग जो मृत्यु की अनिवार्यता का अनुभव करते हैं, वे इस दुःख से उबरने के लिए अपने ध्यान को कोई दूसरा मार्ग खोजने की ओर लगाते हैं। वे स्वयं को शरीर न मानकर आत्मा के रूप में पहचानना शुरू कर देते हैं।

संत और महापुरुष हमारे अस्तित्व की वास्तविकता के प्रति जागृत होते हैं। वे जानते हैं कि हम सभी आत्माएँ हैं, जो एक ही परम-आत्मा के पास से आई हैं। वे जानते हैं कि जब हम स्वयं को आत्मा के रूप में पहचान लेते हैं, तब हमें एक सच्चा अंतरिक्षयान मिल जाता है, जिसकी मदद से हम इस भौतिक जगत के गुरुत्वाकर्षण से ऊपर उठ सकते हैं।

ध्यान से आत्मा की पहचान : भौतिक बंधनों से मुक्ति का मार्ग

हमारी आत्मा भौतिक पदार्थ से नहीं बनी है, यह आत्म-तत्व से बनी है। आत्मा अकेले ही इस भौतिक जगत से परे के रूहानी मंडलों में उड़ान भर सकती है। आत्मा नश्वर नहीं है। यह प्रभु के सार से बनी हुई है तथा अमर है। अगर हम स्वयं को आत्मा के रूप में जान जाएँ, तब हम स्वयं को भौतिक अस्तित्व की ज़ंजीरों में बंधा हुआ नहीं पाएँगे।

हमारे शरीर के लिए इस जीवन के बंधन से बचने का कोई उपाय नहीं है, परंतु हमारी आत्मा के लिए अवश्य है। हम कैसे स्वयं को आत्मा के रूप में अनुभव कर सकते हैं? ध्यान-अभ्यास वह मार्ग है, जिसके द्वारा हम आत्मा पर पड़े शारीरिक आवरण को उतार सकते हैं। जिस प्रकार हम अपने शरीर पर पहना हुआ कोट, स्वेटर या शर्ट उतार सकते हैं, उसी प्रकार हम अपनी आत्मा को ढकने वाले भौतिक शरीर की परत को भी उतार सकते हैं।

ध्यान-अभ्यास हमारे शरीर के बाहरी आवरण को उतारकर हमारे सच्चे स्वरूप यानी आत्मा को उजागर कर देता है। तब हम यह अनुभव कर सकते हैं कि हम वास्तव में शरीर नहीं बल्कि आत्मा हैं, जो केवल थोड़े समय के लिए इस शरीर में निवास करने के लिए आई है। प्रभु यही चाहते हैं कि उनके सभी बच्चे उनमें आकर लीन हो जाएँ।

संत राजिन्दर सिंह महाराज

जहाँ सारा सांसारिक व बौद्धिक ज्ञान ख़त्म हो जाता है, वहीं से आत्मिक ज्ञान आरंभ होता है। सारे आध्यात्मिक ख़ज़ाने हमारे भीतर ही हैं। अपने सच्चे स्वरूप की खोज अगर हम बाहरी संसार में करेंगे, तो हमें निराशा ही हाथ लगेगी। इस भ्रम को हटाने का और अपने सच्चे स्वरूप को जानने का केवल एक ही तरीका है कि हम अपने अंतर में ध्यान टिकाएँ और स्वयं यह अनुभव करें कि हम आत्मा हैं और परमात्मा का अंश हैं।

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