वायु प्रदूषण : हर सांस के साथ बढ़ रहा है खतरा

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और आईआईटी की एक ताज़ा रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि हमारे देश में पिछले 38 वर्षों में शुद्ध हवा में सांस लेना मुश्किल ही नहीं खतरनाक स्तर तक पहुँच गया है। शुद्ध हवा में सांस लेना अब बीते जमाने की बात हो चुकी है। रिपोर्ट में अध्ययनकर्ताओं ने माना है 1990 के दशक में लोग साल में केवल 15 प्रतिशत प्रदूषण की मार झेलते थे और आज यह आंकड़ा बढ़कर 35 प्रतिशत तक पहुँच गया है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि हमने अपनी इस स्थिति में सुधार नहीं किया तो गंभीर परिणाम झेलने होंगे।
वायु प्रदूषण आज एक वैश्विक चुनौती बन चुका है। यह मानव के साथ-साथ पशु-पक्षी और पौधों तक के स्वास्थ्य को गंभीर रूप से आहत कर रहा है। प्रदूषण हमारे पर्यावरण के लिए एक गंभीर खतरा है, जो कि जल, वायु और भूमि को प्रभावित करता है। पर्यावरण हमारे जीवन का आधार है। वायु, जल, भूमि, पेड़-पौधे और जीव-जंतु सब मिलकर पर्यावरण का निर्माण करते हैं। जब इन प्राकृतिक तत्त्वों का संतुलन बिगड़ता है, तो उसे पर्यावरण प्रदूषण कहा जाता है। आज के समय में प्रदूषण एक गंभीर समस्या बन चुका है।
वायु प्रदूषण बना दुनिया का बड़ा स्वास्थ्य खतरा
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक वायु प्रदूषण दुनिया के सबसे बड़े हेल्थ रिस्क में से एक है। इसकी वजह से हर साल दुनिया में करीब 67 लाख लोग समय से पहले मौत का शिकार होते हैं। हमारे देश भारत की बात करें तो वायु प्रदूषण की समस्या अत्यधिक गंभीर हो गई है। शहरों में वायु की गुणवत्ता बहुत खराब या गंभीर है। एक्यूआई यानि एयर क्वालिटी इंडेक्स हवा की क्वालिटी को बताने वाला एक स्कोर है, जो यह समझने में मदद करता है कि हमारे आसपास की हवा साफ है या प्रदूषित।
एक्यूआई में हवा में मौजूद प्रदूषकों का स्तर मापा जाता है। एक्यूआई जितना बढ़ता है, हवा उतनी ही ज्यादा खतरनाक मानी जाती है। वर्तमान में देश की राजधानी दिल्ली सहित बहुत से शहर दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों के रूप में सबसे पहले स्थान पर हैं, जहाँ पीएम 2.5 का स्तर अत्यधिक ऊंचा है और जो प्रमुख स्वास्थ्य संबंधी मामलो में योगदान देता है। एक्यूआई एयर की रिपोर्ट के मुताबिक भारत पर्यावरण प्रदूषण के मामले में दुनिया में तीसरे स्थान पर है और विश्व वायु गुणवत्ता रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के 50 सबसे प्रदूषित शहरो में से 42 शहर भारत के हैं।
हर साल दिल्ली में होने वाली मौतों में से करीब 11.5 प्रतिशत प्रदूषण के कारण होती हैं। भारत की लगभग पूरी आबादी ऐसे क्षेत्रों में रहती, जहां वायु गुणवत्ता विश्व स्वास्थ्य संगठन के वायु गुणवत्ता दिशा-निर्देशों से अधिक हैं। भारत में अत्यधिक वायु प्रदूषण के कारण सांस संबंधी बीमारियां, त्वचा रोग जैसी स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ गया है और जीवन प्रत्याशा में भी कमी आई है।
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भारत प्रदूषण में शीर्ष देशों में शामिल
प्रदूषण आज दुनियाभर में चिंता का विषय है। यह केवल भारत के लिए ही नहीं है बल्कि पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय है जो कई तरह के प्रदूषणों से पीड़ित है। वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण और अन्य, लाखों लोगों के जीवन को गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं। भारत दुनिया के सबसे प्रदूषित देशों में दूसरे स्थान पर है। प्रदूषण का स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है और औसतन एक भारतीय की जीवन प्रत्याशा को 5.3 साल तक कम कर देता है।
प्रदूषण का अर्थ है हमारे आस-पास का परिवेश गन्दा होना और प्राकृतिक संतुलन में दोष पैदा होना। प्रदूषण कई प्रकार का होता है जिनमें वायु, जल और ध्वनि-प्रदूषण मुख्य है। पर्यावरण के नष्ट होने और औद्योगीकरण के कारण प्रदूषण की समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया है जिसके फलस्वरूप मानव जीवन दूभर हो गया है। महानगरों में वायु प्रदूषण अधिक फैला है। वहां चौबीसों घंटे कल-कारखानों और वाहनों का विषैला धुआं इस तरह फैल गया है कि स्वस्थ वायु में सांस लेना दूभर हो गया है।

मानव जीवन के लिये पर्यावरण का अनुकूल और संतुलित होना बहुत जरूरी है। पर्यावरण के प्रदूषित होने से हमारे स्वस्थ जीवन में कांटे पैदा हो गए है। विभिन्न असाध्य बीमारियों ने हमें असमय अंधे कुए की ओर धकेल दिया है जिसमें गिरना तो आसान है मगर निकलना भारी मुश्किल। यदि हमने अभी से पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया तो आने वाला मानव जीवन अंधकारमय हो जायेगा।
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