भारत की रेबीज वैक्सीन का विदेशों में क्यों हो रहा है विरोध?

आईआईएल के उपाध्यक्ष और गुणवत्ता प्रबंधन के प्रमुख सुनील तिवारी का कहना है कि भारत में निर्मित वैक्सीन का प्रत्येक बैच नेशनल कंट्रोल लेबोरेटरी (सेंट्रल ड्रग्स लेबोरेटरी) द्वारा टेस्ट व जारी किया जाता है, जोकि राष्ट्रीय नियामक प्राधिकरण के तहत डब्लूएचओ- जिनेवा प्री-क्वालिफाइड लेबोरेटरी है। यहां महत्वपूर्ण सवाल यह है कि किस प्रोटोकॉल का पालन किया जाये? अगर रोगी को संदेह है कि उसे नकली वैक्सीन लगी है, तो बुनियादी प्रोटोकॉल यह है कि वह योग्य डॉक्टर से सलाह ले कि क्या उसे सत्यापित, प्रामाणिक वैक्सीन की रिप्लेसमेंट खुराक लेने की आवश्यकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि दोबारा रेबीज वैक्सीन लेने की अनुमति है और वह सुरक्षित भी है। रेबीज वैक्सीन निष्क्रिय वैक्सीन होती है यानी उसमें जीवित वायरस नहीं होता है। इसलिए ज़रूरत पड़ने पर उसे बार-बार दिया जाना भी सुरक्षित है।

ग्रेटर नोएडा में कुछ दिन पहले एक आवारा कुत्ते ने एक गाय को काटा, जिसके बाद उसे रेबीज हो गया। एहतियात के तौरपर उस गौशाला से दूध लेने वाले अधिकतर लोगों ने रेबीज-रोधी टीके लगवा लिए। उसी दौरान वहां एक महिला की मौत हो गई। उसमें रेबीज के लक्षण दिखायी दे रहे थे। लोगों का कहना है कि पांमित गाय का दूध पीने से महिला को रेबीज का संक्रमण हुआ था। उसने लापरवाही में वैक्सीन नहीं लगवायी थी। क्या पांमित गाय या भैंस का दूध पीने से रेबीज हो सकता है? आईसीएआर की एक रिपोर्ट कहती है कि रेबीज से पांमित गाय या भैंस के दूध में रेबीज वायरस होता है।

अगर ऐसा दूध बिना उबाले पीया जाये तो खतरा है और ऐसा दूध पीने वाले को खतरे के आधार पर श्रेणी 1 में रखा गया है। इस श्रेणी में पांमित जानवर द्वारा मुंह, नाक, गुदा, जननांग व कंनंक्टिवा जैसे इंटैक्ट म्यूकस मेम्ब्रेन को चाटना और बिना खून निकले काटना भी शामिल है। गौरतलब है कि एक बार लक्षण दिखने के बाद रेबीज का कोई इलाज नहीं है। मौत निश्चित है। इसलिए इससे बचाव करना ही बेहतर है।

पालतू और आवारा जानवरों से रेबीज से बचाव के उपाय

अगर आपको कोई जानवर काट ले तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लें। रेबीज का टीका लगवाएं। घाव को साबुन और पानी से अच्छी तरह धोएं। पालतू जानवरों को रेबीज का टीका लगवाएं। आवारा जानवरों से दूर रहें। लेकिन चिंताजनक समस्या यह है कि इंसानों को लगायी जाने वाली एंटी-रेबीज वैक्सीन नकली आ रही हैं(?)।

ऑस्ट्रेलिया की टेक्निकल एडवाइजरी ग्रुप ऑन इम्यूनाइजेशन और अमेरिका की सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) ने पिछले साल के अंत में स्वास्थ्य चेतावनी जारी की कि अभयरब (इंसानों को लगायी जाने वाली एंटी-रेबीज वैक्सीन) नकली आ रही है। अभयरब भारत में उपलब्ध है और 1 नवंबर 2023 से सर्कुलेशन में है। यह चेतावनी उस समय आयी जब भारत से यात्रा करने वालों में रेबीज के लक्षण दिखायी देने लगे।

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सीडीसी ने भारत में नकली रेबीज वैक्सीन की चेतावनी दी

सीडीसी ने 25 नवंबर 2025 को अपने ट्रैवेल नोटिस में कहा कि मानवों के लिए एक नकली अभयरब वैक्सीन भारत के मुख्य शहरों में बेची जा रही है और वह न सिर्फ हानिकारक हो सकती है बल्कि रेबीज को रोकने में भी नाकाम रह सकती है।
ऑस्ट्रेलिया ने अपने यात्रियों, जिन्होंने भारत में 1 नवंबर 2023 के बाद अभयरब लगवायी, से कहा कि वह इस टीकाकरण को अमान्य मानें और वैक्सीनेशन का नया कोर्स आरंभ करें।

भारत की प्रमुख वैक्सीन निर्माता कम्पनी इंडियन इम्मुनोलोजिकल्स लिमिटेड (आईआईएल), जो अभयरब बनाती है, ने 27 दिसंबर 2025 को कहा कि अभयरब का एक नकली बैच अब बाज़ार में उपलब्ध नहीं है। आईआईएल के उपाध्यक्ष और गुणवत्ता प्रबंधन के प्रमुख सुनील तिवारी का कहना है कि भारत में निर्मित वैक्सीन का प्रत्येक बैच नेशनल कंट्रोल लेबोरेटरी (सेंट्रल ड्रग्स लेबोरेटरी) द्वारा टेस्ट व जारी किया जाता है, जोकि राष्ट्रीय नियामक प्राधिकरण के तहत डब्लूएचओ- जिनेवा प्री-क्वालिफाइड लेबोरेटरी है।

यहां महत्वपूर्ण सवाल यह है कि किस प्रोटोकॉल का पालन किया जाये? अगर रोगी को संदेह है कि उसे नकली वैक्सीन लगी है, तो बुनियादी प्रोटोकॉल यह है कि वह योग्य डॉक्टर से सलाह ले कि क्या उसे सत्यापित, प्रामाणिक वैक्सीन की रिप्लेसमेंट खुराक लेने की आवश्यकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि दोबारा रेबीज वैक्सीन लेने की अनुमति है और वह सुरक्षित भी है। रेबीज वैक्सीन निष्क्रिय वैक्सीन होती है यानी उसमें जीवित वायरस नहीं होता है। इसलिए ज़रूरत पड़ने पर उसे बार-बार दिया जाना भी सुरक्षित है।

कमजोर इम्युनिटी वाले व्यक्तियों को भी दोहराई खुराक

स्वास्थ्य संस्थाएं वैक्सीन की संदिग्ध प्रभाविकता या एक्सपोज़र की स्थिति में पुनटीकाकरण की अनुमति देती हैं। एक्सपोज़र काटने के संदर्भ में हो या संदेह की सूरत में, एक्सपोज़र के बाद की सम्पूर्ण रोगनिरोधक श्रृंखला दी जाती है। कहने का अर्थ यह है कि जब भी वैक्सीन की गुणवत्ता, प्रामाणिकता या समय-सारणी का प्रश्न उठता है तो पुनटीकाकरण का सुझाव दिया जाता है। जिन मामलों में वैक्सीन की प्रामाणिकता, अनुचित खुराक, शीत श्रृंखला का अभाव या रिकार्ड्स का अभाव होता है तो भी पुनटीकाकरण का सुझाव दिया जाता है।

डॉक्टरों का यह भी कहना है कि जिस व्यक्ति का टीकाकरण हो चुका है और उसे अपनी इम्युनिटी स्टेट्स पर शक है, तो उसे भी खुराक दोहराने का सुझाव दिया जाता है। जिस व्यक्ति के शरीर की प्रतिरोधात्मक क्षमता कमज़ोर होती है, उसे भी पुनटीकाकरण की आवश्यकता पड़ सकती है। दरअसल, रेबीज जीवन पर विराम लगाने वाला रोग है, इसलिए इम्युनिटी सुनिश्चित करने से संबंधित कोई भी प्रश्न पुनटीकाकरण को लाज़मी बना देता है।

बिना वैध टीकाकरण के व्यक्ति के बारे में यह माना जाता है कि पहले उसका टीकाकरण हुआ ही नहीं और उसे पूरे कार्यक्रम का पालन करना होता है, यानी उसे 0, 3, 7, 14 व 28 दिनों में वैक्सीन लेनी होती है। गंभीर एक्सपोज़र की स्थिति में रेबीज इम्मुनोग्लोब्युलिन दी जाती है। लेकिन अगर व्यक्ति का पहले टीकाकरण हो चुका है और उसके विश्वसनीय प्रमाण मौजूद हैं, तो फिर सिर्फ बूस्टर खुराक की ही ज़रूरत पड़ती है।

डब्लूएचओ और ग्लोबल पार्टनर्स वन हेल्थ दृष्टिकोण अपनाए

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के अनुसार भारत रेबीज के लिए स्थानिक है। संसार में रेबीज के कारण जो कुल मौतें होती हैं, उनमें से अकेले 36 प्रतिशत भारत में होती हैं। भारत पर रेबीज का वास्तविक बोझ पूरी तरह से ज्ञात नहीं है, लेकिन उपलब्ध जानकारी के अनुसार अपने देश में 18,000-20,000 मौतें सालाना रेबीज की वजह से होती हैं। भारत में रेबीज के केस व मौतें जो रिपोर्ट होती हैं, उनमें से 30-60 प्रतिशत का संबंध 15 वर्ष से कम के बच्चों से है; क्योंकि बच्चों में कुत्ते के काटने को अकसर अनदेखा कर दिया जाता है, रिपोर्ट नहीं किया जाता।

ध्यान रहे कि अगर तुरंत व उचित मेडिकल केयर मिले तो रेबीज मौत से हर व्यक्ति को बचाया जा सकता है, शत-प्रतिशत। लोगों को रेबीज से सुरक्षित रखने का सबसे सस्ता व अच्छा तरीका यह है कि कुत्तों का वैक्सीनेशन कर दिया जाये। भारत का लक्ष्य है कि कुत्तों से होने वाली रेबीज पर 2030 तक विराम लगा दिया जाये और इसके लिए नेशनल रेबीज कंट्रोल प्रोग्राम व संयुक्त नेशनल प्लान फॉर रेबीज एलिमिनेशन लागू किये गये हैं।

नरेंद्र शर्मा
नरेंद्र शर्मा

कुत्तों के काटने पर होने वाली रेबीज मौतों पर विराम लगाने के लिए डब्लूएचओ और उसके ग्लोबल पार्टनर्स ने विस्तृत वन हेल्थ दृष्टिकोण अपनाया है, जिसके तहत बड़े पैमाने पर कुत्तों के वैक्सीनेशन को प्रोत्साहित किया जा रहा है, पीईपी एक्सेस सुनिश्चित किया जा रहा है, हेल्थ वर्कर्स को ट्रेनिंग दी जा रही है, निगरानी को बेहतर किया जा रहा है और सामुदायिक जागृति के ज़रिये काटने को रोका जा रहा है।

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