जबलपुर का क्रूज हादसा क्या हमारी आत्मा को झकझोर पायेगा…?

मौसम विभाग ने 30 अप्रैल 2026 के लिए तेज आंधी और बारिश की चेतावनी जारी की थी, बावजूद इसके जबलपुर के बरगी डैम पर मध्य प्रदेश पर्यटन निगम के कर्मचारियों ने डैम पर सैलानियों को क्रूज पर घूमने की इजाजत दे दी और इजाजत भी ऐसी कि कुल 28 पर्यटकों की टिकट काटी गई, जबकि क्रूज में 43 सैलानी सवार थे। यह साधारण लापरवाही नहीं बल्कि हर किस्म के कायदे-कानून और चेतावनियों को ताख पर रखने की पराकाष्ठा है।

क्योंकि सिर्फ इतना ही नहीं हुआ था बल्कि ध्यान से देखें तो लगता है हादसे को मानो जानबूझकर आमंत्रित किया गया था। एक तरफ जहां मौसम विभाग की चेतावनी थी, वहीं सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा बांध में डीजल चालित क्रूज चलाने को बेन कर रखा था। इसके बावजूद न केवल धड़ल्ले से डीजल चालित क्रूज चल रहा था। साथ ही पर्यटकों की सुरक्षा के लिए क्रूज में जिन लाइफ बेल्ट की व्यवस्था थी, वो सब क्रूज के अंदर मौजूद एक कैबिन में सीलबंद पड़ी थीं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि 30 अप्रैल 2026 की देर शाम जबलपुर के बरगी डैम पर जो हृदयविदारक हादसा हुआ, उसे किस तरह अपनी लापरवाहियों से होने दिया गया था।

अब मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग हादसे के लिए आंधी को जिम्मेदार ठहरा रहा है। लेकिन जिस तरह यह हादसा हुआ उसके लिए आंधी नहीं बल्कि अंधा-बहरा सिस्टम जिम्मेदार था। इसके चलते इन पंक्तियों के लिखे जाने तक बांध से 9 पर्यटकों के शव निकाले जा चुके थे। जबकि अभी तक 3 बच्चों सहित 4 पर्यटक लापता हैं। जो 28 लोग इस हादसे में बचे हैं, वह भी प्रशासन या डैम पर मौजूद किसी सुरक्षा व्यवस्था के चलते नहीं बल्कि स्थानीय लोगों की जांबाजी के चलते इन्हें बचाया जा सका है।

नर्मदा हादसे ने उजागर की सिस्टम की संवेदनहीनता

नर्मदा की लहरों ने बृहस्पतिवार (30 अप्रैल 2026) की देर शाम सिर्फ एक क्रूज नहीं डूबोया बल्कि हमारी संवेदनाओं की सतह भी उजागर कर दी है। क्रूज संचालन के जिलए जिम्मेदार कर्मचारी अगर जरा भी नियमों का पालन किया होता या किसी भी चेतावनी को जरा भी गंभीरता से लिया होता, तो यह हादसा न होता। क्योंकि एक तो शाम को पांच बजे जिस समय बांध में क्रूज से पर्यटकों को घूमने की इजाजत दी गई, उस समय भी तकरीबन 30 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से हवाएं चल रही थीं, जो धीरे-धीरे बढ़कर 60-70 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार तक पहुंच गईं।

यह इतनी तेज हवा या आंधी है कि साधारण क्रूज ड्राइवर ऐसी हालत में क्रूज को क्या संभाल पाता, जब हादसे के रेस्क्यू के लिए आयी एनडीआरएफ की टीम भी अगले कई घंटों तक ऑपरेशन नहीं शुरू कर सकी। यहां कि पावार यानी 1 मई 2026 को भी यह समस्या आड़े आयी और फिर एक बार रेस्क्यू ऑपरेशन रोका गया। ऐसे में इस हादसे के कई घंटे तक हर तरफ सिर्फ चीख-पुकारें सुनायी पड़ती रहीं। लेकिन सवाल है क्या यह हृदयविदारक घटना हमें भविष्य की ऐसी घटनाओं के लिए झकझोरेगी?

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नियमों की अनदेखी पर उठे गंभीर सवाल

क्या इससे शासन-प्रशासन सबक लेगा कि अगर नियम-कायदे बनाए जाते हैं, तो उनका पालन भी करना होता है? क्योंकि इनके बनाये जाने के पीछे कोई वजह होती है। लगता नहीं कि इतना बड़ा हादसा भी भारत के सरकारी शासन-प्रशासन तंत्र की आंखें खोल पायेगा या उन्हें झकझोर सकेगा। अगर हादसे, हिंदुस्तानियों की आत्माओं को झकझोरते होते तो 2024 में इससे बड़ा हादसा मुंबई में हुआ था।

जब एक फेरी की टक्कर नौसेना की नाव से हो गई थी और देखते ही देखते 15 लोग समुद्र के पेट में समा गये थे, तब जांच से पता चला था कि फेरी मानक क्षमता से कहीं ज्यादा सवारियों को बैठाये हुए थी यानी ओवर लोडिंग के चलते वह हादसा हुआ था और तत्कालीन प्रशासन ने तब ज्यादा कड़े नियम बनाने की बात की थी। लेकिन आज भी लोग जानते हैं कि किस तरह गेटवे ऑफ इंडिया से एलिफेंटा केव के लिए चलने वाली ज्यादातर फेरी प्रशासन द्वारा नियम-कायदों की हर तरह से धज्जियां उड़ाती हैं।

अभी कुछ साल पहले 2023 में केरल के तनूर में भी एक ऐसा ही बोट हादसा हुआ था, जिसमें 22 लोगों की मौत हुई थी। तब भी जांच में यही पाया गया था कि नाव में क्षमता से ज्यादा सैलानी सवार थे। जब इस हादसे की जांच हुई तो पाया गया कि उस नाव के पास फिटनेस का सर्टिफिकेट नहीं था। यही नहीं बड़ी बात यह भी थी कि इतने सैलानियों को घुमाने ले जाने वाले नाव में लाइफ जैकेट नहीं थे।

कमाई के आगे सुरक्षा को किया गया नजरअंदाज

कुल मिलाकर कहानी में कमाई किसी भी तरीके से कर ली जाए, सुरक्षा जाए भाड़ में, यही दिख रहा था। अगर घटनाएं गिनायी जाएं तो पिछले दो साल में ही कम से कम एक दर्जन ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिनमें एक से पांच सवारियों की इसी तरह के बोट हादसों में मौत हुई है। लेकिन घटनाओं का सिलसिला किसी भी तरह से हमें जगाने में नाकामयाब रहा है।देशभर में हर साल ऐसे दर्जनों हादसे भले अलग-अलग जगह होते हों, लेकिन उन सबकी कहानी एक है।

चाहे जबलपुर हो, चाहे मुंबई हो, चाहे तनूर। हर जगह हमारी लापरवाही भारी पड़ी है। जबलपुर में हुए बरगी डैम हादसे में किस कदर लापरवाही बरती गई है इसे जानकर तो रोंगटे खड़ हो जाते हैं। जैसा कि ऊपर जिक्र किया जा चुका है कि डैम में डीजल से चलने वाले क्रूज की मनाही थी, इसके बावजूद यह न सिर्फ चल रहा था बल्कि हर रोज 6 फेरे भी लगाता था। लेकिन यह सिर्फ एक अदालती और ट्रिब्यूनल के आदेश की अनदेखी भर का मामला ही नहीं था।

मौसम विभाग ने भी 30 अप्रैल 2026 की शाम के लिए आंधी की चेतावनी दे रखी थी और जिस समय क्रूज सैलानियों को लेकर रवाना हुआ, उस समय भी 30-35 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से हवाएं चल रही थी, जो कि देखते ही देखते 70-74 किलोमीटर प्रतिघंटा तक चलने लगीं। हादसे में बचे हुए यात्रियों का कहना है कि आंधी तेज होते ही क्रूज डगमगाने लगा था और लहरें क्रूज के अंदर आने लगी थीं। बावजूद इसके ड्राइवर ने क्रूज को किनारे नहीं लगाया जबकि कुछ पर्यटक उसे ऐसा करने के लिए कह रहे थे।

मुनाफे के लिए सुरक्षा से समझौते के आरोप

कहीं ड्राइवर और क्रूज के दूसरे कर्मचारियों को यह तो नहीं लग रहा था कि किनारे कर लेने पर कहीं सैलानियों के टिकट के पैसे न वापस करने पड़ें या फिर ड्राइवर और क्रूज कर्मचारियों को ये लग रहा होगा कि वो किसी भी विकाराल स्थिति हो, क्रूज को डूबने नहीं देंगे। एक के बाद एक लापरवाहियों का सिलसिला किस कदर अमानवीय था कि अब उनका जिक्र भी एक तरह से गुस्सा ही दिलाता है।

आमतौर पर क्रूज में ऐसे समय जब मौसम खराब हो यात्रियों को भी अनुशासित होकर बैठने की अनुमति होती है। लेकिन कुछ वीडियो दिख रहे हैं, जिनमें किस कदर आंधी और विकाराल हो रही लहरों के बीच कुछ लोग तेज आवाज वाला म्यूजिक बजा रहे थे और डांस कर रहे थे। कोई यह सुनने या देखने के लिए तैयार नहीं था कि किस कदर मौसम लगातार भयावह होता जा रहा है।

विजय कपूर
विजय कपूर

यही नहीं, हद तो यह है कि तब तक किसी भी सैलानी ने लाइफ जैकेट नहीं पहन रखी थी। इसलिए यह एक कर्मचारियों की ही गैरजिम्मेदारी का सबब नहीं है बल्कि उन सैलानियों की भी घोर लापरवाही का नतीजा है, जो आंख-कान मूंदकर भी सिर्फ मौज मस्ती में डूबे थे। हर ऐसी जगह पर जहां नाव या क्रूज पर पर्यटकों को घुमाने की व्यवस्था होती है, वहां नियम यह भी है कि नाव या फेरी पर घूमने जाने वाले यात्रियों को एक बार इस दौरान किस तरह का व्यवहार करना है, किन उदंडताओं से बचना है, इसकी बकायदा निर्देश दिए जाते हैं। लेकिन जब यहां खुद पर्यटन विभाग के कर्मचारी हर तरह के नियम-कानूनों की धज्जियां उड़ा रहे थे, तो भला सैलानी क्यों पीछे रहते?

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