पैलीएटिव केयर की अग्रदूत डॉ. गायत्री पालाट को युद्धवीर पुरस्कार

हैदराबाद, स्वतंत्रता सेनानी एवं हैदराबाद में हिन्दी मिलाप समाचार पत्र के संस्थापक युद्धवीरजी की स्मृति में स्थापित युद्धवीर फाउंडेशन ने अपने 33वें स्मारक पुरस्कार के लिए भारत में पैलीएटिव केयर की अग्रदूत डॉ. गायत्री पालाट के नाम की घोषणा की है। उन्हें यह पुरस्कार पैलीएटिव केयर के क्षेत्र में उनके विशिष्ट योगदान और मानवीय पीड़ा को कम करने के प्रति उनकी असाधारण प्रतिबद्धता के सम्मान स्वरूप प्रदान किया जा रहा है।
तेलंगाना के राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ला गुरुवार, 30 अप्रैल को शाम 4:30 बजे एफटीसीसीआई के रेड हिल्स, हैदराबाद स्थित केएलएन प्रसाद ऑडिटोरियम में आयोजित समारोह में डॉ. गायत्री पालाट को युद्धवीर स्मारक पुरस्कार प्रदान करेंगे। इस पुरस्कार में प्रशस्ति पत्र और एक लाख रुपये की नकद राशि शामिल है। युद्धवीर फाउंडेशन की चेयरपर्सन एवं सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी अरुणा बहुगुणा ने उपरोक्त जानकारी देते हुए कहा कि युद्धवीरजी प्रसिद्ध पत्रकार, समर्पित समाजसेवी, प्रकृति-प्रेमी और पारिवारिक व्यक्ति थे।
हालांकि, जिस भूमिका के लिए वे सबसे अधिक याद किए जाते हैं, वह एक उत्साही स्वतंत्रता सेनानी की है। उनके जीवन और कार्यों की स्मृति में 10 अप्रैल 1991 को युद्धवीर फाउंडेशन की स्थापना की गई। फाउंडेशन का मुख्य उद्देश्य उनके उच्च आदर्शों का प्रसार करना और उन व्यक्तियों को सम्मानित करना है, जो राष्ट्रीय एकता, सामाज सेवा, संस्कृति, साहित्य और मानव प्रयास के विभिन्न क्षेत्रों में योगदान देते हैं। आमिर अली खान, तरुण कुमार झँवर, नितिन बजाज फाउंडेशन के ट्रस्टी और विपमा वीर सचिव हैं।
इस वर्ष के पुरस्कार के लिए चयनित डॉ. गायत्री पालाट का जन्म केरल में हुआ और उनका पालन-पोषण भारत के विभिन्न भागों में एक सशस्त्र बल परिवार में हुआ। उन्होंने समानता, गरिमा और करुणा जैसे मूल्यों के साथ परवरिश पाई, जो आज भी उनके जीवन और कार्य को परिभाषित करते हैं। डॉ. पालाट ने भारत से एनेस्थीसियोलॉजी में डिप्लोमा और डिप्लोमेट ऑफ नेशनल बोर्ड प्राप्त किया है।
अंतरराष्ट्रीय पालीएटिव केयर लीडरशिप में डिप्लोमा प्राप्त
डॉ. पालाट ने यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्नियाँ सैन डिएगो से इंटरनेशनल पैलीएटिव केयर लीडरशिप में डिप्लोमा प्राप्त किया है। उन्होंने अमृता इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, कोच्चि में पैलीएटिव मेडिसिन विभाग और देश के पहले पैलीएटिव मेडिसिन डिप्लोमा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वह 2006 में हैदराबाद आईं तथा मेहंदी नवाज जंग ऑकोलॉजी संस्थान और प्रांतीय कैंसर केंद्र में दर्द एवं पैलीएटिव मेडिसिन विभाग में प्रोफेसर के रूप में कार्यभार संभाला।
यहाँ पैलीएटिव मेडिसिन विभाग की स्थापना और राज्य स्वास्थ्य नीति में पैलीएटिव केयर को शामिल कराने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। डॉ. पालाट ने 2019 में नीलोफर अस्पताल में बच्चों के लिए पैलीएटिव केयर विभाग की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और 2017 से 2022 के बीच तेलंगाना के सभी 33 जिलों में पैलीएटिव केयर विभाग स्थापित करने में योगदान दिया। उनका योगदान संस्थागत सेवाओं से कहीं अधिक विस्तृत है।
हैदराबाद की पहली और सबसे बड़ी सामुदायिक पैलीएटिव केयर संस्था पेन रिलीफ एंडपैलीएटिव केयर सोसाइटी (पीआरपीसीएस) की संस्थापक सदस्य के रूप में उन्होंने करुणामय सेवाओं का एक व्यापक नेटवर्क स्थापित करने में समर्पित रूप से कार्य किया। उन्होंने नीतिगत सुधारों और सेवाओं की उपलब्धता को आकार देने में विशेष रूप से तेलंगाना में ओपिओइड नियामक सुधार के समर्थन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
बच्चों के लिए पोस्ट-डॉक्टोरल फेलोशिप की सुविधा
साथ ही मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा एमएनजेआईओआरसीसी के तीन वर्षीय एमडी और डीएनबी पैलीएटिव मेडिसिन कार्यक्रमों की मान्यता दिलाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह संस्थान बच्चों के लिए पैलीएटिव केयर में पोस्ट-डॉक्टोरल फेलोशिप भी प्रदान करता है। डॉ. गायत्री पालाट कनाडा के टू र्वल्ड्स कैंसर कोलैबोरेशन के साथ पैक्स एशिया प्रोग्राम की निदेशक हैं।
वह नेशनल कैंसर ग्रिड और भारत के राष्ट्रीय पैलीएटिव केयर कार्यक्रम की सलाहकार तथा इंटरनेशनल चिल्ड्रन्स पैलीएटिव केयर नेटवर्क के बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज़ की सदस्य हैं। उन्होंने वैश्विक स्तर पर इंटरनेशनल असोसिएशन फॉर हॉस्पिस एंडपैलीएटिव केयर तथा इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी के साथ कार्य किया है। डॉ. पालाट डब्ल्यूएचओ सहित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दिशा-निर्देशों में योगदान देती हैं और संपादकीय बोर्ड एवं शैक्षणिक मंचों पर सक्रिय भूमिका निभाती हैं, जो विश्वभर में पैलीएटिव केयर की दिशा तय करते हैं।
मानव पीड़ा के अदृश्य आयामों के प्रति डॉ. पालाट की गहरी संवेदनशीलता, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और आध्यात्मिक रूप से उनके कार्य इस बात के लिए प्रेरित करते हैं कि जब उपचार संभव नहीं होता, तब भी देखभाल हमेशा प्रभावशाली होता है।
युद्धवीर फाउंडेशन द्वारा उस्मानिया विश्वविद्यालय में संचार एवं पत्रकारिता के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के सर्वश्रेष्ठ छात्र तथा मुशीराबाद स्थित मदर कृष्णा बाई स्कूल ऑफ नर्सिंग के सर्वश्रेष्ठ छात्र को युद्धवीर स्वर्ण पदक प्रदान किया जाता है।
अनेक हस्तियाँ युद्धवीर अवॉर्ड से गौरवान्वित
युद्धवीर स्मारक पुरस्कार के ग्रहीताओं में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह सहित अनेक विभूतियाँ शामिल हैं। इस अवॉर्ड से बी.पी.आर.विठ्ठल, डॉ. यू.आर. राव, डॉ. सोमा राजू, डॉ. के. अंजी रेड्डी, रामोजी राव, डॉ. जयप्रकाश नारायण, संगीत मार्तंड पंडित जसराज, प्रो. शांता सिन्हा, सायना नेहवाल, डॉ. एविटा फर्नांडिस तथा डॉ. गुल्लापल्ली एन. राव को सम्मानित किया जा चुका है।
पुरस्कार समारोहों में मुख्य अतिथि और स्मृति व्याख्यान देने वालों में पूर्व प्रधानमंत्री आई.के. गुजराल, पूर्व उप-राष्ट्रपति कृष्णकांत, लेखक खुशवंत सिंह तथा बिलकीस लत़ीफ शामिल रहे हैं। युद्धवीर अवॉर्ड ग्रहीताओं में पत्रकार कालिदास काशीकर, आबिद अली खान, कुमुदिनी देवी, अनंत पाई, ग़ज़ल गायक विठ्ठल राव, कवि एवं चित्रकार नरेंद्र राय श्रीवास्तव, बद्री विशाल पित्ती (मरणोपरांत), राजबहादुर गौड़, कमला मित्तल एवं जगदीश मित्तल, शंकर एस. मेलकोटे, फिल्मकार श्याम बेनेगल, शेख सुबहानी, डॉ. ए. साईबाबा गौड़, सुरैया हसन बोस, सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. सुनीता कृष्णन, डॉ. विजयवीर विद्यालंकर, सैयद अजहर म़कसूसी, सांस्कृतिक संस्थान लामकान, वंदिता राव एवं ई. राममोहन राव, श्रीदेवी प्रसाद एवं चित्रकार तोटा वैकुंटम भी शामिल हैं।
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16 वर्ष की आयु में स्वतंत्रता संग्राम में शामिल
स्वतंत्रता सेनानी एवं हिन्दी मिलाप के संस्थापक स्वर्गीय युद्धवीरजी का जन्म 1921 में आर्य समाज के प्रमुख स्तंभों में से एक महात्मा आनंद स्वामी के घर लाहौर में हुआ था। देश की आजादी के लिए लड़ने की चिंगारी बहुत कम उम्र में ही युद्धवीरजी में प्रज्वलित हो गई थी। पारंपरिक शिक्षा से बेफिक्र युद्धवीरजी ने 16 वर्ष की आयु में खुद को स्वतंत्रता संग्राम में झोंक दिया। स्वतंत्रता की लड़ाई के दौरान उन्हें कई बार जेलों में कैद किया गया, जहाँ अंग्रेजों के हाथों अमानवीय यातनाओं को भी सहना पड़ा।
पुलिस लॉक-अप और लाहौर किले में मिले घावों के कारण उन्हें कई बड़ी सर्जरियाँ करवानी पड़ीं। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गिरफ्तारी के बाद उनका अंतिम कारावास तीन वर्षों तक चला। भारत छोड़ो आंदोलन के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू की पहली सार्वजनिक उपस्थिति के लिए उन्होंने लाल किले में सबसे बड़े स्वागत समारोह का आयोजन किया। उन्होंने पंजाब कांग्रेस सेवा दल का नेतृत्व किया और भारत स्काउट्स आंदोलन में भी सक्रिय रूप से भाग लिया।
वे 1947 से 1949 तक दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी के निर्वाचित सदस्य रहे। महात्मा गांधी ने जब शांति और सांप्रदायिक सद्भाव बहाल करने के लिए पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश में) के नोआखली जिले का दौरा किया, तो युद्धवीरजी ने दंगा प्रभावित क्षेत्रों में डेरा डाला। वे 1946 से 1948 तक पंजाब प्रांतीय कांग्रेस कमेटी द्वारा प्रायोजित पंजाब दंगा पीड़ित राहत समिति के स्वयंसेवी प्रभारी थे। वे 1947 से 1949 तक दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी के निर्वाचित सदस्य भी रहे।
दंगाग्रस्त क्षेत्रों से शरणार्थियों को सुरक्षित निकाला
अपनी सुरक्षा की परवाह किए बिना उन्होंने दंगाग्रस्त क्षेत्रों से सैकड़ों हिंदू और मुस्लिम शरणार्थियों को निकालकर सीमा के दोनों ओर उनके लिए सुरक्षित मार्ग की व्यवस्था की। वे अगस्त 1949 तक राहत कार्य के लिए पाकिस्तान में रहे। लाहौर के डिप्टी कमिश्नर ने जब उन्हें सुरक्षा देने से इनकार कर दिया, तो वे हैदराबाद चले आये। यहाँ आकर उन्होंने मिलाप अखबार का पहले उर्दू और बाद में 1950 में हिन्दी में प्रकाशन शुरू किया। उन्होंने 1972 से 1977 तक लंदन में मिलाप के हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी संस्करण भी प्रकाशित किए।
युद्धवीरजी आंध्र प्रदेश पंजाबी सभा के संस्थापक सदस्य थे और कई वर्षों तक बैसाखी मेले के अध्यक्ष रहे। वे 1966 में हैदराबाद में अमृत कपाड़िया नवजीवन महिला कॉलेज के संस्थापक सदस्य रहे। वे साउथ हॉल (लंदन) और बर्मिंघम में इंडियन ओवरसीज कांग्रेस के संस्थापकों में से एक थे, जिन्होंने इसे पैन-यूके संगठन बनाने में मदद की। 1975 से 1977 तक भारत सरकार द्वारा लगाए गए आपातकाल के दौरान युद्धवीरजी ने सितंबर 1975 में लंदन में ऐतिहासिक एकजुटता मार्च का आयोजन किया, जिसमें ब्रिटेन में रहने वाले हजारों भारतीयों ने भाग लिया।
वे धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद में अटूट विश्वास रखते थे। उनका अधिकांश जीवन समाज के कमजोर वर्गों के उत्थान के कार्यक्रमों के लिए समर्पित रहा। 1991 में 1 फरवरी को उनका निधन हो गया। उनकी धर्मपत्नी श्रीमती सीता युद्धवीरजी भी स्वतंत्रता सेनानी, समाजसेवी और दो बार राज्यसभा सांसद रहीं। उन्होंने युद्धवीरजी के आदर्शों और वंचितों के उत्थान के प्रति आजीवन समर्पित रूप से सेवाएं प्रदान कीं। उनके पुत्र विनयवीरजी ने वर्ष 1991 में डेली हिंन्दी मिलाप का कार्यभार संभाला। समाचार पत्र की सफलता में उनके प्रमुख योगदान में नई तकनीकों और दक्षताओं का निरंतर समावेश शामिल रहा।
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