संयम के बिना मनुष्य भव शून्य के समान : भावरत्नाश्रीजी

हैदराबाद, शाहअलीबंडा स्थित ऋषभ आराधना भवन में आयोजित चातुर्मासिक प्रवचन सभा में श्रावक-श्राविकाओं को संबोधित करते हुए साध्वी भावरत्नाश्रीजी म.सा. ने कहा कि जो अनादिकाल से जीव को परेशान कर रहे हैं, उन पर विजय प्राप्त करने की साधना है जिनशासन। संयम के बिना मनुष्य भव शून्य के समान है। मन और इंद्रियों की प्रवफत्तियों को रोकने को संयम कहते हैं। मनोवफत्तियों पर, हृदय में उत्पन्न होने वाली कामनाओं पर और इंद्रियों पर अंकुश रखना संयम है।

म.सा. ने आगे कहा कि पाँच इंद्रियों व मन को विषय वासनाओं में फंसने से रोकना इंद्रीय संयम कहलाता है। हमारी इंद्रियां और मन चंचल घोड़े के समान है। ये प्रकाश की गति से भी तेज दौड़ते हैं। इन पर यदि संयम रूपी लगाम का बंधन न हो तो हमें नरक रूपी गड्ढे में गिरने से कोई नहीं बचा सकता। इंद्रियों के अधीन रहने वाला इंद्रियों का दास बनकर इधर-उधर भटकता रहता है। जिस दिन आत्मा में संयम धर्म जागफत हो जाता है तो अपने हृदय की विषय वासनाएं अपने आप शांत हो जाती हैं। बड़े-बड़े पावर्ती सम्राटों ने अपनी अपार संपदाओं को छोड़कर अपनी आत्मा में रमण करने की अभिलाषा के लिए संयम को धारण किया था, क्योंकि संयम के बिना आत्म ध्यान में स्थिरता नहीं आती है। म.सा. ने कहा कि मानव को चाहिए कि वह अपने जीवन को सही दिशा में ले जाए। संयमी व्यक्ति हर जगह पूज्य होता है। संयमी से तो देवता भी प्रसन्न होते हैं। संयमी व्यक्ति जीवन में कभी दुखी नहीं होता।

म.सा. ने कहा कि जैन धर्म में तप को अत्यधिक महत्व दिया गया है। जैन धर्म तप प्रधान है। तप का महत्व शरीर और आत्मा दोनों के लिए है। तप के साथ संयम हो तो वही वास्तविक तप है और ऐसा तप तपस्वी को दीर्घायु बना देता है। बिना आस्था, श्रद्धा और धर्म अनुरूप अनुशासन के तप से सिद्धि नहीं मिल सकती है। तप के साथ शांति, सहनशीलता और समता का होना भी जरूरी है। तप को मूल रूप से दो भागों में बांटा गया है- बाह्य तप और अभ्यांतर तप। इन दोनों को छ:-छ: भागों में बांटा गया है। स्वाध्याय भी तप है और अभ्यंतर तप के अन्तर्गत आता है। म.सा. ने कहा कि ध्यान चार प्रकार के होते हैं- आर्तध्यान, रौद्रध्यान, धर्मध्यान एवं शुक्ल ध्यान। पहले दो ध्यान संसार के कारण हैं, अर्थात संसार में भटकाने वाले हैं, इसलिए ये छोड़ने योग्य हैं। अंत के दो ध्यान मोक्ष के कारण हैं, अत ग्रहण करने योग्य हैं। आर्तध्यान यानि दुःख में होने वाला या दुःख के कारण होने वाला ध्यान। रौद्रध्यान यानि हिंसा, झूठ, चोरी, व्यभिचार इत्यादि। चित्त की क्रुर अवस्था में किया गया ध्यान रौद्रध्यान है। धर्मध्यान यानि आत्मा की शुद्धि से सम्बंधित संसार की असारता का चिंतन-मनन करने को धर्मध्यान कहते हैं। धर्मध्यान, शुक्लध्यान की भूमिका है और शुक्लध्यान यानि जिस ध्यान द्वारा आत्मा सभी कर्मों से मुक्त हो जाती है। निश्चय ही शुक्लध्यान को उच्चतम ध्यान कहा जाएगा, लेकिन धर्मध्यान के माध्यम से ही वहाँ तक पहुँचा जा सकता है। भावरत्नाजी म.सा. ने प्रवचन सभा में तीन प्रश्न किए, जिनके विजेता रहे- महेन्द्र मुणोत, उज्ज्वल सुराणा और सोनल झाबक।

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